शिक्षा -व्यवस्था
शिक्षा -व्यवस्था
आज पुनः फोन पर औपचारिक अभिवादन के उपरांत मेरी कक्षा के प्रिय छात्र रीतू ने प्रश्न किया-"सर, अधिकांश विद्यार्थियों सहित समाज के दूसरे लोगों के दृष्टिकोण में शिक्षा के प्रति उदासीनता क्यों है?"
मैंने रीतू के प्रश्न के उत्तर में उसे समझाया-"विद्यालयी शिक्षा की प्रगति के आंकलन में अधिकांश विद्यार्थी स्वयं और उनके अभिभावक अधिकतर मामलों में उनकी अंकतालिकाओं व प्रमाणपत्रों में अंकित प्राप्तांकों और श्रेणियों से मापते-भांपते हैं। दीवारों , होर्डिंग्स, बैनरों के माध्यम से प्रदर्शित विज्ञापनों में उनके द्वारा सुझाए गए कोचिंग इंस्टीट्यूट में प्रवेश लेने पर कम से कम 95 प्रतिशत या अच्छे अंक प्राप्त करवाने की गारंटी यह सिद्ध करती है कि तथाकथित ये शिक्षक भी विद्यार्थियों और अभिभावकों के दृष्टिकोण के समरूप ही हैं। शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन के स्थान पर प्रमाणपत्र प्राप्ति तक सिमटकर रह गया है। इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि मेधावी और ज्ञान पिपासु विद्यार्थी अब बचे ही नहीं है।यह संसार परिश्रमियों और आरामतलब लोगों का मिश्रण सदा से रहा है और भविष्य में भी रहेगा ही। वर्तमान वैश्विक महामारी ने इस मामले में निराशा बढ़ाई है पर हमें आशा का दामन थामे रहना चाहिए।"
"परीक्षा के समय विद्यार्थी और अभिभावक अध्ययन को लेकर अति सक्रिय क्यों हो जाते हैं?"-रीतू का अगला प्रश्न था।
मैंने उसकी इस जिज्ञासा का समाधान करते हुए बताया-"मोहल्ले की गोलियों में स्कूली बच्चों की चहल-पहल अचानक कम हो जाना, माता-पिता द्वारा बच्चों के खेलकूद पर प्रतिबंध के साथ पढ़ने के लिए बैठने की जोरदार जिद, बच्चों का मन मसोस कर खेलने के लिए मना करना आदि वे सारे लक्षण हैं कि परीक्षाएं शुरू होने वाली हैं । विद्यालयों में जो विद्यार्थी शिक्षकों से नजरें चुराते हुए दूर-दूर ही रहते थे वे पुस्तक लेकर इंपार्टेंट, वेरी इंपार्टेंट और वेरी-वेरी इंपार्टेंट प्रश्नों पर निशान लगवाने की फिराक में नजर आते हैं। ऐसे सीमित प्रश्नों के उत्तर वे परीक्षा तक याद रखना चाहते हैं जिससे वे परीक्षा में सफल हो जाएं। परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद पिछली कक्षा में पढ़ी जा चुकी विषय-वस्तु को फिर सोचने की जरूरत भी नहीं समझी जाती।कभी ऐसे विद्यार्थियों को यह याद दिलाने की कोशिश की जाए कि तुमने इससे पहले अमुक कक्षा में यह सीखा था तो वे कहते हैं अब तो उस कक्षा की ही उनसे बात की जाए जिसमें वे वर्तमान समय में अध्ययनरत हैं।"
रीतू ने जानना चाहा-"परीक्षा-भवन कुछ विद्यार्थी कक्ष -निरीक्षक से बार-बार प्रश्न समझाने का आग्रह करते क्यों नजर आते हैं!"
इसके उत्तर में मैंने बताया-"जो कक्षा में पाठ्य-पाठन की अवधि में विविध वैकल्पिक बहानों के सहारे कक्षा के बाहर रहना अपने लिए हितकर समझते हैं। परीक्षा-कक्ष में प्रश्नपत्र देखते ही उनकी सारी जिज्ञासाएं जाग्रत हो उठती हैं।उनकी आशाओं और आकांक्षाओं के केंद्र-बिंदु कक्ष -निरीक्षक ही होते हैं।इस प्रश्न में क्या करना है यह प्रश्न को बार-बार पढ़ने पर भी पता नहीं चल पाता। कुछ तो ऐसे भी विद्यार्थी मिल जाते हैं जो प्रश्न पढ़ सकने में भी असमर्थ होते हैं।अब उनका एकमात्र उद्देश्य यही रह जाता है कि कक्ष -निरीक्षक के माध्यम से इतनी जानकारी मिल जाए जो उनके हिचकोले खाती नैया को किनारे लगा दे।"
"इस व्यवस्था को किस प्रकार ठीक किया जा सकता है!"-अपने अंतिम प्रश्न के रूप में रीतू ने पूछा।
मैंने बताया-"वर्तमान परिस्थितियों में यह आवश्यक हो जाता है कि शिक्षक और अभिभावक मनोवैज्ञानिक तरीके से बच्चों को अध्ययन के लिए प्रेरित करें। अध्ययन की शिथिलता के दुष्परिणामों को भुगत रहे लोगों के उदाहरणों का अनुभव उनके पास है।बाल मनोविज्ञान के सहारे देश के इन भावी कर्णधारों को जीवन के इस प्रारम्भिक काल में अध्ययन के महत्त्व को समझाना होगा ताकि वे अध्ययन के प्रति जागरूक हो सकें।उनकी सीख विद्यार्थियों के लिए हितकर है इसका भरोसा विद्यार्थियों को हर हाल में हो जाना चाहिए। इसके लिए विविध क्रियाकलापों और प्रेरक साहित्य का पाठन सहायक सिद्ध होगा जो व्यक्तिगत रूप से विद्यार्थियों और समाज के हितकर होगा।"
