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Sarita Maurya

Abstract


4.7  

Sarita Maurya

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शांत जलजला

शांत जलजला

5 mins 233 5 mins 233

कॉलेज की जान था वो, हर महफिल की शान था वो, जहां भी जाता सारे छात्र मानो मधुमक्खियों की तरह वहीं खिंचे चले आते। पर उसे इसका गुमान नहीं था क्योंकि वो अपनों के लिए कभी हीरो नहीं बन पाया, उनके लिए वो सब नहीं कर पाया जो एक आम व्यक्ति करता है। करता भी कैसे उसे तो लोगों के लिए खास बनना था तभी तो उसे घास के मैदान में, किसी सार्वजनिक बेंच पर अथवा घर के मुलायम बिस्तर पर कोई फर्क नहीं पड़ता था। सोना है कहीं भी सो लेंगे, खाना मिले न मिले काम चला लेंगे, जेब में चाय के पैसे हों न हों लेकिन अगर किसी को जरूरत पड़ गई तो उसके लिए जमीन आसमान एक कर देंगे। ये सब होता इतनी शांति से था कि आवाज भी नहीं होती थी और यूनिवर्सिटी प्रशासन के नीचे की जमीन दरकने लगती थी और छात्र अहित करने से पहले ही उन्हें वह लम्बी -चौड़ी गंभीर शख्सियत और उसपर सादगी से परिपूर्ण लेकिन ओजभरी आंखें याद आ जाती थीं।

जब उसे पता चला कि उसके कॉलेज में पढ़ने वाली किसी लड़की को कुछ आवारा किस्म के छात्रों ने घर से उठा लेने की धमकी दी थी, जिसकी वजह से वह न सिर्फ कॉलेज छोड़ रही थी बल्कि परिवार शहर छोड़ने पर आमादा था तो सीधे पहुंच गया उन छात्रों के मुखिया के पास और एक चुनौती दे डाली कि या तो वह सही रास्ते पर आ जाये या परिणाम के लिए तैयार रहे। किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि उसने इतने बड़े गैंग को निहत्थे ही बिना किसी घातक वार के मात्र अपनी आंखों से इतना डरा दिया था कि वे कोई भी गलत कदम नहीं उठा सके।

खबर फैलते-फैलते सकारात्मकता की खुश्बू बन गई और छात्रों में उसकी हीरोपंती की कहानियां गूंजने लगीं तो शिक्षक और दूसरे प्रशासनिक गुट भी उसका लोहा मानने लगे। लेकिन उसके लिए ये जिंदगी की एक सामान्य घटना थी जो आकर गुजर गई। कोई गुमान नहीं कोई हीरोगिरी नहीं बल्कि एक और जिम्मेदारी के अहसास ने उसे जकड़ लिया कि वह कोई ऐसा काम न करे जिससे उसकी छवि धूमिल हो जाये। दिल ऐसा दरिया था कि जेब में कौड़ी और पेट में रोटी न हो तो भी खुद से ज्यादा सामने वालों की फिकर होती थी।

इस दिल के अमीर का दिल तब तार-तार हो गया जब उसकी पत्नी के परिवार ने उससे नाता तोड़ लिया क्योंकि उसके पास स्थाई घर नहीं था और बेहिसाब पैसा नहीं था। उसका दिल तब भी अकेला था जब असमय उसके भाई ने दुनिया को अलविदा कर दिया और पीछे छोड़ गये अपने परिवार की जिम्मेदारी। भाई से हुई जुदाई हो या माता-पिता की सांझा यादें वो कभी किसी से न कह पाया कि अपनी उसकी भी एक दुनिया थी जहां वो अकेला था नितांत अकेला, जब भावनाओं से भरे वातावरण की ज़रूरत होती तो उसके पास व्हिस्की की एक बोतल और खाली कमरा होता था, उस समय की आंखें और उस समय का दिल, चेहरे पर तिरती लकीरें अगर कोई देख लेता तो अपना जीवन ही उसपर वार देता। लेकिन हर अगली सुबह उसे जाने कौन सी नई रोशनी और ऊर्जा दे जाते जहां बस औरों का खयाल ही रह जाता था अपना अस्तित्व सिमटता नहीं वरन् पूरा ही मिट जाता था। 

वर्ष 2004-2005 में एक साथ 4 से 7 हजार लोगों को नागरिकता दिलवाना उसी के जीवट कदमों से संभव हो पाया। जीवन के बसंत यूं ही गुजरते रहे, लोगों ने उसकी काबिलियत देखकर उसे राजनीति में उतरने का न्योता दिया, कोई राजनीतिक पार्टी अछूती न रही जो उसे अपने दल में लेना न चाहे। लेकिन वह तो स्थितिप्रज्ञ था, कर्मयोगी तो फिर एक कर्मयोगी दलगत, या किसी एक विचार समूह का नेता कैसे बन सकता था।

छात्र जीवन से निकल कर विस्थापितों को नागरिकता दिलाने, बेघरों को घर का दर्जा हासिल करने की उसकी जिजीविषा ऐसी ज्वलंत हुई कि उसे पता ही नहीं चलता था कि कब वो भूखा था, कब उसके पास अच्छे या ब्रांडेड कपड़े नहीं थे या कि उसे अपने लिए एक घर एक परिवार की भी दरकार थी। वो शांत योगी लाखों विस्थापितों को नागरिकता दिला चुका चुका है लोगों के दिलों में भगवान सी भक्ति पा रहा है, हर सरकार, हर पार्टी उसकी बातों को नकार नहीं पाती, उसकी एक आवाज पर विस्थापित समुदाय उमड़कर खड़ा हो जाता है।

आज भी जिले से लेकर राज्य और देश का शासन उसकी बातों को तरजीह देता है। और ये कर्मयोगी आज भी शांत, साधारण किसी विस्थापित का दर्द नहीं झेल पाता और दौड़ा चला जाता है बस एक आवाज, एक सिसकी पर बिना किसी भेदभाव के मानों कोई अनजानी शक्ति हरपल उसे खींचती है कुछ नया, कुछ बेहतर करने को ताकि हर विस्थापित का दर्द उसका दर्द बन जाये, आज भी उसके चेहरे पर वही कसमसाहट रहती है कि कहीं कोई परेशान है काश हर दर्द हर परेशानी वो उठा पाता? लाखों लोगों को अपना दीवाना बनाकर, जीवन के 62 बसंत होम करने के बाद भी अगर वो ये कहता है कि मैं तुम्हारे लिए हूं बताओ तुम्हें क्या कष्ट है, मैं प्रयास करूंगा तो मेरे लिए वो अकेला शांत जलजला ही है जो जब भी आता है लोगों की बेहतरी के लिए। मुझे तलाश है ऐसे ही और जलजलों की जो मुझसे कहें -आपको कहानी लिखनी हो तो लिखिये लेकिन मेरा नाम नहीं क्योंकि मुझे शर्म आती है कि कोई मेरी तारीफ करे। क्षमा करना हिंदूसिंह मेरी नज़र में तुम शांत जलजले हो तुम्हारी इसी अदा की दुनिया मुरीद है और मैं भी। 


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