सिर्फ तुम्हारे लिए.
सिर्फ तुम्हारे लिए.
"सिर्फ तुम्हारे लिए"
(एक प्रेत-कहानी – श्यामा और सुधीर की प्रेम और रहस्य से भरी दास्तान)
स्थान: पुराना कोठा, नैनीताल के पास
समय: बरसात की एक अंधेरी रात
बरसात ने पूरी घाटी को अपनी बाहों में भर लिया था। बिजली चमकी, और सुधीर ने गाड़ी रोकी। वह शहर से दूर, एक पुराने कोठे की तरफ जा रहा था—जहाँ कभी उसकी दादी रहती थीं। एकांत, सन्नाटा, और वह कोठी…जिसे लोग अब “श्यामा वाला कोठा” कहते थे।
सुधीर को कोई डर नहीं था। वह एक लेखक था—अंधेरे में उजाले खोजने वाला।
जैसे ही वो अंदर दाखिल हुआ, घड़ी की सुई रात के 12 बजा चुकी थी। दीवारों पर लगी तस्वीरें, धूल में लिपटी परछाइयाँ, और एक कोना—जहाँ एक पुरानी तूलिका और टूटा हुआ आईना रखा था।
सुधीर ने मोबाइल की टॉर्च ऑन की। तभी एक धीमी सी आवाज आई—
“तुम आ गए?”
वह चौंका। पलटा।
वहाँ कोई नहीं था।
लेकिन फिर, आईने में एक छवि दिखी। एक लड़की, सफेद साड़ी में। बाल खुले, आँखों में नमी और होठों पर मुस्कान।
"श्यामा..." सुधीर ने बुदबुदाया।
उसे अचानक याद आया—उसके दादी की कहानियाँ। श्यामा, उस कोठी में काम करने वाली नौकरानी, जो हर रात चुपचाप सुधीर के परनाना के लिए दीपक जलाती थी। और एक दिन, अचानक बिना कुछ कहे कोठी के कुंए में कूद गई थी।
कहते हैं, वह सुधीर के परनाना से प्रेम करती थी। पर कभी कह नहीं सकी।
अब, सालों बाद, सुधीर वहाँ खड़ा था। और श्यामा... वहीँ थी।
“तुम्हें कैसे पता कि मैं...” सुधीर ने सवाल पूछा।
श्यामा मुस्कराई।
“मैं इंतज़ार कर रही थी... सिर्फ तुम्हारे लिए।”
सुधीर की आँखें भारी होने लगीं। उसने महसूस किया—हवा में कुछ अजीब सा प्रेम तैर रहा है। डर नहीं था, बस अजीब सी अपनापन।
अगली सुबह, गाँव के लोग कोठी की ओर भागे।
दरवाजा खुला था। लेकिन अंदर सिर्फ एक पुराना आईना था—जिसमें सुधीर की जगह अब कोई और चेहरा झलक रहा था—श्यामा और सुधीर... साथ-साथ।
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कहानी का अंत?
या शायद...
एक नई शुरुआत।
क्योंकि कुछ आत्माएँ इस धरती पर सिर्फ एक वादा निभाने आती हैं।
"सिर्फ तुम्हारे लिए...

