Ira Johri

Abstract


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Ira Johri

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संस्मरण

संस्मरण

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साड़ी पहन कर पापा के साथ स्टूडियो में जा कर तस्वीर खिंचवाने का संस्मरण बहुत ही रोचक है ।उनकी यादें मानस पटल पर अपनी अमिट यादें छोड़ जातीं हैं ।हमारे यह संस्मरण भी उनमें से एक है । साड़ी पहन कर पापा के साथ स्टूडियो जा कर ये तस्वीरें हमनें बड़े बेमन से खिंचवाई थी और पहली वाली यानी खड़े हो कर पूरी खिंचाई गयी तस्वीर हमको बिल्कुल भी पसन्द नहीं थी ।अपनी तस्वीरों के संग्रह से हमनें इसे हटा दिया था ।इसके साथ खिंची दूसरी तस्वीर हमें बहुत प्रिय थी ।वह हम कई बार पोस्ट कर चुके हैं ।हाँ तो हम जब शादी के बाद ससुराल पंहुचे तो देखते क्या हैं कि यही तस्वीर वहाँ फ्रिज के ऊपर शान से सजी खड़ी थी ।साथ में हमारी तीनों जिठानियों की भी सुन्दर सी तस्वीरें विराजमान थीं । हमनें एक दिन मौका पाकर इनसे कहा हमें अपनी तस्वीर बिल्कुल पसंद नहीं है इसको यहाँ से हटा दीजिए और अच्छी वाली लगा दीजिए इन्होंने मुझे उत्तर दिया कि यह तो यही रहेगी यह हमारी मम्मी को बहुत पसंद है। हम चुपचाप रह गए। कुछ ज्यादा बोल भी नहीं सकती थी तो चुपचाप रह गये। सच तो यह जब भी इस तस्वीर को देखती हूँ बहुत सी खट्टी मीठी बातें याद आतीं हैं ।इतनी कि पूरा संस्मरण बन जाये ।सोचती हूँ वह भी लिख दूँ ।एक साथ तीन तस्वीरें खिंची थी उनमें से जो एक मुझे बहुत पसन्द है उसे अपने पास रख ली दूसरी माँ के पास है और यह तीसरी सासू माँ के पास थी।जो अब हमारे पास है। बाकी दोनो तो अच्छी आईं जबकि इसमें स्टैचू से नजर आ रहे हैं ।तस्वीर खिंचाते समय भी उस वक़्त बहुत सी नसीहतें मिलीं थीं यानी थोड़ा तिरछा हो कर तस्वीर खिंचवाना जिससे पतली लगो।हँसती बहुत हो मुँह बन्द रखना।ऐसा न लगे कि शादी की तस्वीर खिंचाते समय बहुत खुशी हो रही हो। सब की नजरों में मैं मोटी थी ।पतली लगूं इसलिये शिफान की साड़ी पहनी थी।माँ की बहुत खूबसूरत कोकाकोला के रंग की साड़ी थी वह।आज भी मुझे वह याद है।पहले के समय में तो बहुत तैयार हो कर स्टूडियो जाना पड़ता था । यूँ सहेलियों संग फोटो बहुत पहले ही हम अकेले ही स्टूडियो जा कर खिंचवा चुके थे और यूँ हीअकेले भी ।पर पापा के साथ इस तरह और कारण विशेष के लिये तस्वीर खिंचवाना अलग ही यादगार संस्मरण बन गया। आजकल के मोबाइल युग में तो सबके इस विषय में बहुत मजे हैं ।जितनी मर्जी उतनी तस्वीरें खींचो। खींची और पसंद ना आने पर डिलीट करो।अब जब अपनी तस्वीरों का संग्रह देखती हूँ तो पाती हूँ कि मोबाइल युग से पहले की तो ढेरों तस्वीरें हैं जबकि बाद की यादों को ताजा करने के लिये मोबाइल का मुँह ताकना पड़ता है। जब फोटोग्राफी का नया नया चलन हुआ था उस समय की खिंची हुई दादी नानी की तस्वीरें आज भी मन मोह लेतीं हैं । श्वेत श्याम तस्वीरों के रूप में वो माता पिता के बचपन की यादें आज भी मन में अजीब सी खुशी पैदा करतीं हैं ।जिन बुजुर्गों को हमने देखा भी नहीं ।और जिन रस्मों को हमने जाना भी नहीं उनको पुरानी तस्वीरों में देख कर भी बहुत अच्छा लगता है । हमारे स्नातक तक पँहुचने तक श्वेत श्याम तस्वीरों का सफर रंगीन तस्वीरों के दौर में चला गया था। यह संस्मरण समाप्त करते समय एक बात और बता कर अपनी यादें साझा करना चाहूँगा कि हमारे विवाह से ही हमारे परिवार में विवाह के समय वीडियोग्राफी का चलन शुरू हुआ था । और जिसने वह वीडियो बनाया था बाद में वह फिल्म लाइन में चला गया ।उसके हाथ में कमाल था।उस वक्त के बने वीडियो में वह बहुत सुन्दर बन पड़ा था और आज भी उसके रंगों में चमक है । आज इतना ही आगे की बातें फिर कभी।



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