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savitri garg

Abstract Drama Inspirational

2.1  

savitri garg

Abstract Drama Inspirational

मैं एक गृहणी हूं

मैं एक गृहणी हूं

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                           मैं एक गृहिणी हूं
समाज में कुशल गृहिणीं उसे कहते है जो घर में रहने वाली हो, घर पर रहकर घर का काम करती और घर वालों की देखरेख करती हो घर के सभी लोगों की सभी जरूरतों को पूरा करना ही उसका मुख्य उद्देश्य होता है सुबह से शाम तक बस अपने परिवार के लोगों के लिए ही काम करना ही उसका मकसद होता है । सुबह-सुबह सबसे पहले उठना घर के लोगों की क्या जरूरतें हैं? उनके बारे में जानना और उनकी सारी ज़रूरतों को पूरा करना और घर के काम के साथ-साथ बाहर के भी सभी कार्यों की जिम्मेदारी भी उठाना , घर के सभी लोगों के जरूरत के अनुसार बाहर से सामान मंगाना, बच्चों को पढ़ाना, पढ़ाई -लिखाई, फीस, बाजार, दवाई, कपड़ा, फल -सब्जी, पूजा- पाठ संबंधित सारे कार्य करना और रात में सब काम खत्म करके सोना ।सबका हर तरह से ख्याल रखना, सब की पसंद की चीजें देना जिससे कोई नाराज ना हो, सब खुश रहें । इस बात का ख्याल रखना की कोई नाराज न हो जाए। अगर जरा सी भी गड़बड़ काम में हुई तो बस कहा जाता है कि- खाली हो तुम ,करती ही क्या हो? घर पर रह कर भी यह काम नहीं कर सकती ।हमेशा एक गृहणी को यह सुनना और सहना पड़ता है कि घर का ध्यान रखना एक गृहणी का काम होता है। घर में रहने वाली गृहणी को घर का काम करना ही उसकी दिनचर्या बन जाती है। पति, पति का परिवार ,समाज बच्चे और पति के रिश्तेदारों तक ही एक गृहणी सीमित रहती है। हर किसी की जवाबदारी, जिम्मेदारी उस गृहणी की बन जाती है । उसी माहौल में एक गृहणी ढ़ल जाती है और रहना सीख जाती है ,एक कुशल गृहणी अपने लिए कभी नहीं जीती अपने परिवार को संवारने में ही सारा जीवन बिता देती है। लेकिन समाज में घर के काम को कुछ नहीं मानते। बस यही कहेंगे कि - कुछ नहीं करती ! बस घर में ही रहती है।
सोचो! अगर पुरुष बाहर जाकर जीवन यापन करने के लिए कमाने जाता है तो सारी जिम्मेदारी उस गृहिणी को देकर जाता है कि तुम मेरे परिवार का ख्याल रखना और इसी पैसों में गुजर बसर करना! पुरुष बस पैसे कमाता है और स्त्री घर चलाती है।
 पति -पत्नी दोनों में एक के बिना घर को चलाना मुश्किल होता है लेकिन बदलते दौर में घर में रहने वाली स्त्री की कोई कीमत नहीं होती। समाज के लोगों ने ऐसा माहौल बना दिया है कि अगर घर में रहने वाली स्त्री कितनी भी पढ़ी-लिखी हो? कितना भी परिवार को, समाज को जोड़ के रखने वाली हो। लेकिन एक मोड़ पर उसे यह कह दिया जाता है कि- यह कुछ नहीं करती, घर में रहती है।
 बहुत जगह तो लोगों को बताने में शर्म भी आती है कि मेरी पत्नी है, मेरी बहू है। सोचते हैं कि कहीं कोई पूछ न लें कि ये क्या करती है ? तो बताना पड़ेगा कि- ये कुछ नहीं करती ,बस घर में रहती है ।
 वह गृहणी (स्त्री) खुद भी इतना सुन -सुन के मान के बैठ जाती है कि मैं कुछ नहीं करती, जब उससे
  कोई पूछता है कि आप क्या करती हैं? तो वह खुद भी शरमाते हुए कहती है कि- मैं तो कुछ नहीं करती, मैं घर में रहती हूं , मैं एक गृहणी हूं । समाज के लोग भूल जाते हैं कि- यदि पुरुष बाहर जाकर पैसे कमाता है तो स्त्री एक घर बनाती है, परिवार बनाती है। अगर स्त्री नहीं तो घर नहीं, लोग मकान तो बना लेते हैं पर उसे घर तो (स्त्री) गृहणी ही बनाती है। यदि देखा जाए तो बाहर कमाने जाने के लिए आपके पास समय सीमा तय रहती है। कितने बजे से कितने बजे तक ही काम करना है। लेकिन घर में रहने वाली बेचारी गृहिणी बिना समय की पाबंदी के 24 घंटे काम करती है और अगले 24 घंटे के लिए वह तैयारी करके ही सोती है लेकिन उसके काम की कोई कीमत नहीं होती। कोई इज्जत नहीं देता ,ना कोई सम्मान करता ।अंत में वह इस माहौल में ढल जाती है । पहले सास -ससुर, पति ,बच्चों में सारा जीवन बिता देती है अपने परिवार के साथ ही रहना , घर परिवार ही उसका संसार होता है और वह उसी में ही अपनी खुशी को ढूंढती हैं और उसी में ही अपने जीवन को जीती है उसको और किसी से कोई मतलब नहीं होता उसी में रहना पसंद करती है।


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