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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

Romance Inspirational Thriller


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Rajesh Chandrani Madanlal Jain

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सीजन 2 - मेरे पापा (6)…

सीजन 2 - मेरे पापा (6)…

10 mins 174 10 mins 174

सीजन 2 - मेरे पापा (6)…सुशांत, सुबह आ रहे हैं, इस विचार ने मेरे हृदय को आह्लदित कर दिया था। आनंद की अधिकता में भी नींद उड़ जाती है, यह मैंने इस रात जाना था। निद्रा देवी देर तक मुझसे रूठी रहीं थीं। मैं कभी चहलकदमी करती, कभी पानी पीती और कभी बिस्तर पर करवटें बदलती रही थी। जैसे तैसे निद्रा देवी कृपालु हुईं थीं, फिर सुबह मेरी नींद जल्दी टूट गई थी। 

जागने पर मुझे पहला विचार वही आया था जो निद्रा के पूर्व रात में रहा था। अब कुछ ही समय में सुशांत आने वाले हैं। उनके सीने से लग उनकी धड़कनों को अनुभव कर सकने का अवसर, अब मुझसे दूर नहीं अनुभव करते हुए मैं प्रसन्न हुई थी। सुबह उठ कर दो गिलास जल पीना मेरी आदत में था। मेरी दृष्टि साइड टेबल पर काँच के जग पर गई, जिसमें का जल, रात में मैंने पी लिया था। मैं जल लेने के लिए किचन की तरफ चल दी थी। 

ड्राइंग रूम में पापा एवं मम्मी जी, टीवी देख रहे थे। दोनों अर्ली राइजर थे। अतः यह देखना अस्वाभाविक नहीं लगा था। जब मैंने, उन्हें ध्यान से देखा तो दोनों के मुख पर तनाव दिख रहा था। उनकी दृष्टि का पीछा करती मेरी दृष्टि स्क्रीन पर पड़ी तो उस पर आसमान में उड़ता प्लेन दिखाई पड़ रहा था। 

मैं जल लेने की सुध भूलकर खुद भी टीवी एंकर की कही जा रही बात को ध्यान से सुनने लगी। वह कह रही थी -

जी, हाँ अब यह प्लेन दिल्ली के हवाई अड्डे पर, कुछ ही मिनटों में लैंड होने वाला है। कहने के साथ एंकर ने कमर्शियल ब्रेक ले लिया था। पापा मम्मी जी का ध्यान, मेरी और नहीं था। अब दोनों रिलैक्स्ड दिखाई देने लगे थे। तब मैंने किचन से जल लिया था। मैं वापस कमरे में आने के बाद वॉशरूम गई थी। कोई प्लेन दिल्ली में लैंड होने जा रहा है, यह तो एक सामान्य बात होती है। इसे समाचार में दिखाए जाने का रहस्य क्या है। यह जानने की उत्सुकता में दैनिक क्रियाओं के बाद, मैंने अपने रूम का टीवी ऑन करके न्यूज़ चैनल लगाई थी। 

न्यूज़ एंकर कह रही थी - हमारा चैनल अपने दर्शकों तक यह समाचार सबसे पहले पहुँचा रहा है। सुबह 6.50 को लेह के ‘कुशोक बकुला रिंपोचे’ से दिल्ली के लिए उड़ान लेने के 25 मिनट बाद, दोनों पॉयलट की तबीयत बिगड़ जाने से प्लेन में सवार यात्रियों और क्रू मेंबर्स को, जब अपने प्राणों का भय सताने लगा। तब एक सुखद संयोग हुआ। तब विमान में ही सवार एक पॉयलट ने प्लेन की उड़ान जारी रखते हुए प्लेन को सकुशल अंतर्राष्ट्रीय विमानतल, दिल्ली में उतार दिया है। 

हम अपने संवाददाता के माध्यम से इस पॉयलट के बारे में जानकारी प्राप्त करके आप तक पहुँचाने की कोशिश में हैं। 

यह कहने के बाद एंकर ने हवाई अड्डे पर अपने संवाददाता की उस प्लेन पर सवार रही, एक महिला यात्री से की जा रही वार्ता दिखाना शुरू की थी - 

सुनयना (यात्री) बता रही थी कि लेह से उड़ान भरने के थोड़ी देर बाद, डरी हुई दिख रही एयर होस्टेस ने स्पीकर पर हमें बताया कि विमान के कमांडर पॉयलेट की तबियत बिगड़ गई है और अन्य पॉयलेट की तबियत भी खराब हो रही है। अतः विमान की, श्रीनगर विमानतल पर इमर्जेन्सी लैंडिंग के प्रयास किए जा रहे हैं। विमान में कोई यात्री डॉक्टर हो तो निवेदन है कि वे पॉयलेट्स की जाँच और उपचार करें। 

संवाददाता ने प्रश्न किया - सुनयना, हमारे दर्शकों को बताओ कि क्या कोई डॉक्टर विमान में था?

सुनयना ने बताया - अनाउंसमेंट सुनने पर हम सभी यात्रियों के मुख पर हवाइयाँ उड़ने लगी थी। हम सभी यात्री भय में अपनी सीट से चिपक गए थे। तब हमने एक साथ दो यात्रियों को अपनी सीट से उठकर कॉकपिट की तरफ रश करते देखा था। फिर कुछ मिनट में परिचारिका ने खुश होकर बताया था - हम सब विमान में सवार लोगों का भाग्य है कि यात्रियों में एक पॉयलेट मिल जाने से विमान उड़ान का जिम्मा उन्हें दिया गया है। आप सभी से निवेदन है आप सभी रिलैक्स होकर यात्रा को एन्जॉय कीजिए। यात्रियों में रहे एक डॉक्टर के द्वारा अस्वस्थ हुए दोनों नियमित पॉयलेट का उपचार भी किया जा रहा है। 

कुछ ही मिनट बाद होस्टेस ने फिर बताया कि एयर कंट्रोलर्स की अनुमति मिल जाने पर अब विमान, श्रीनगर एयरपोर्ट में नहीं उतारा जा रहा है। हमें आशा है कि निर्धारित समय पर ही यह विमान सकुशल दिल्ली हवाई अड्डे पर उतर सकेगा। 

तब संवाददाता ने सुनयना को धन्यवाद कहा था। सुनयना ने उत्तर में कहा था - आज प्राणों के बच जाने की ख़ुशी के साथ एक और बात की ख़ुशी भी है कि मुझे आपके न्यूज़ चैनल पर पूरा देश देख रहा है। ये अनुभव मुझे पूरे जीवन याद रहेंगे। 

तब संवाददाता सुनयना के साथ हँसा था। फिर उसने बताया कि जिस युवक ने इस आपात स्थिति में देवदूत जैसे प्रकट होकर सबकी जान बचाई है, वह अपनी पहचान छुपा कर यहाँ से जा चुका प्रतीत हो रहा है। हमें विमानतल अधिकारियों से भी उस अज्ञात पॉयलेट की जानकारी नहीं मिल पा रही है। 

मैंने टीवी ऑफ कर दिया था। मुझे अनुमान हो रहा था कि यह मेरे पति देव सुशांत ही हैं, जो यह फ्लाइट दिल्ली लाने के साथ ही, स्वयं भी दिल्ली आ गए हैं। मैं हर्षातिरेक में दीवानी हुई जा रही थी। सब कुछ भूल सी गई मुझे, तब मेरे नियमित दैनिक क्रम के लिए भी दिमाग पर जोर लगाना पड़ रहा था। स्नान आदि के बाद मैंने गुलाबी वस्त्र पहने थे, यह रंग सुशांत को पसंद था। अब किसी भी क्षण वे घर आने वाले हैं विचार करते हुए मैं किचन की तरफ बढ़ी थी। 

तभी डोर बेल गूँजी थी। मेरे कदम ठिठके थे। मैं संकोच में थी कि अपनी उतावली प्रदर्शित करके सभी को हँसने का अवसर दूँ या नहीं। 

तभी पापा ने पुकारा - रमणीक कहाँ हो तुम? बेटी जरा जाकर देखो तो कि इस समय कौन आया है?

पापा कभी ऐसे, मुझे द्वार खोलने को नहीं कहते हैं। द्वार की तरफ कदम बढ़ाते हुए मैं सोच रही थी कि इन बड़े लोगों को हम छोटों का पूरा मनोविज्ञान समझ आता है। मुझे लग रहा था, मेरे मन में क्या है यह मुझसे अधिक, पापा जान रहे थे। मैंने कहा - जी पापा, मैं देखती हूँ। 

मैंने द्वार खोले थे, सामने मेरी दुनिया, मेरी ज़िंदगी, मेरे साजन, जिनसे मेरा हृदय धड़कते रहना चाहता है, मेरे पतिदेव साक्षात खड़े थे। उन्होंने अपनी दोनों भुजाएं फैलाईं थीं। आसपास कोई है भी या नहीं, मेरे मन से यह विचार हट गया था। मैं अपने प्रियतम के सीने से लगकर रो पड़ी थी। इनका एक हाथ मुझे इनसे भींच रहा था और दूसरे से मिलतीं प्यार भरी थपकियाँ, मुझे अपने सिर, गाल, कंधे एवं पीठ पर अनुभव हुई थीं। कुछ क्षण हम ऐसे ही खड़े रहे थे। तब पापा की आवाज आई थी - बेटी, कौन आया है?

सुशांत ने कहा - पापा कितने बन कर पूछ रहे हैं। इनको, मैंने 10 मिनट पहले कॉल कर बता दिया था। निकी, क्या पापा आपको ऐसे ही छेड़ा करते हैं? 

मैं रोते रोते हँस पड़ी थी। 

सुशांत ने कहा - अभी आपको देखकर लग रहा है जैसे आसमान में सूर्य प्रकाश इंद्रधनुष रंगो की छटा बिखेर रहा है और साथ में बरसात हो रही है। 

ऐसी तुलना से खुश होने के साथ मैंने तेज स्वर में कहा - पापा, आपके बेटे आए हैं। 

फिर सुशांत और मैं, ट्राली बैग लिए भीतर आए थे। सुशांत ने डाइनिंग रूम में पापा एवं मम्मी जी के चरण छूकर आशीर्वाद लिए थे। फिर अपने विनोदी स्वभाव अनुरूप कहा - देखो न पापा, रमणीक ऐसे कह रही है जैसे इसका रिश्ता सिर्फ आपसे है। मेरे से कोई रिश्ता नहीं है। 

पापा ने सुशांत का साथ देते हुए कहा - हाँ, निकी यह तो गलत बात है। सही बताओ कौन आये हैं। 

मैंने सोचा था फिर मिल रहे अवर्णनीय सुख के लिए शब्द तय करते हुए मैंने कहा - 

पापा मेरे वो आए हैं जिनके लिए मेरे मन की वाणी ये शब्द पाती है, ‘ओ मने पल पल पल पल याद तेरी तड़पावे से - हाय तेरा रूप जिगर में रड़के आग लगावे से’ 

सब खिलखिला के हँस दिए थे। यह परिवार अभी कुछ ही महीनों पहले मेरा नहीं था। इसमें सभी, जैसे मुझे प्रसन्न रखने को उत्सुक रहते हैं यह देख मुझे लगता था कि जन्म जन्मांतरों से यही मेरा परिवार है। यहाँ मुझे बहू और बेटी दोनों रूपों में माना जाता है और मुझे मन की कहने-करने की हर स्वतंत्रता देता है। मेरे अनुचित किए-कहे को अपने बच्चों की गलती की तरह इग्नोर भी करता है।

फिर सुशांत वॉशरुम में गए थे। कुछ मिनट में चेंज करके वे, नाश्ते के लिए आ गए थे। हमने साथ नाश्ता किया था। मैं, इसके बाद ऑफिस के लिए निकल गई थी। पाँच दिन के अवकाश के आवेदन करने से, मुझे कल से नौ दिनों का सुशांत से पूरा साथ मिलने वाला था। इसके पहले, आज ऑफिस का अंतिम दिन था। मुझे ऑफिस में यह बात ध्यान में रख बहुत से काम निबटाने थे। उस दिन मैं पूरे समय बहुत व्यस्त रही थी। फिर संध्या के समय, अपने मन में फूटते लड्डू और जलती फुलझड़ियों के साथ मैं घर लौटी थी। 

मम्मी जी से पता चला कि लंच के लिए उठने के अतिरिक्त सुशांत, पूरे समय सोते रहे हैं और अभी भी सो रहे हैं। सुनकर मैं मन ही मन प्रसन्न हुई थी कि सुशांत और मैं अब रात देर तक आसानी से जागे रह पाएंगे। 

मैं शयनकक्ष में आ गई थी। मैंने सुशांत को जगाने का प्रयास नहीं किया था। कुछ पल उनके मुखड़े को प्रेम से निहारा था। फिर बिना शोर किए वॉशरूम में जाकर शॉवर लिया था। गाउन पहन कर फिर मैं भी बिस्तर में उनके साथ लिपट कर लेटी थी। फिर उनके माथे पर चूमते हुए उन्हें जगाया था। 

डिनर पर उस दिन, मम्मी जी ने पूछा - बेटा, तुम ही होना जिसने, आपात स्थिति में आज विमान उड़ा कर दिल्ली लाया और विमान में सवार सौ से अधिक व्यक्तियों की प्राण रक्षा की है। 

सुशांत ने मुस्कुराते हुए हामी में सिर हिलाया था। 

मम्मी जी ने ही तब पूछा - फिर जब न्यूज़ चैनल वाले तुमको खोज रहे थे तब तुम पहचान छुपाते हुए उनसे बच कर क्यों निकल आए थे? 

मम्मी जी के उत्तर में सुशांत कुछ कहते, उसके पहले ही पापा ने कहा - 

सारिका, अपने बेटे को धर्म’पत्नी के दर्शन की उतावली थी इसलिए इसने सबसे बचते हुए, घर की ओर मुँह कर के दौड़ लगा दी थी। 

इस पर सब हँसने लगे थे। मैं लजाई हुई हँस रही थी। तब सुशांत ने मुझे प्रेममय दृष्टि से देखा फिर कहा - मम्मी, आप नहीं समझ पातीं मगर पापा मेरे मन की सब समझ जाते हैं। 

पापा ने कहा - क्यों नहीं समझ पाऊंगा! मैं पिता हूँ तुम्हारा! 

सबने किए जा रहे परिहास का पुनः आनंद लिया था। अंततः सुशांत ने गंभीर होकर बताना आरंभ किया - 

जब आपात स्थिति का पता चला तो मैंने, एयर होस्टेस को अपनी आईडी बताई थी और विमान उड़ाने की इच्छा कही थी। कॉकपिट में होस्टेस ने एयर कंट्रोलर्स से बात करके मेरा विवरण दिया था। मुझसे बात कर, कंट्रोलर्स के संतुष्ट होने पर विमान का कंट्रोल लेने के लिए मुझे अनुमति दी गई थी। तब मैंने विमान को ऑटोपॉयलेट से अपने नियंत्रण में लिया था। कुछ ही मिनट के बाद मुझे विमान दिल्ली एयरपोर्ट तक ले आने के निर्देश मिले थे। 

इस बीच मेरे रिक्वेस्ट पर ही, मेरी एयरफोर्स ऑफिसर की पहचान को गुप्त रखने की सहमति हुई थी। इसलिए मुझे सबसे छुपकर, रमणीक के दर्शन को जल्दी पहुँचने का अवसर मिल गया था। 

अंतिम कहे वाक्य में सुशांत ने पापा की तरह ही, मुझे लक्ष्य बना लिया था। पापा बेटे के द्वारा, बातों से मुझे गुदगुदाए जाने पर भरपूर आनंद मिल रहा था, साथ ही लाज भी बहुत आ रही थी। 

मम्मी जी ने फिर पूछा - जिन्हें हीरो कहा जाता है वे अच्छाई ना होते हुए भी अपनी अच्छाई की बातें प्रचारित करते रहते हैं। एक तुम हो कि इतने अच्छे काम करके भी उसे छुपा लेते हो अपनी प्रशंसा के अभिलाषी नहीं होते हो। 

सुशांत ने कहा - मम्मी, आर्मी वाले सभी की, एक आम पहचान फौजी की ही होती है। और हमें विशेष पहचान सामान्यतः बलिदान के बाद ही मिल पाती है। 

यह कटु बात पतिदेव से सुनकर मेरे मुख पर, ‘श्रृंगार’ से बदल कर ‘करुण’ रस वाले भाव आ गए थे। तब पापा ने कहा - 

इतने दिन तुमने, निकी को अपने दूर किए रखा है। और जब आज मिले हो तो ऐसी अप्रिय बात कहकर, क्यों इसे रुला देने पर तुले हो?

पापा मेरी मनोदशा सही समझ रहे थे। मेरी आँखों से अश्रु झरने लगे थे। सुशांत ने उठकर अपने रुमाल से मेरे आँसू पोंछते हुए कहा था - सॉरी, रमणीक!

फिर समय को पंख लग गए थे। नौ दिन तेजी से बीते थे। दिन ऐसी चर्चाओं में और मेरी रात, सुशांत के सुखद साथ में बीतती थी। 

कल ही आए और आज जा रहे हैं जैसी दुखद अनुभूति के साथ दसवें दिन हम सबने सुशांत को विदा किया था। 

फिर नितदिन सुशांत से कॉल पर होतीं बातों के बीच बीस दिन मेरे, कभी रोते, कभी सुखद कल्पनाओं में व्यतीत हुए थे। इक्कीसवें दिन ऑफिस से लौटते हुए मैं मेडिकल शॉप से प्रेगनेंसी टेस्ट किट ले आई थी ….  



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