namrata srivastava

Abstract


3.4  

namrata srivastava

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साँझे का वियोग

साँझे का वियोग

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कल की शाम कमल भैया को ट्रेन में बिठाकर विदा करने के बाद प्रफुल्ल जी खाना खाकर सो गए। पर आज सुबह उठने के बाद उन्हें पूरे घर का वातावरण कुछ हल्का और खुशनुमा सा लग रहा था। साफ-सुथरा झाड़ा-बुहारा दुआर और फूलों की क्यारियों में सिंचाई, जिससे फूलों का छः माह से कुम्हलाया रूप कुछ सजग और चौकन्ना सा लग रहा।


प्रफुल्ल जी के पिता समर्थ बाबू पत्नी के वियोग से ऐसे चित हुए कि ऐसा लगा कि अब तो मानो जीवन से सन्यास ही लेने वाले हैं। पत्नी को गुजरे हुए छः माह बीत गए परंतु उनके लिए तो समय जैसे रुक सा गया था। वे बिछावन के साथ जड़ से हो गए थे। पत्नी की याद हर पल कल्पाती रहती थी। कातर नेत्र आकाश की ओर से हटते ही नहीं थे। पैतालीस वर्षों का साथ चलचित्र की भांति चलता रहता। न खाने-पहनने की सुध न घर-घाट की चिंता, न किसी से बोलना न चालना। सत्तर वर्षों की संयमित दिनचर्या टूटी हुई काँच की चूड़ी के समान हो चुकी थी जिसे पहना तो नहीं जा सकता पर उससे चोटिल होने की पूरी गुंजाइश रहती है।


समर्थ बाबू के तीन पुत्रों में प्रफुल्ल बाबू उनके मँझले बेटे थे जो पिताजी की हालत से बिलकुल हताश हो चुके थे। डॉक्टर की दवा और उनकी सेवा का कुछ भी लाभ नहीं हो रहा था। वे अपने पिताजी को हर प्रकार से समझा कर हार चुके थे पर पिताजी अपने कष्ट के आगे कुछ समझने को तैयार ही नहीं थे। प्रफुल्ल जी ने पत्नी तारा देवी से मशवरा किया, "सोचता हूं कमल भैया को फोन करके बुला लूँ, मुझे बड़ी चिंता हो रही है। मां तो रही नहीं पर पिताजी जीते-जी मरणग्रास लगा रखे हैं।" पत्नी ने भी हामी भर दी। प्रफुल्ल जी ने बड़े भाई कमल जी को सब हाल फ़ोन पर कह सुनाया और कहा कि, "भैया समझ में नहीं आ रहा है कि पिताजी कैसे ठीक होंगे? मैं संकोच वश फ़ोन नही कर रहा था कि आप तमिलनाडु से यहां आ सकेंगे या नहीं पर फिर मैंने सोचा कि शायद पिता जी आपकी बात मान लें। मैं विनय को भी बुलवा लेता हूं।" कमल बाबू पिताजी के बारे में सुनकर कुछ सोचने से लगे थे। फिर प्रफुल्ल जी से बोले कि, "नहीं-नहीं विनय को सूचित कर दो लेकिन उसे आने की आवश्यकता नहीं है। मैं घर आ रहा हूं निश्चिंत रहो।"


प्रफुल्ल जी ने बड़े भाई का चरण स्पर्श किया और यात्रा की कुशल-क्षेम पूछी। कमल जी ने भाई को ढांढस बंधाया और उनसे धैर्य धरने के लिए बोला। आगमन के बाद सत्कार की खानापूर्ति के बाद कमल जी ने शांत क़दमों से पिता जी से मिलने के लिए उनके कमरे में प्रवेश किया। छह माह बाद भी वहाँ मरघट जैसा सन्नाटा महकता सा लग रहा था। मां की कमी घर के हर कोने को खल रही थी किन्तु पिताजी का यो बेहाल होना उससे कहीं ज्यादा अखर रहा था। कमल जी ने पिताजी का ज्यों ही चरण स्पर्श किया वह "कमल!...तुम्हारी मां... तुम्हारी मां” कहते हुए बेतहाशा रो पड़े। वेदना के इन अश्रुओं में समर्थ बाबू के साथ कमल जी भी बह गए, पर उनके नेत्रों में भर रहे आंसुओं में 'दो रंगों का रुदन' चल रहा था। पाँच मिनट बाद वातावरण में कुछ निर्लिप्तता आई। कमल जी अपनी द्वन्दता को समेटे अपने पिताजी की आंखों में झांक तो ना सके लेकिन नजर फेर कर जो कुछ भी उन्होंने आगे कहा उससे पिताजी की शोकावस्था को तीव्र झटका लगा। कमल जी ने पिता जी से कुछ यूं स्वर साधा, "पिता जी! कृपया शांत हो जाइए.... मैं कमल... आपका ज्येष्ठ पुत्र.... जिसने जीवन भर आपके बताए मार्ग का अनुसरण किया, आपके हर आदेश का पालन किया, आपको जिस पर सबसे ज्यादा गर्व है; आपने अपने परिचितों, अपने पड़ोसियों के समक्ष जिसकी सर्वाधिक सराहना की.... आज कृपया बस एक बार ध्यान से मेरी बात सुनने का कष्ट करें और मनन करें पिताजी। मेरा विनम्र निवेदन है आपसे।" समर्थ बाबू में मानो अपने प्रिय पुत्र की वाणी से कुछ चेतना जागी- "हाँ, कहो बेटा! अब इस घड़ी में तुम्हारा ही आसरा है।"



समर्थ बाबू पुनः अश्रु-लीला की ओर फिर बढ़ते इससे पहले ही कमल जी बोल उठे- "पिताजी! मां की कमी आपके साथ हम सब के लिए भी अपूर्णीय क्षति है, पर शोक के नाम पर जीवन को तिरोहित नही किया जा सकता। जीवन साथी के बिना जीना या तो नाटक कह लें या फिर कृत्रिम शृंगार पर शेष जीवन को तो कैसे भी बिताना ही पड़ेगा। विधि की लेखा में जिसकी जितनी आयु है उसे पूर्ण तो करना ही होगा, है ना पिता जी!" कमल जी अनवरत संवाद कर रहे थे- "आप मां के वियोग में छह माह में ही कितने रुग्ण और दयनीय दशा अवस्था में पहुंच गए, पर मैं तो अठारह सालों से इस दंड को भुगत रहा हूँ।"


समर्थ बाबू कुछ चौक से गए... कमल जी की बात उन्हें बिजली सी कौंध गयी और कमल जी बिना रुके अपनी स्मृतियों के दंश को बाहर उलीचना प्रारम्भ कर दिए, "


अठारह साल गुजार दिए मैंने सिद्धप्रभा के बिना। अपनी नीड़ में आप पैतालीस वर्षों तक मां के साथ रहे पर...पर मैं तो सिद्धप्रभा के साथ अपने नीड़ का स्वप्न भर देख पाया और उसी स्वप्न के साथ अठारह वर्षों से भटक रहा हूं। पत्नी वियोग से आप त्रस्त हैं इसे तो पूर्ण जगत जान गया पर सिद्धप्रभा के वियोग में मेरे ग्रसित होने की तो किसी को हवा भी ना लगी। मेरे प्रेम में पैतालीस वर्षों के दिन-रात भले ना हो पर मेरे पैतालीस लाख रोमिलों पर आज भी सिद्धप्रभा का ही नाम अंकित है। आपने अपने साथी के साथ हर पल, हर सुख-दुख बाँटा, पर मुझे तो इस का भी संयोग ना मिल सका कि मैं उसके साथ चार दिन भी सुख-दुख बाँटूं। पाँच बरसों की पहचान में मैंने भली-भांति जान लिया था कि वही मेरी संगिनी बन सकती थी। उसके बिना विवाहोपरांत जीवन की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता था। वह मेरे मन की अतल गहराइयों में कितनी भीतर तक उतरी थी यह तो मैं भी ना जान सका।"


इतनी बातों तक पिताजी का पूरा ध्यान और कान कमल जी के मुख से प्रवाहित हो रहे संवादों पर अटक गया, वे अपने आँसू और दुख भूल गए, जैसे किसी रोते हुए बच्चे को दानवी चित्र दिखाकर, डरा कर चौकन्ना कर दिया गया हो। कमल जी भावाप्रवाह बोले जा रहे थे, "आपने मां के साथ पैतालीस वर्ष बिताए पिताजी! और मैंने तो सिद्धप्रभा के साथ मात्र चार-पांच वर्षो का असिंचित प्रेमालाप ही किया पर मैं उसे आजीवन अनुभूत कर सकता हूं। आपने अपने प्रेम-भाव का समुचित उपभोग किया, सुखी गृहस्थ जीवन और दांपत्य जीवन को पूरा किया। आप जीवन के उस मोड़ तक आए जहां सभी दायित्वों की पूर्ति के पश्चात बस किनारे लगना ही बाकी रह जाता है।..... और मेरी सिद्धप्रभा! उसका साथ मेरे लिए केवल कल्पना मात्र बनकर रह गया। मैं तो अपने दायित्वों का शुभारंभ भी ना कर पाया कि तभी मुझे अलगाव की पीड़ा झेलनी पड़ी, मेरी नीड़ के तिनके निर्माण के पहले ही उड़ गए। कैसे कहूं? लाख प्रयत्न के बाद भी मैं उन स्वप्नों में जाने से स्वयं को नही रोक पाता, जो मैंने सिद्धप्रभा के साथ देखे थे।" कमल जी के अंतस से आज सब कुछ बह जाना चाहता था, सारे बांधों को तोड़कर, "पिताजी मेरे पत्नी नामक कल्पना चित्र में बस सिद्धप्रभा अंकित थी पर आपको उसकी सामाजिक हैसियत पर आपत्ति थी, उसके वर्ण पर आपत्ति थी; आपने जिस दिन मुझसे उसे छोड़ देने को कहा मैंने... आपके आज्ञाकारी पुत्र ने उसे छोड़ दिया। आपके आदेशानुसार मैं अपने प्रेम को छोड़ तो आया पर उस दिन से आज तक पल-पल मैं उसी आग में जला हूँ, जिसमें सिर्फ छः माह से आप जल रहे हैं।"


कमल जी- "आपने मेरे लिए कृत्रिम जीवन मार्ग को प्रशस्त कर दिया। किसी कठपुतली की भांति मैंने विवाह किया, सभी कर्तव्यों का पालन किया, आपको बहू और पोते-पोतियों का सुख देकर मैंने पारिवारिक जीवन का सफल आदर्श प्रस्तुत किया पर सबकुछ आपके लिए, आप की पसंद पर।.... पर... मेरा अस्तित्व तो अपनी सिद्ध प्रभा की खोज में ही लगा रहा, उस वेदना की आंच तो कभी मंद हुई ही नहीं। आपकी बहू से जब-जब असहजता हुई तब-तब मैं फूट-फूट कर रोया, ऐसे में मुझे सिर्फ सिद्धप्रभा ही याद आई। यदि वो मेरी संगिनी होती तो सब कुछ संभाल लेती। मैं उसके साथ हर परिस्थितियां सरलता से बांट लेता। पिताजी मेरी घुटन जब भी मेरे काबू से बाहर हुई हर बार आँसू बनकर नेत्रों से सिद्धप्रभा के नाम पर प्रवाहित हुई है।" कमल जी मानो अपने भीतर के सारे अवसाद आज साफ कर देना चाहते थे। कमल जी- "अस्थि-विसर्जन के बाद हम फिर कभी मां को नहीं देख पाए, बल्कि यह तो किसी के भी अंतिम दर्शन की एक क्रिया होती है पर उस आखिरी भेंट के बाद मैं सिद्धप्रभा को कभी नहीं देख पाया, हम दोनों एक दूसरे के लिए जीते जी मर गए। आपका वियोग-दुख बांटने के लिए सभी संबंधी परिचित, मित्र, परिवार आपके साथ है पर मेरा वियोग-दुख मुझे अकेले ही उद्वेलित करता, काटता-चीरता रहता है। मैं उसे कहां बाँटूँ? उसका आश्रय तो मेरे सपनों के खंडहर में है। किसी का हृदय तोड़ने की यही सजा है और मैं अपनी खुशी से इसे चुपचाप भुगत रहा हूं।"


"बस कमल! बस, मैं तुम्हारा अपराधी हूं।" पिताजी ने झट से कमल जी के शीश को अपनी स्नेह-छाया से ढक लिया।"


आज प्रफुल्ल जी पिताजी की वह संयमित दिनचर्या देखकर चकित हैं और प्रसन्नचित भी। प्रफुल्ल जी पत्नी तारा देवी से कहने लगे, "देखा तारा! कमल भैया को बुलाने का मेरा निर्णय बिल्कुल ठीक रहा, मेरा विश्वास था कि पिताजी भैया की बात कभी नहीं टालेंगे।




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