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astha singhal

Abstract Inspirational

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शांति का प्रतीक

शांति का प्रतीक

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सुबोध एक बहुत ही अच्छा चित्रकार था। बहुत नाम था चित्रकारी जगत में उसका। जब भी उसके बनाए चित्रों की प्रदर्शनी होती थी उसकी बहुत तारीफ होती थी। उसकी चित्रकारी में एक जादू था। जो भी देखता उसे असीम शांति का अनुभव होता था। 


एक बार एक बहुत बड़ी प्रदर्शनी का आयोजन हुआ। देश भर के चित्रकारों ने शिरकत की। जीतने वाले को इनाम भी बहुत तगड़ा मिलने वाला था। 


सुबोध के प्रशंसकों ने भी उसे प्रतियोगिता में भाग लेने को कहा। सुबोध को कभी भी इनाम का लालच नहीं रहा था। चित्रकारी उसके रग- रग में बसी थी। वो कभी भी पैसों के लालच के लिए चित्रकारी नहीं करता था। तभी शायद उसकी चित्रकारी में सुख और शांति का अनुभव होता था। 


क्योंकि उसके बनाए चित्र शान्ति का प्रतीक माने जाते थे, इसी वजह से उसके दोस्त और प्रशंसक उसे इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए बाध्य कर रहे थे। क्योंकि इस प्रतियोगिता का शीर्षक था "शांति का प्रतीक"। जो भी चित्रकार इस प्रतियोगिता में भाग लेगा उसे एक ऐसा चित्र बनाना था जो शांति, सुकून और प्यार को प्रदर्शित करता हो। और सबका मानना था कि ऐसा चित्र केवल सुबोध ही बना सकता था। 


प्रतियोगिता का दिन भी आ पहुंचा। देश भर से सौ से भी अधिक प्रतिभागी आए थे। प्रतियोगिता प्रारंभ हुई। सब चित्रकार लग गये अपने रंगों से एक खूबसूरत, जानदार तस्वीर को बनाने में। 


प्रतियोगिता खत्म होने के बाद सभी चित्रकार अपनी-अपनी चित्रकारी जमा कर बाहर आ गए। प्रतिस्पर्धा का परिणाम एक दिन बाद एक भव्य समारोह में घोषित किया जाना था। 


अगले दिन एक बड़े से हॉल में शहर का लगभग हर नामी-गिरामी व्यक्ति मौजूद था। सब बेसब्री से परिणाम जानने को उत्सुक थे। स्टेज पर पांच तस्वीरें रखीं थीं। उन सब पर पर्दा ढक रखा था। 


परिणाम घोषित होने आरंभ हुए। पाँचवें स्थान पर जिस चित्रकार की पेंटिंग थी वो‌ गज़ब की सुंदर पेंटिंग थी। चौथे स्थान पर जो पेंटिंग थी उसके रंग इतने आकर्षक थे कि आंखों को एक नयी ताज़गी प्रदान कर रहे थे। तृतीया स्थान पर प्राप्त करने वाले चित्रकार ने आध्यात्मिकता की एक ऐसी सुन्दर तस्वीर बनाई कि मन में आस्था और श्रद्धा के भाव उत्पन्न हो गये। मन एकदम शांत हो गया। 


अब बची थीं केवल दो पेंटिंग। जिसमें से एक पेंटिंग सुबोध की थी। मंच पर खड़े सहायक ने‌ दोनों पेंटिंग के ऊपर से पर्दा उठा दिया। 


पर्दा उठते ही लोग हैरान रह गए। एक तरफ सुबोध की बनाई पेंटिंग थी। उसने कश्मीर की हसीन वादियों को जैसे हूबहू सामने लाकर खड़ा कर दिया था। इतना सुंदर चित्र बनाया था उसने कि ऐसा लग रहा था कि साक्षात हम कश्मीर की वादियों में खड़े थे। इतना सुकून और इतनी शांति मिल रही थी। और ऐसी वादियों से तो अपने आप प्यार हो जाता है। 


दूसरी तरफ एक नये उभरते कलाकार की पेंटिंग थी। जिसे देख सब हैरान हो गए। उस पेंटिंग में तुफान के दृश्य को चित्रित किया गया था। तेज़ हवाएं, टूटते पेड़, गिरते मकान। हर तरफ बरबादी का मंज़र था। सब हैरान थे कि इस चित्र को प्रथम दो चित्रों में स्थान कैसे मिला?


शहर के मेयर मंच पर आए और विजयता का नाम घोषित किया। जैसे ही नाम घोषित हुए तालियों की जगह सन्नाटा था। सब एकदूसरे से कानाफूसी कर रहे थे। सब चयनकर्ताओं पर उंगली उठा रहे थे। क्योंकि विजयता सुबोध नहीं नया उभरता चित्रकार अनमोल था। 


मेयर साहब सबकी चुप्पी को समझ‌ रहे थे। वह बोले,

"आप सबका यूं संदेह एवं प्रश्न करना जायज़ है। परन्तु हमने अनमोल की पेंटिंग को प्रथम पुरस्कार क्यों दिया, मैं इस पर कुछ प्रकाश डालना चाहता हूं। दरअसल सुबोध की पेंटिंग उत्कृष्ट है। सच में सराहनीय है। बर्फ़ से ढके पहाड़, वादियां, झरने, सच में हमें शांति और सुख का अनुभव कराते हैं। स्वर्ग से सुंदर इस धरती पर शांति, सुकून और प्यार नहीं मिलेगा तो कहां मिलेगा?


पर यदि हम अन्मोल की तस्वीर देखें तो हमें उसमें भी शांति, सुकून और प्यार के भाव नज़र आएंगे। चित्र में भले ही तूफान को प्रदर्शित किया गया है, पर ध्यान से देखिए इस चित्र को। इसमें भरे तूफान में भी एक पेड़ पर चिड़िया का घोंसला है, जहां चिड़िया इतने तूफान के बावजूद भी शांति से, प्यार से अपने बच्चों को खाना खिला रही है। उसके चेहरे पर सुकून के भाव हैं। और ये सुकून इसलिए है क्योंकि उसे भगवान पर पूरी श्रद्धा और विश्वास है कि वो उसके इस घरौंदे को टूटने नहीं देंगे। 


शांत और सुंदर वातावरण में तो किसी को भी सुकून और शांति का अनुभव हो सकता है, पर जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मन की शांति और‌ सुकून को बरकरार रख सकता है , वही जीवन में सफल हो सकता है। और यही है इस पेंटिंग द्वारा दिया जाने वाला सन्देश है।" 


मेयर के मुंह से ये सुन कुछ पलों के लिए सब ख़ामोश हो गये और फिर पूरे हॉल ने तालियों के साथ अनमोल का स्वागत किया। सुबोध ने आगे बढ़कर अनमोल को गले लगा लिया और उसे शाबाशी दी। 


ये छोटी सी कहानी हमें ये संदेश देती है कि ज़िन्दगी में विपरीत परिस्थितियों में भी जो अपने मन को शांत और एकाग्र रख सकता है, वही व्यक्ति उन विपरीत परिस्थितियों से लड़ सकता है। 



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