रजनी चाची दो की बहुऐं
रजनी चाची दो की बहुऐं
रजनी चाची की दो बहुऐं थी। सीमा और शिखा। सीमा बड़ी बहु थी, शिखा छोटी बहु थी। सीमा घर पर रहती और घर का सब काम करती थी। उसे बाहर जाने और काम करने की ,कमाने की इजाजत नहीं थी क्योंकि रजनी चाची कहती थी कि- लोग क्या कहेंगे कि - हम लोग बहू की कमाई खाते हैं। समाज के लोग भी हम पर हंसेंगे क्योंकि उसके समय में बाहर जाकर कमाने की प्रथा नहीं थी कि बहुएं काम पर जाए। बहु की कमाई घर पर आए यह लोगों को मंजूर नहीं था। यह हमारे समाज में लोक लाज की बात थी। बहु को काम पर जाने की, उसे बाहर जाने की आजादी नहीं थी। सीमा भी पढ़ी-लिखी और बड़े घर की बेटी थी उसने भी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर रखी थी। लेकिन समय, समाज और परिवार के कारण वह आगे नहीं बढ़ी और वह घर में एक गृहणी बनकर रही। हमेशा रजनी चाची कहती थी कि सास ससुर की सेवा करो, पति की सेवा करो और बच्चों की देखरेख करो, बच्चों की पढ़ाई -लिखाई में ध्यान दो, घर की जरूरतों पर ध्यान दो।
घर का आदमी बाहर जाकर कमाए और घर की औरतें घर संभाले तभी घर और परिवार चलता है। बच्चों की गुरु मां ही होती है, मां जैसे संभालेगी वैसे ही बच्चे होंगे और सीमा ने भी यह बात स्वीकार कर ली क्योंकि उसे भी यह सही लगा, उसके समय में यह प्रथा नहीं थी कि कोई औरत घर से बाहर जाकर कमाए और घर वालों को नाराज करें। यह उसके मायके वालों को भी स्वीकार नहीं था।बस यह कहना था कि- पढ़ाई -लिखाई करो लेकिन जरूरी नहीं की नौकरी करो ।घर को संभालने के लिए पढ़ना -लिखना जरूरी है कमाना जरुरी नहीं है। पढ़ी-लिखी मां होगी तो बच्चे भी पढ़े लिखे होंगे । पहले बड़े बुजुर्ग लोग कहते थे कि - पढ़ी-लिखी लड़की दो घरों का उद्धार करती है इसलिए पढ़ाई लिखाई जरूरी है बाहर जाना जरूरी नहीं है यह सब मानकर सीमा एक गृहणी बनकर रह जाती है।
लेकिन कुछ दिनों बाद जब रजनी चाची के छोटे बेटे की शादी हुई और छोटी बहु शिखा आई तो समय के अनुसार- समाज और समाज के रीति-रिवाज भी बदल चुके थे । शिखा पढ़ी-लिखी थी और वह नौकरी करती थी अब लोगों की और समाज की सोच भी बदल चुकी थी। लोग कहते थे कि- पढ़ी लिखी है तो नौकरी करे इतना डिग्री-पढ़ाई-लिखाई करके घर में रहने से कोई फायदा नहीं। रजनी चाची की भी सोच बदल गई और वह भी चाहती थी कि बहु पढ़ी-लिखी हो, बाहर काम करने वाली हो । रजनी चाची की बहु शिखा पढ़ी-लिखी और नौकरी करती थी। चाची उस बहु पर नाज करती ,उस बहू पर बहुत गर्व करती थी, रजनी चाची बड़े गर्व के साथ कहती कि- शिखा हमारी छोटी बहू है यह घर के काम के साथ-साथ दफ्तर का भी काम करती है ।
जब लोग पूछे आपकी बड़ी बहु क्या करती है तो रजनी चाचा कहती कि- वह कुछ नहीं करती, वह घर पर रहती है वह एक गृहणी है। वह घर, परिवार और बच्चे देखती हैं उसकी दुनिया यही है, परिवार संभालना ही उसके लिए सब कुछ है। अब रजनी चाची धीरे-धीरे बड़ी बहु सीमा और छोटी बहु शिखा को भेदभाव की भावना से देखने लगी । पहले तो ज्यादा सीमा को फर्क नहीं पड़ता था क्योंकि वह समझती थी कि शिखा मेरी छोटी बहन जैसी है, कोई बात नहीं - समय बदला, समाज बदला तो लोगों की सोच भी बदली यह अच्छी बात है। लेकिन धीरे-धीरे यह बात खटकने लगी , मन में घर करने लगी कि लोग उसकी बेइज्जती करते हैं और उसे हीन भावना से देखते हुए कहते हैं कि यह एक गृहिणी है । सीमा भी पढ़ी-लिखी और समझदार लड़की थी लेकिन समय के अनुसार जैसे समाज ने उसे ढाला वह उस हिसाब से ढल गई ।“क्या यह मेरा कसूर था?” सीमा धीरे-धीरे सोचने लगी उसके मन में फर्क पड़ने लगा कि क्या मैंने गृहिणी बनकर बहुत बड़ी
गलती कर ली है? क्या मुझे भी बाहर जाकर कमाने की इजाजत मिलेगी? वह हमेशा ही सोचती कि मुझे भी कुछ करना चाहिए था तभी मुझे समाज और परिवार में इज्जत मिलती। शिखा कितने अच्छे से घर और बाहर दोनों संभालती है, पैसे कमाती है, और घर भी चलाती है। सीमा को हमेशा चाची कहती कि हमारी बड़ी बहु एक गृहणी है जो हम सब का ख्याल रखती है। इससे और बनता ही क्या है? फिर एक दिन अचानक रजनी चाची की तबीयत खराब हुई और डॉक्टर ने उसे कहा कि -आपको एक माह आराम करना है, कुछ भी नहीं करना है, सिर्फ आराम ही आराम करना है ।अब रजनी चाची की बड़ी बहु सीमा रजनी चाची की देखरेख करती और दिनभर उसी की सेवा में लगी रहती। उधर शिखा जो भी थोड़े-मोडे काम होते वह करती और अपने काम पर चली जाती रजनी चाची उसे देखते रहती और वह चाहती की शिखा भी मेरी सेवा करे लेकिन वह पढ़ी-लिखी और नौकरी वाली बहु थी वह क्यों छुट्टी लेती ? वह सीमा के ऊपर सब काम छोड़कर दिन भर के लिए वह अपने दफ्तर में चली जाती और रात में देर से आती। जल्दी जाती और देर से आती। जिससे रजनी चाची की सेवा ना करनी पड़े इसलिए वह बहाने मारती कुछ ना कुछ बहाना लेकर आती कि कल सुबह मुझे जल्दी जाना है और देर से आना है। दफ्तर में आजकल काम बहुत है यह कहकर- वह काम से बचने कि कोशिश करती रहती । इस तरह कुछ दिन तक चला और समय बीतता रहा धीरे-धीरे रजनी चाची की तबीयत भी सही हो रही थी और रजनी चाची को धीरे-धीरे एहसास भी हो रहा था कि मेरी बड़ी बहू सीमा मेरे लिए, मेरे परिवार के लिए न जाने क्या -क्या जतन कर रही है और मेरी छोटी बहू मेरे लिए और मेरे परिवार के लिए काम न करना पड़े इसलिए बहाने मार रही है। धीरे-धीरे रजनी चाचा को समझ में आने लगा कि अगर मेरी बड़ी बहु सीमा घर में रहने वाली गृहणी न होती तो मेरे परिवार का क्या होता।मेरे परिवार का ख्याल कौन रखता। रजनी चाची को इस बात का एहसास हो गया था कि पैसा तो कोई भी कमा सकता है लेकिन जो घर चलाए, घर के लोगों का ख्याल रखे, कम में कैसे गुजारा करना है उसका ध्यान रखे - वही असली गृहणी की पहचान है। हमारी रजनी चाची को समय रहते यह एहसास हो गया कि एक गृहणी होना हमारे समाज में शान की बात है श्राप या पाप की नहीं। बल्कि एक औरत की मर्जी या शौक है आप को क्या करना है ? ये आप पर निर्भर है, न कि किसी और कि बात पर।।
