Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract Tragedy


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract Tragedy


रतित्वबोध

रतित्वबोध

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मायके से विदा होकर लालसा कार में बैठकर ससुराल पहुँची। गाँव के बाहर पहुँचते ही कार रुकी और देखते ही देखेते कुछ लड़कियां और छोटे बच्चों ने कार को घेर लिया।कोई बोल रहा था चाची आ गयी ,कोई बोल रहा था भौजी आ गयी । गाड़ी के करीब से गुजरती औरतों ने अंदर नजर डालते हुए कहा मनीष बाबू को तो लॉटरी लग गई। इतनी सुंदर लुगाई मिली है। घूँघट में सिमटी ,सर झुकाए लालसा चुपचाप बैठी थी ।

तभी एक अधेड़ उम्र की महिला और उसके साथ एक जवान लड़की तेज कदमों से चलते हुए कार की तरफ बढ़ी आ रही थी। मनीष ने धीरे से लालसा के कान में कहा फुआ और बहन आ रही हैं जरा अच्छे से बैठ जा। तबतक कार के दूसरी तरफ आकर पालकी भी रखा गया ।

फुआ जी ने आते ही दुल्हन की तरफ का गेट खोल और थोड़ा सा पानी गिराया । कर से उतारकर दुल्हन को डोली में बिठाया गया और डोली चल पड़ी पुरबारी टोला स्थित 'बुढ़िया माई' के दरबार ।यह गांव की परंपरा थी की गांव में आने वाली किसी भी बहु को घर के अंदर प्रवेश करने से पहले बुढ़िया माई का आशीर्वाद लेना जरूरी है। अन्यथा कुछ ना कुछ अपशगुन होगा।

बुढ़िया माई के दर्शन के बाद घर मे घुसते समय डेगा-दउरा का नेगचार हुआ। पुरा दिन बहु के रूप में लालसा का कार्यक्रम एकदम व्यस्त रहा। इसबीच उसकी ननद मानसी साये की तरह उसके साथ लगी रही।वह अपने भाई से दो साल छोटी थी और भाभी की हमउम्र । उसने भाभी के जरूरत का बड़ी बारीकी से ख्याल रखा। लालसा मन ही मन सोंच रही थी यदि मानसी का साथ नही होता तो इतने नए लोगों का सामना करना कितना मुश्किल होता। उन दोनों में एक स्व्भविक सा लगाव विकसित हो गया।

रात का अंधेरा उतर चुका था लेकिन अभी तक मनीष से लालसा का सामना नहीं हुआ। रात का खाना खाकर वह पलंग पर बैठी अपने पति का इंतजार कर रही थी । लगभग ग्यारह बजने को आ गया लेकिन मनीष अभी तक अपनी दुल्हन के पास नहीं आया। लालसा के लिए सुहागरात का पहला अनुभव था। लेकिन अपने गांव में सहेलियों और लड़कियों से सुहागरात के बारे में जो भी सुन रखा था वह ऐसा तो नहीं था। वह पलंग से उठकर दरवाजे के पास आहट लेने के लिए आयी की उसको कुछ तो पता चले कि मनीष अभी तक क्यों नहीं आया। ससुराल में आज पहला दिन था और वह किसी से पूछ भी नहीं सकती थी की उसका पति कहां है और किस हाल में है। फुआ धीमे स्वर में यह कह रही थी "मनीष को कम से कम आज तो यह नहीं करना चाहिए । बेचारी दुल्हन पर यह घनघोर अत्याचार है। ससुराल में कोई भी लड़की एक चुटकी सिंदूर से बनी लक्ष्मण रेखा के भरोसे ही तो अनजान लोगों को अपनाती है। लेकिन उस भरोसे पर भरोसा पति के भरोसे ही बनता है और यहाँ पति महोदय ही गायब हैं। आज तो वो कलमुंही रमकलिया के घर भी नहीं मिला। मालूम नही किस उजरा टाँड़ पर पी-खाकर बेसुध पड़ा होगा ।"

तभी हांफते हुए मानसी आयी और फुआ से बोली जरा धीरे बोलो अगर भाभी ने सुन लिया तो उनको दुख पहुंचेगा। भैया मिल गया है ।वह रमकलिया के घर से लौटते समय नाली में गिरा पड़ा था। दालान पर ही माँ उसको स्नान करा रही है। मुझे तो समझ मे नहीं आ रहा है कि भाभी को क्या समझाऊँगी।

लालसा ने मन ही मन सोंचा उसे अब समझाने की कोई जरूरत नहीं है । जिसके साथ पूरी जिंदगी गुजारनी है उसका भर नजर दीदार भी नही हुआ और उसका चरित्रनामा खुलकर उसके सामने आ गया । शायद इसके इसी आचरण के चलते इनलोगों ने एक गरीब की बेटी से शादी किया होगा। मेरे बाबूजी को तो ऐसे घर के लड़के से शादी का अवसर ही बेटी का भाग्योदय लग था। अब वह अपनी किशमत पर सुबकते हुए जाकर औंधे मुँह पड़कर रोने लगी। रोते -रोते न जाने कब निद्रा देवी ने उसको सुला दिया या अप्रत्यासित सदमा से मूर्क्षित हो गयी।

सुबह जब उसकी नींद खुली तो देखा कि एक आदमी उसके बगल में सोया हुआ है। उसने अनुमान लगाया कि यही मनीष होगा ।घूँघट की ओट से जितनी झलक उसने मनीष का देखा था उस हिसाब से वह मनीष ही था। यह शादी माँ बाप ने तय की थी और सब चीज बाबूजी को इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने लड़के का फोटो तक नही माँगा। अतः लालसा ने शादी से पहले अपने पति का फोटो भी नहीं देखा था। अब नींद खुली तो परिस्थिति के आधार पर अनुमान लगाना पड़ रहा है कि यही मेरा पति होना चाहिए। भगवान किसी भी अभागन को ऐसा प्रथम पतिदर्शन न कराए । प्रथम मिलन की कल्पना भी अकल्पनीय है ।

लालसा अपने भाग्य को कोस रही थी कि इसी शराबी-कबाबी को प्यार करना पड़ेगा जिसको यह भी होश नहीं की कहाँ बेहोश पड़ा है। उसे अपनी सहेली की बात याद आयी जो पिछले हप्ते अपने ससुराल से वापस आयी थी । उसने अपने सुहागरात का इतना रंगीन और दिलकश किस्सा सुनाया था । वह जब मुझसे पूछेगी तो मैं क्या बताऊँगी ! सच बता नही पाउँगी और झूठ तो वह चुटकी बजाते पकड़ लेगी । वो तो पहले से ही लाल बुझक्कड़ थी और अब तो अनुभवी भी हो गयी है ।


वह जैसे ही कमरे से बाहर निकली उसकी ननद उसके सामने जिन्न की तरह प्रगट हो गयी और बोली भाभी आपको कोई मदद चाहिए तो बता देना। लालसा ने मुस्कुराते हुए कहा नही अभी नही ।जब रारुत होगी तो बोलूंगी । मैं जरा मोरी पर से आती हूँ।


 मानसी - भाभी आप फ्रेश होकर आवो तबतक मैं आपके लिए गरमागरम चाय लाती हूँ।

चाय पीते समय मनिसा ने कहा भाभी मैने आपके लिए पानी भर दिया है। लोगों की आवाजाही शुरू हो उससे पहले आप स्नान कर लीजिए। आज अडोस पड़ोस की औरतें मुंह दिखाई के लिए आएँगी । आप तो वैसे ही बहुत खूबसूरत हैं फिर भी आज मैं आपको सजाऊँगी ताकि लोग मेरी भाभी को देखते रह जाएं।

 लालसा ने मन ही मन सोंचा जिसके लिए श्रृंगार किया था उसने तो भर नजर देखा भी नहीं। अब शोपीस बनने का क्या फायदा । फिर भी उसने मुस्कुराते हुए मानसी को बोला आप जो साड़ी पसंद करेंगी मैं वही पहन लूँगी । आखिर मेरी ननद के इज्जत का सवाल है। आपकी भाभी की बाहबाही आपको मिलनी चाहिए। 

मानसी खुश हो गयी और भाभी के गले मिली और उनका हाथ पकड़कर सूटकेस के पास ले गयी। अपने पसंद का साड़ी निकाला और बड़ी यत्न से भाभी को तैयार किया ।

आज का पूरा दिन भी उसका व्यस्त ही रहा मुंहदिखाई के रस्म में - गांव के हर उम्र की औरतें लड़कियाँ दुल्हन का मुँह देखने के लिए आती रहीं। मनिसा घूँघट उठाकर भाभी का चेहरा दिखाती और लालसा की आँखें बंद रहती। जब कोई परिवार का करीबी व्यक्ति आता तो मानसी के कहने पर लालसा आँख खोलती । आज पुरा दिन वह मानसी के इशारे पर गुड़िया की तरह पलकें खोलती और बंद करती ।

मानसी की भाभी की खूबसूरती की जब प्रशंशा होती तो उसका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता । बहुत सारी महिलावों ने दूधो नहावो-पुतो फलो का आशीर्वाद दिया। आंगन में जाकर सभी औरतें अपने ढंग से दुल्हन की सुंदरता के आकलन का वर्णन आपस मे और सासु माँ से करतीं थी।

पूरा दिन गुजर गया लेकिन मनीष और लालसा की मुलाकात या बातचीत नही हुई। हाँ, उसने आँगन में मनीष को आते जाते जरूर देखा था।फिर वही रात आयी और लालसा का पियामिलन का इंतजार शुरू हो गया ।

कल के अनुभव के आधार पर वह वह आँख बंद करके दिवार की तरफ मुंह किए सोने का प्रयास करने लगी।अभी कुछ ही समय बिता था की कमरे में किसी के आने की आहट मिली ।लालसा को यह अनुमान लगाने के लिए कोई खास कोशिश नहीं करनी पड़ी की कौन आया है। लड़खड़ाते कदम और शराब की बदबू ने परिचय दे दिया कि "लालसा मनीष चौधरी" में के मनीष जी पधार चुके हैं । फिर भी वह सोने का बहाना कर यथावत पड़ी रही ।

मनीष आकर पलंग पर उसके बगल में लेट गया और उसको झकझोरते हुए बोला "आज फिर सो गई क्या?"

फिर उसका करवट अपनी तरफ फेरने का प्रयास करने लगा।

लालसा मन ही मन सोंचने लगी शायद ऐसे ही मौके पर कहा जाता होगा उल्टा चोर कोतवाल को डांटे । लेकिन वह कोतवाल नहीं थी । वह एकदम से उठकर बैठ गयी और धीरे से बोली जी थोड़ी आँखे सट गयीं थी।


मनीष - यह सब नहीं चलेगा ।पत्नी को पति के आने का इंतजार करना चाहिए।तुम काल भी सो गई थी और आज भी सो गई थी । तमको मालूम होना चाहिए मैं कौन हूँ और मेरी खातिरदारी उस हिसाब से होनी चाहिए। फिर उसने लालसा को अपने ऊपर खींच लिया। इसके बाद बिना एक शब्द बोले उसने लालसा के बदन से जरूरत भर कपड़े हटाकर अपने हवस की पूर्ति की और एक तरफ लुढ़क गया । 

 लालसा अब खुद को लूटी पिटी सी महसूस कर रही थी। उसको समझ में नही आ रहा था कि उसके साथ अभी जो हुआ वो क्या था - सुहागरात या आधिकारिक बलात्कार ।

इसमे उन कोमल भावनावों का नितांत अभाव था जो पति पत्नी के संबंधों का आधार होती हैं। अब जो भी है जैसा भी मेरा पति ऐसा ही है और इसी के साथ निभाना है।निढाल और बेसुध पड़े मनीष को देखकर लालसा को अपने से घिन आने लगी। उसको ऐसा लगा जैसे किसी ने उसे अपवित्र कर दिया ।

इसी प्रकार की भावनात्मक सदमे से गुजरना उसकी नियति बन गयी । उन दोनों का शारीरिक संबंध एक यांत्रिक प्रक्रिया बनकर रह गई। वक्त बिताता गया लेकिन लालसा को मनीष के साथ कभी भी नारी सुलभ आलिंगन का आभास नहीं हुआ।

इसबीच मनीष के चरित्रनामा का अलग अलग पहलू और किस्सा उसके कानों तक पहुंचता रहा। घरवालों ने मनीष को सुधारने का बहुत प्रयास किया। लेकिन सब व्यर्थ साबित हुआ । मनीष की शादी भी उसके परिवार द्वारा की गई एक कोशिश ही थी।

वक्त बिताता गया इस बीच मनिसा की शादी भी हो गयी। वह ननद कम दोस्त ज्यादा थी। उसके चले जाने के बाद लालसा ससुराल में दो साल बाद खुद को अकेला महसूस कर रही थी। वह अपने भाई की बुराई तो नही करती थी लेकिन अपने भाई के चरित्र और स्वभाव से भली भाती परिचित थी। अतः अपनी भाभी के प्रति सहानुभूति रखती थी। व्यक्ति जब हालात का मारा हो तो सहानुभूति के दो बोल या भाव करीबी लगाव उतपन्न करने में सहायक होता है।


मानसी अब माँ बनने वाली थी उसका छठा महीना चल रहा था । अधिकतर औरतें चाहती हैं कि उनका पहला बच्चा मायके में ही पैदा हो यदि माँ जिंदा है। अतः मनिसा को यहाँ काम से कम छह महीना रहना तय था। लालसा अपने ननद का हर तरह से ख्याल रख रही थी ।वैसे भी दोनो में बॉन्डिंग बहुत अच्छी थी ।


एक रोज शाम को दोनो ननद भाभी छत पर खुले में बैठकर चाय पी रही थीं। तभी मानसी ने कहा भाभी एक बात पूछूँ अभीतक आप माँ क्यों नहीं बनी । कुछ मेडिकल प्रॉब्लम है या आप दोनो ने कुछ प्लान किया है।


लालसा - नहीं जी, ऐसी कोई बात नही है । हमलोग पूरी कोशिश कर रहे हैं। लेकिन कोई जरूरी है कि परीक्षा में बैठने वाला हर स्टूडेंट पास ही हो जाए ! हमलोग अभी तक फेल होते रहे हैं । हो सकता है अभी संयोग नही बना हो या यह भी हो सकता है कि मेरे नसीब में माँ बनना नही लिखा हो।


मनिसा ने भाभी के होठों पर उंगली रख दिया जी नही भाभी ऐसी बात मजाक में या भूलकर भी मत बोलो।आखिर मेरे भी कुछ अरमान हैं और हक है ।जब मेरा भतीजा पैदा होगा तो काजल पराई का मोटा नेग लुंगी, अभी से बोल देती हूँ और जितना देर करोगी मेरी मांग भारी होती जाएगी।

बोलते बोलते लालसा के मुँह से निकल गया - शायद बच्चा पैदा करने के लिए स्त्री-पुरुष का होना काफी नहीं है।उसमें नारी सुलभ कोमल भावना की भी भूमिका होती है ।

मानसी आवाक सा अपनी भाभी का मुँह देखने लगी।उसमे कई ऐसे प्रश्न थे जिनको व्यक्त करने में शब्द भी असमर्थ थे ।लेकिन लालसा उन प्रश्नों को समझ रही थी और मानसी उनके उत्तर का अनुमान लगा रही थी ।इस शब्दहीन सम्बाद को कोई तीसरा नही समझ सकता है। जब परिस्थिति शब्द में न समेटी जा सके तो उसको व्यक्त करने का प्रयास न करना भी एक तरह की समझदारी ही कहलाती है।

मानसी - भाभी क्या अभी भी रमकलिया की समस्या जस की तस है?

लालसा - तुम चिंता मत करो । रमकलिया जब से ग्रामप्रधान बनी है इनको घास डालना बंद कर दिया है। अब उसका बड़े लोगों के बीच उठना बैठना हो गया है।जिस औरत को अपना उपयोग करना आ जाता है उसको सामाजिक जीवन मे आगे बढ़ना आसान हो जाता है। अब तो वह ब्लॉक उपप्रमुख भी बन गयी है।

आपके भाई साहब ने दूसरा सहारा खोज लिया है।कोई जुबैदा खातुन है।


मनिसा - जुबैदा तो ऐसी नही थी ।वो तो बचपन मे मेरे साथ ही पढ़ती थी और एकदम सीधी साधी लड़की थी।


लालसा - सीधी गाय ही लुगा चबाती है ! इसमे उसका भी कोई खास दोष नहीं है। सुना है कि उसकी चाची के मौत के बाद उसके बड़े पापा से उसकी जबरदस्ती निकाह करा दी गई। खेत खलिहान में काम करने के सिलसिले में तुम्हारे भाई के संपर्क में आई और तुम्हारे भैया तो पुराने खिलाड़ी ठहरे ।


मनिसा - भाभी , क्या आपको इन बातों से कोई फर्क नही पड़ता है? आप उनको रोकने का प्रयास क्यों नहीं करती ? आखिर यह आपका अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी ।


लालसा ने फिकी हँसी हँसते हुए कहा आप इन झमेलों में नहीं पड़ो तो अच्छा है।पहली रात से आजतक मैंने अपने नारिपन को कभी महसूस ही नहीं किया। जो भी होता है वह सिर्फ तुम्हारे भैया ही करते हैं। मैं तो केवल विस्तर पर पड़ी औरत होती हूँ , पत्नी कभी नहीं।मैंने इसको ही अपनी नियति मान लिया है।


मानसी - भाभी आपकी हालात को जानकर मुझे बहुत दुख होता है।आप इतनी अच्छी हैं। आपने कैसे मेरी शादी उस लड़के से करा दी जिसको मैं प्यार करती थी।आजतक दोनो घरों में किसी को पता नही चला कि यह प्रेम विवाह है।और आपकी खुद की शादी एक असफल शादी के रूप में आगे बढ़ रही है।


 लालसा - पगली जिंदगी को कभी इतना सिरियसली नही लेने का , यह हरपल बदलने वाली चीज है। सफलता का हर किसी का अपना पैमाना होता है। पति का सच्चा प्यार छोड़कर मुझे सबकुछ तो मिला है। किसी को भी सारा जहाँ एकसाथ नही मिलता है- कभी धरती तो कभी आसमान मिलता है। कोई भी पत्नी पति को तभी तक अच्छी लगती है जबतक वह उसके अहम के रास्ते मे नही आती है और अपने आप की तलाश छोड़ देती है।

जिस पल औरत अपनी तलाश में निकलती है चाहे वह वह पढ़ी लिखी आत्मनिर्भर हो या अंगूठाछाप घरेलू महिला सबसे पहले अपने पति के नजर में खटकती है। इस खटकन को साधना ही दाम्पत्य जीवन की सफलता को निर्धारित करता है।


मानसी - भाभी आप इतनी सुलझी हुई और समझदारी भरी बात करती हो और मेरा भाई तो बी.ए. बैल है। सचमुच में हीरे की परख तो जौहरी को ही होती है।मैं तो आपकी सहनशीलता और समझदारी की कायल हूँ।

देखो , बड़ी भाभी मुझे क्या घर के किसी सदस्य को कोई अहमियत नहीं देती हैं।मालूम है, वो बहुत बड़े बाप की बेटी है।उसकी शादी को पंद्रह साल बीत गए हैं लेकिन वह मानसिक रूप से अभी भी मायके में बैठी है।हर बात मेरे यहाँ ऐसा होता है, वैसा होता है।मेरे घर मे यह है वह है। किसी भी बात में मायके का ही उदाहरण पेश करती है। जब उनकी शादी हुई थी तब भैया PWD में इंजीनियर बन गए थे।पहले महीने से उनके साथ बाहर ही रही और इस घर को कभी नही अपनाया। इस घर के सुख दुख से उनको कोई मतलब नहीं है।अब तो बड़े भैया का भी लगभग वही हाल हो गया है। चाभी वाले खिलौने की तरह जितना चाभी भरती हैं उतना ही चलते हैं।

भाभी सच्ची मुची बताना आपको भैया में सुधार की कोई गुंजाइश नही दिखती है?


लालसा ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा जबसे हाई स्कूल के नए प्रिसिपल मनमोहन राय आए है और उनके साथ इनका उठना बैठना शुरू हुआ है। कुछ सकारात्मक बदलाव हुआ है। इनका पीना भी थोड़ा कम हुआ है। सुनने में आया है कि उनकी ही सलाह मानकर गड़हनी बाजार पर इन्होंने अपना अलग दुकान खोल लिया है। नाम 'पुस्तक घर' ही रखा है ।एक तरह से अपना पिरो वाल दुकान का ब्रांच गड़हनी में खोला है। केवल दुकान का किराया और लाइट बिल ही अलग खर्च है क्योंकि स्टॉक तो यहाँ रहे या वहाँ रहे कोई अंतर नही पड़ता है। बाबूजी को भी यह सुझाव अच्छा लगा था।

राय जी ने समझाया कि स्वतंत्र जिम्मेदारी मिलने पर मनीष पर स्वभाविक मानसिक दबाव बनेगा जो इसको सुधारने में मदद करेगा। मुझे तो लग रहा है यह तरीका काम कर रहा है। अपना गाँव सेमराँव लगभग दोनो के बीच मे पड़ता है ।पुराना दुकान वैसे भी बाबूजी ही चलाते हैं। इनके होने या नहीं होने से कोई अंतर नही पड़ता है। जहाँ तक खेती बाड़ी की बात है तो शाम को दोनो लोग घर पर आ ही जाते हैं। काम तो मजदूर को ही करना होता है।


मनिसा - यह राय जी मास्टर भैया के संपर्क में कैसे आ गए और यह उनसे इतना प्रभावित कैसे हो गया !


राय जी बलिया जिला के रहनेवाले हैं। इनका जब यहाँ ट्रांसफर हुआ तो इनके साथ रहने की समस्या आयी। इसके पहले वो सासाराम में किराया पर रहते थे।लेकिन सासाराम से रोज आना जाना संभव नहीं था।फिर किसी ने उनको बाबूजी से मिलने को कहा । बाबूजी ने कहा कि राय जी हमारे घर पर रहिए और आप अपनी जाति वाले हो इसलिए थाली बर्तन का भी झंझट नहीं रहेगा। घर मे जो खाना सब के लिए बनेगा वही आप भी खा लेना । कहाँ दूसरी जगह रह कर हाथ जलाएँगे।

आप अकेले रहेंगे तो दालान पर रहिए और यदि परिवार लाएंगे तो छत पर दो कोठारी बना है आपको दे दूँगा।

राय जी ने कहा परिवार भले घूमने के लिए कभी आ जाए तो अलग बात है, मुझे अकेले ही रहना है।क्योंकि वाइफ वहीं बलिया में टीचर है और बच्चे अभी छोटे हैं वहीं हाइस्कूल में पढ़ते हैं। 

फिर वो अपने यहाँ रहने आ गए ।सुना है बहुत विद्वान हैं।उन्होंने मनोविज्ञान में डॉक्टरेट किया है।वह हमेशा कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। घर के अंदर वो केवल सुबह शाम खाने के लिए आते हैं। वो बरहगुणा हैं। सुना है लोगों को होम्योपैथिक दावा भी देते हैं, सांप - बिच्छू का जहर भी उतारते है। कुछ लोग तो कहते हैं नजर गुजर भी उतारते हैं। किसी को दिन सुदिन दिखाना हो तो पंडित जी के आने इंतजार करने की जरूरत नही है। मौका कुमोका सत्यनाराण भगवान का कथा भी करा देते हैं।

इसके चलते गाँव के हर घर मे उनकी पूछ है। सप्ताह में दो तीन दिन तो उनका किसी न किसी के घर से रात्रि भोज का निमंत्रण रहता ही है।


मानसी - कुल मिलाकर प्रभावशाली व्यक्तित्व के आदमी हैं । मैने भी कल उनको देखा था । देखने मे भी हैंडसम हैं।उम्र भी लगभग चालीस के लपेटे में होगी।


लालसा - सुना है वो अच्छा हाथ भी देखते हैं।तुम्हारा हाथ देखर वो बात सकते है कि तुमको बेटा होगा या बेटी, नार्मल डिलीवरी होगी या सिजेरियन।


मानसी - भाभी , आप भी कुछ बोल देती हो ।भला हाथ देखकर कोई कैसे बता सकता है कि पेट मे बेटा है या बेटी।


लालसा - अच्छा सब छोड़ो , तुम्हार क्या जाता है उनसे एकबार हाथ दिखाने में। वो तो प्रश्न ज्योतिष से डिलीवरी का सटीक समय तक बता देते हैं। माँ जी को बोलकर दिखा लो। कौन सा तुमको इसके लिए लंका कोस जाना है।


अगले रोज अपनी माँ के साथ मानसी राय जी को मिली अपना हाथ भी दिखया। उन्होंने बहुत सी ऐसी बात बताई जिससे मानसी आश्चर्यचकित हो गयी । उन्होंने जब यह कहा की तुम्हारी शादी प्रेम विवाह थी ।इस पर माँ तपाक से बोली , नहीं मास्टर जी यह तो शादी हमलोगों ने देख सुनकर किया है । लड़का मेरे दूर की रिश्तेदारी में से था ।वह मेरी ननद की बड़ी बेटी का देवर है। राय जी ने कहा कि मैंने तो वही कहा जो लकीरें बता रही हैं बाकी तो आपको पता होगा।

इसको एकदम नॉर्मल डेलीवरी होगी और जुड़वा बेटा होगा ।और भी बहुत सारी बात बताई जिसको यकीन करना सहज नहीं था लेकिन उसको सिरे से वो खारिज भी नहीं कर सकती थी।

घर मे आकर उसने अपनी लालसा भाभी को सारी बात बताई ।उन दोनों को इस बात पर आश्चर्य था कि उन्होंने प्रेम विवाह वाली बात कैसे बात दिया। उसने अपनी भाभी को यह भी बताया कि प्रेम विवाह वाली बात पर माँ की प्रतिक्रिया देखने लायक थी।

इसका पूरा श्रेय आपको जाता है।फुआ के बेटे की शादी में शामिल होने का आईडिया आपने बनाया।वहीं पर बबलू भी आया था ।फिर आपने अपने ही अंदाज में फुआ के ममध्यम से बाबूजी को इस शादी के लिए तैयार किया।उधर दीदी को भी आपने ही शीशे में उतारा था और बड़ी बहू होने के चलते उसकी उस घर मे अच्छी पकड़ थी।


लालसा - क्या करूँ , आपने इतनी मासूमियत से मेरी मदद जो माँगी थी। साथ मे यह धमकी भी दिया की यदि यह शादी नही हुई तो आप यह दुनिया ही छोड़ दोगी ।


मानसी - भाभी आपकी स्थिति देखकर एक डर सा मन में बैठ गया था। यदि आपकी जैसी स्थिती का सामना करना पड़ा तो मैं बिखर जाऊँगी।


लालसा ने अपनी ननद का बहुत बढ़िया से ख्याल रखा । वह अपनी माँ से ज्यादा अपनी भाभी पर निर्भर थी। एकदिन वह भी आया जब मानसी ने जुड़वा बेटों को जन्म दिया। राय जी मास्टर की बात अक्षरशः सत्य निकली। कुछ समय बाद मानसी अपने पति के पास गोवा चली गयी। उसका पति नेवी में नौकरी करता था और आजकल गोवा में पोस्टेड था।


लालसा का फिर रूटीन एकाकी जीवन प्रारम्भ हो गया । लेकिन मनीष में बहुत बदलाव आ गया था । उसने शराब पीना लगभग ना के बराबर कर दिया था ।अतः शराब के नशे में पत्नी के रूप में होने वाली ज्यादतियों से उसको मुक्ति मिल गई थी । अब मनीष के विस्तर पर के व्यवहार में भी अंतर आ गया था । पहले उसके हाव भाव से लगता था वह बेमन का पति का फर्ज पूरा कर रहा है और पत्नी पर हसन कर रहा है। लेकिन अब शारीरिक संबंध उसकी जरूरत हो गयी थी।

इस बदलाव का कारण लालसा को स्पष्ट नही हो पा रहा था । यह विकल्प के अभाव का परिणाम था या स्वभाव में परिवर्तन का प्रतिफल।खैर जो भी हो सकारात्मक बदलाव था। कभी कभी कम की व्यस्तताबके चलते जब वह घर नहीं लौटता था तो मन मे एक शंका सी होती थी कहीं गड़हनी में भी कोई नया खाता खुल गया क्या !

लेकिन अब पहले वाली बात नहीं थी पूछे बिना पूछे भी बहुत सी बातें साझा कर लेते थे। मनीष ने स्वयं ही बताया कि राय जी ने उसको सही रास्ते पर लाने में मदद की है। अलग दुकान कर लेने से अब लगने लगा है कि यह मेरा अपना कारोबार है और उसमे वृद्धि की जिम्मेदारी मेरी है। पहले यह सब नहीं सोंच पाता था।

अब शाम को घर लौटते समय अपनी पत्नी के लिए कुछ लेना नहीं भूलता था - कभी समोसा, कभी मिठाई ,कभी शृंगार का सामान वगैरह।


लालसा के लिए यह बदलाव अकल्पनीय था ।लेकिन इस बदलाव का श्रेय भी वह राय जी को दे रहा था। मनीष में हो रहे सुखद एवं सकारात्मक बदलाव को महसूस करके लालसा के मन मे राय जी के प्रति कोमल आकर्षण विकसित होने लगा था। उनके प्रति वह एक खिंचाव महसूस करने लगी थी।

अपने अंदर हो रहा यह बदलाव उसके लिए भी एक पहेली बनता जा रहा था। वैसे तो प्रतिदिन वह राय जी को एक आध बार आंगन में आते जाते देख लेती थी। अब खाना बनाते समय वह सबसे ज्यादा राय जी के पसंद नापसंद का ख्याल रखती थी। उनके सामने वह घूँघट करती थी । वक्त के हिसाब से घूँघट की लंबाई तेजी से छोटी होती चली गयी। उनसे लालसा की बात पैसिव वॉइस से एक्टिव वॉइस में शुरू हो गयी।


यह आकर्षण एकदम एकतरफा था । नारी सुलभ मर्यादा कोई संकेत नहीं करने देती थी। लेकिन व्यक्तित्व का आकर्षण निकटता के लिए उद्वेलित करता था । लेकिन एक छोटी सी आशंका रोक रही थी, यदि उनकी तरफ से पहल का प्रतिसाद नही मिला तो फिर क्या होगा ।


एक रोज की बात है , घर का सब काम निबटाकर वह आंगन के बरामदे में ही आराम कर रही थी। घर मे अकेली थी क्योंकि सासु माँ अपने मायके गयी थीं। करीब बारह बजे का समय था किसी ने दरवाजा खटखटाया ।वह सोंचने लगी कौन होगा इस वक्त ! तभी आवाज आयी "मनीष बहु" दरवाजा खोलो।

लालसा को समझते देर नही लगा कि यह राय जी की आवाज है।क्योंकि इस सम्बोधन से वही बुलाते हैं। सासु जी तो उसको मायके के नाम से "चंदाही" और ससुर जी मानसी की भाभी बुलाते हैं। 

उसने दरवाजा खोला तो सामने रे जी खड़े थे। उसे यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि इस समय तो वो स्कूल में होते हैं। उसने पूछा बोलिए क्या बात है , कुछ चाहिए क्या ?

राय जी - माथा बहुत दर्द कर रहा है ।वैसे मैने होम्योपैथिक दवा ली है लेकिन कम नही हो रहा है। घर मे नवरत्न का तेल होगा तो मुझे दीजिए ।


लालसा ने कहा अंदर आइए बरामदे में बैठिए । मैं अभी तेल लेकर आती हूँ। राय जी के अंदर आते ही उसने दरवाजा बंद कर दिया। फिर अपने कमरे से नवरत्न तेल की शीशी लेकर आयी ।

फिर उसने कहा आज जब आप खाना खा रहे थे तो लग रहा था की आपकी तबियत बरोबर नहीं है। दीजिए मैं आपके सर में तेल मालिश कर देती हूँ । 

राय जी के लिए यह प्रस्ताव अप्रत्याशित था लेकिन उनको लग रहा था यदि कोई मालिश कर दिया तो अच्छा लगेगा।उनके हाँ या ना कहने से पहले ही लालसा ने हथेली पर तेल लेकर उनके सर में मालिश करने लगी।

कुछ तो तेल का असर और कुछ गैर जवान औरत के हाथों का स्पर्श का जादू, दोनो ने मिलकर कुछ ऐसा कमाल किया राय जी को बहुत सकून मिला ।

धीरे धीरे उन्ही हाथों से लालसा ने पीठ में भी मालिश करना शुरू कर दिया।

लालसा का हाथ किसी जादुई प्रभाव या अनजान आकर्षण के नशे में राय जी के शरीर पर फिसलने लगा।राय जी भी अपने आप को नियंत्रित नहीं कर पाए फिर दोनो के बीच की दूरी मिट गई ।

इस घटना के घटते समय दोनो पर एक अलग तरह की खुमारी छाई थी ।जो भी होना था अपने आप होते चला गया ।घटना घटने के बाद भी किसी को अपराधबोध नहीं था। 

राय जी का तो पता नही लेकिन लालसा के लिए तो यह अलौकिक अनुभव था ।आज उसको पहली बार रतित्वबोध हुआ । उसको यह समझ मे नही आ रहा था कि इस परमसुख का कारण क्या था। सहभागी के व्यक्तित्व के प्रति अव्यक्त आकर्षण या उसकी नारी साज के उपयोग की दक्षता । कुछ भी हो ,लालसा कारण का कारण जानने में परेशान नही होना चाहती थी। उसके लिए तो यह आनंद का पल अप्रतिम धरोहर सा था। क्योंकि उसके लिए रतिबोध का यह पहला अनुभव था।

फिर एक सिलसिला सा शुरू हो गया । जब कभी मौका मिलता लालसा और राय जी उसका लाभ जरूर उठाते लेकिन उसके लिए कोई भी उतावलापन नही दिखाता।ऐसे प्रेम प्रसंग में यदि पहल स्त्री करे तो सामाजिक खतरा कम रहता है क्योंकि वो नाजुक हालत के प्रति ज्यादा सजग और संवेदनशील होती हैं।

वक्त के साथ लालसा भी माँ बन गयी। उसने अपने बेटे का नाम "मनप्रसाद" रखा। जब वह तीन साल का हुआ तो राय जी का तबादला हो गया। लालसा बिल्कुल दुखी नही थी क्योंकि दुख तब होता है जब अपेक्षा रखते हो। जो प्राप्त हुआ वही पर्यापत है ऐसा सोचकर वह भी उनके विदाई समारोह में सबकी तरह शामिल थी।


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