समझदारी
समझदारी
"सृष्टि तुम्हारी सर्वेंट कितनी छुट्टियाँ लेती है, तुम कोई दूसरी क्यों नहीं रख लेती? तुम्हारे लिए ऑफिस, घर दोनों संभालना कितना मुश्किल हो जाता होगा न? कई एप आ गए हैं, वहाँ से भी तो हाउस हेल्प ले सकती हो न?" सृष्टि को ऑफिस से आते ही घर के काम में लगते देख पड़ोसन सुजाता ने कहा। "नहीं, बिल्कुल नहीं सुजाता।" "वो कैसे? मेरी तो सिर्फ़ एक दिन नहीं आती है और मैं पूरा घर सिर पर उठा लेती हूँ।" "आत्मीयता!" "आत्मीयता?" "हाँ, मेरी अम्मा तभी छुट्टी लेती है, जब बहुत जरूरी हो, लेकिन जाने से पहले वह मुझसे कहती है, "आपको मेरे आने तक कोई परेशानी न हो इसलिए दीजिए, मैं सारी सब्जियाँ साफ करके रेडी टू कुक कर देती हूँ।" कहती है, "आप सिर्फ़ आवश्यकता पूर्ति के काम ही कीजिएगा, आने के बाद मैं सब कर दूँगी और घर की सफ़ाई तो तुम जानती ही हो, वह इतनी अच्छी करती है, कि अगले दो दिनों तक घर की सफाई करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। आने के बाद भी मुझसे कहती है, "आपको तकलीफ हुई होगी न।" और यह कहते हुए वह मेरे अतिरिक्त कामों में मदद करने लगती है। इतना अपनापन तो कभी-कभी अपनों से भी नहीं मिलता।" "सही कह रही हो, लेकिन तुम भी तो उसकी बहुत अधिक मदद करती हो न?" दूसरों की तकलीफों के प्रति अगर हम संवेदनशील ही नहीं है, तो ऐसा मनुष्य होने का औचित्य ही क्या है? अब तो तुम्हें पता चल गया होगा न, मुझे एप से बुलाने की आवश्यकता क्यों नहीं पड़ती? लेकिन हाँ,शायद तुम्हें इसकी बहुत अधिक आवश्यकता है।"
