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Shailaja Bhattad

Abstract

3.4  

Shailaja Bhattad

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एकतरफ़ा

एकतरफ़ा

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"सुषमा अच्छा हुआ जो तुम आ गई।"

 "हाँ! मुझे तो आना ही था न दीदी। माँ की तबीयत जो ठीक नहीं है। डॉक्टर ने क्या कहा? कब तक अस्पताल से डिस्चार्ज हो जाएँगी?"

"अब तू आ गई है, तो सब पता चल जाएगा। लेकिन सुन मुझे तुझे कुछ और बताना है।"

 "बोलो दीदी।"

"पिछले महीने जब सुकांत अस्पताल में भर्ती हुआ था न...।"

 "हाँ! जानती हूँ। भैया-भाभी का फोन आया था, कह रहे थे, "तुम्हारे भतीजे की तबीयत ठीक नहीं है।" और वे अभी भारत नहीं आ पा रहें हैं, चूँकि तुम वहीं हो तो तुमसे देखभाल के लिए कहेंगे। लेकिन इस बारे में आज बात क्यों?"

"वह इसलिए कि उसकी पूरी देखभाल मैंने अकेले ही की थी। उसके लिए घर से बना खाना, फल, जूस सब मैं लगातार तीन दिनों तक लेकर गई।"

"अपनों के लिए तो सभी करते हैं न? फिर किए को बताना क्यों?"

 "वह इसलिए, क्योंकि जब मैं उसके पास बैठकर उसे खाना खिला रही थी, तभी उसने मित्र से फोन पर बात करते हुए कहा...।"

"क्या कहा?"

 "यही कि तुम लोग बिलकुल बेफिक्र रहो। मेरी मौसी मेरा पूरा ध्यान रखती है। वही मेरी देखभाल कर रही है, लेकिन उसकी मौसी एक दिन भी नहीं आई थी।" "ओह! भाभी को तो सब जानते हैं, लेकिन बच्चे भी? दीदी, अगर मैं तुम्हारी जगह होती, तो उसी समय वहाँ से उठकर चली जाती।"

 "कहना आसान है सुषमा! तुम भी यह नहीं कर पाती, क्योंकि यह हमारे खून में ही नहीं है और फिर भैया का चेहरा भी मेरी तरह तुम्हारे सामने आ जाता।"


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