दीवाली
दीवाली
"निशा रोज-रोज की मीटिंग, अप टू डेट जिंदगी समय से पहले ही थका रही है। आजकल रह-रहकर मन में एक ही सवाल कौंधता है, जीने का मकसद क्या है?"
"हाँ! सही कहा, रोज-रोज की भागदौड़ में जिंदगी सिमटकर रह गई है। लेकिन हमें इतना निराश होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि जल्द ही हम भारत जा रहे हैं। अपनों के पास, अपनों के बीच।"
"वैसे दिवाली कब की है?" हर्ष ने बेसब्री से पूछा।
"ज्यादा दिन नहीं बचे हैं। आज ही टिकट करना पड़ेगा।"
"चलो अच्छा है, अब मन में कुछ सुकून महसूस हो रहा है। पूरे दो महीने रहकर आएँगे।"
"जरूर! लेकिन पहले घर पर बात करके यह खुशखबरी तो दे दें।"
"मैं फोन लगाती हूँ।
"माँ, प्रणाम!"
'..."
हाँ, हाँ, माँ! हम लोग दिवाली पर आ रहे हैं। दो दिन बाद का टिकट बना रहे हैं।"
"..."
"अच्छा तो फिर ठीक है, हम सीधे ही दादी के गाँव पहुँच जाएँगे। वहीं दो महीने तक रहेंगे ठीक है न?"
"..."
"बाबूजी को हमारा प्रणाम कहिएगा। जल्द ही मिलते हैं माँ।"
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"आज कितने सालों बाद सुकून का अनुभव किया है।"
अतीत की स्मृतियों के द्वार एक-एक कर खुलने लगे है।
"इतने आनंदित तो हम इससे पहले कभी नहीं थे, दादी।" गाँव के घर में कदम रखते ही, शांति को जीते हुए हर्ष ने कहा।
"यह अनोखी खुशी है बेटा क्योंकि इसमें सबकी खुशी शामिल है। यह लौ अब बुझने नहीं देना, मेरे लल्ला!" दादी ने पुलकित मन से कहा, और देखते-ही-देखते दादी की आँखे डबडबा आई, मानो वो इतनी अधिक खुशी सँभाल ही न पा रही हो।
"बिलकुल दादी!"
तभी ताऊजी के पोते 'हरि' ने आकर हम सबके गालों पर गीली मिट्टी लगा दी और "दिवाली में होली है।" कहकर नाचने लगा। दादी खुशी से हम दोनों की बलइया लेते हुए कहने लगी- "मेरे लल्ला-बहू कितने सुंदर लग रहें हैं।"
निशा भी कह उठी- "हाँ दादी, इतने खूबसूरत तो इससे पहले हम कभी नहीं लगे और इस मिट्टी की भीनी-भीनी खुशबू ने तो हमारी सारी थकान देखते-ही-देखते मिटा दी।"
मैं भी अपने गालों की मिट्टी निकालकर हरि को मिट्टी लगाने के लिए उसके पीछे दौड़ा।
हम लोगों की मस्ती अभी चल ही रही थी, कि दादाजी ने आकर कहा- "तुम लोग तैयार हो जाओ, फिर खेत जाकर अपनी-अपनी पसंद की सब्जी तोड़ लाना।"
"अरे दादाजी खेत ही तो जाना है, तैयार होने की क्या जरूरत है? हम तो ऐसे ही जाएँगे।" कहकर हरि ने मेरा हाथ पकड़ लिया और हम खेत की ओर बढ़ गए, पीछे-पीछे निशा भी आ गई।
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खेतों से सीधे घर के किचन में आई सब्जियों का स्वाद कई सालों बाद महसूस किया था।
अगले दिन बाबूजी ने कहा-"कल सुबह सब जल्दी तैयार हो जाना हमें श्रमदान करने जाना है।"
"श्रमदान?" मैं और निशा दोनों ही एक स्वर में आश्चर्य से पूछ बैठे।
"हाँ! यहाँ कुम्हार, जो मिट्टी के दीए बनाते हैं। उन्हें हम सजाने जाते हैं फिर वे शहर जाकर बेचते हैं। आकर्षक होने के कारण वे हाथों हाथ बेचकर समय पर गाँव आ जाते हैं।" हरि ने बताया।
"यह तो बहुत ही अच्छा कदम है!"
निशा ने उत्साहित मन से कहा।
"इस बार तुम दोनों कुछ नया और अलग सजाना।
दादाजी ने आशा भरी नजरों से देखकर, कहा।
"बिलकुल दादाजी, ऐसा ही होगा।"
निशा इस नयेपन से फूली नहीं समा रही थी।
"ये सब कब से शुरू किया? दादा जी।"
"चार-पाँच साल पहले इन्हें जब निराश लौटते देखा, तो हम सब गाँव वालों ने मिलकर इसका यह समाधान निकाला जो सफल भी हुआ।"
"वाह! दादाजी, इसी संवेदना की हम बाहर कमी महसूस करते हैं।वाकई अपना देश अपना ही होता है।"
गाँव में अमीर गरीब नहीं होते बेटा, हम सब एक बड़े परिवार की तरह एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बनते हैं।"
"इसलिए हर घर दीयों के प्रकाश में होता है, है न दादाजी?" हरि ने चहककर कहा।
"बिलकुल! यहाँ जितना तेल दीयों में हम जलाते हैं ये भी उतना ही। यहाँ सभी बराबर है।"
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घर में दिवाली की तैयारियाँ अपने पूरे जोश पर थी। घर के किचन से आती पकवानों की खुशबू, मिट्टी की खुशबू में मिलकर जायका बढ़ा रही थी।
"यहाँ की तो हर बात अच्छी है। हर घर का आँगन दूसरे आँगन से बातें करता है।" निशा ने अपनी खुशी व्यक्त की।
"सही कहा, आज एक आँगन ने मुझसे कहा भैया यहाँ दिवाली तो महीनों चलती है या कहो कि साल भर। ऐसा कौन-सा दिन है? जब हम लोगों ने आपस में खुशियाँ नहीं बाँटी हो।"
घर के एक आँगन से दूसरे आँगन, दूसरे से तीसरे आँगन मिष्टान अपनी मिठास बिखेर रहे थे। इस पाँच दिन के त्यौहार में हमने पाँच सौ से अधिक यादें समेट ली थी अब तलक। देखते-ही-देखते दो महीने कब बीत गए पता ही नहीं चला। वाकई में मिट्टी की सौंधी खुशबू में जीवन की सच्चाई बसती है। फूलों की खुशबू शरीर ही नहीं मन को भी शांत करती है। आज एक नई दृष्टि मिली है। गाँव की धरा पर पैर रखते ही ऐसे लगा था, मानो मिट्टी ने मेरी उदासी सोख ली। मुझे नया जीवन दे दिया। सूर्य की सुनहरी किरणों को गाँव की मिट्टी पर पड़कर एक अद्भुत दृश्य रचते देखा, मानो गाँव की धरती पर आकाश उतर आया हो।
आज का दिन बहुत तकलीफ भरा था क्योंकि मन तो मानने को ही तैयार नहीं था कि दो महीने बीत गए और अब वापस पराई धरती पर जाना है। निकलने को हुए तो माँ-बाबूजी ने सूटकेस भरकर मिठाइयाँ बांध दी, फिर बड़े प्यार से कहा- "यहाँ की यादें और ये मिठाइयाँ महीनों तक तुम्हें गाँव में होने का अहसास कराएगी।" लेकिन उन्हें क्या पता था, कि मैं और निशा तो कुछ और ही निर्णय ले चुके हैं। अमेरिका पहुँचते ही एक साल के भीतर ही हम दोनों नौकरी से त्यागपत्र देकर आज पुन: हमेशा के लिए अपनी धरती पर अपनी माँ के पास लौट आए हैं।'
