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रात को खाओ पियो

रात को खाओ पियो

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आज इस टॉपिक पर लिखना मेरे लिए कितना कठिन है, ये तो सिर्फ़ मैं ही जानती हूँ। आपको याद है? मैंने अपने इंट्रो में बताया था कि मैं तमिल अय्यंगार फैमिली को बिलोंग करती हूँ? खाने पीने के मामले में हम बहुत ही सावधानी और सादगी बरतते हैं, इसलिए शायद हमारे फैमिली में लोग जलती नहीं मरते! साम्बार, रसम और तैर (दही), ये तीन व्यंजन हम लोगों हो 100 साल ज़िंदा रखने की गारंटी देती हैं। चावल के साथ खाये जाने वाले ये आइटम हम लोगों के लिए गायत्री मन्त्र से भी अधिक पावन है।

मेरे पूज्य पिताजी, उनकी आत्मा को शांति मिले, खाने के बहुत शौकीन माने जाते थे। एक शादी में चले गए, उनके पंजाबी दोस्त के लड़के की, जहाँ खाने में छप्पन-भोग सामान व्यंजन थे। घर लौटे तो मैंने उनसे पूछ लिए "खाना कैसा था?" उनका जवाब सुनेंगे तो आप बेहोश हो जाएंगे "खाने में तो कुछ था ही नहीं, दही भी नहीं। मैंने तो बस कॉफ़ी पिया और कुछ मीठा खा लिया। पता नहीं ये लोग इतना पैसे क्यों खर्चा करते हैं इतना बेकार खाने में!" आप समझ गए ना? जहाँ सांबर, रसम और तैर सादम नहीं, वह दावत नहीं।

पर मेरी बात और है, मुझे नए डिशेस और अलग-अलग प्रांन्तों के व्यंजन पसंद हैं। मेरी माँ कहती थी कि मैं गलती से तमिल फैमिली में पैदा हो गयी। जब तक हम चेन्नई में थे मुझे बस साम्बार-रसम-दही का स्वाद ही मालूम था। पर दिल्ली पहुँचने के बाद पता चला कि इनसे परे भी एक दुनिया है। पड़ोस मैं बंगाली, गुजरती, पंजाबी और यूपी की फैमिली थीं। हमारे घर के पास तंदूर की भट्टी थी जहाँ तंदूरी रोटियाँ बनते थे। लोग घर से आटा लेकर आते और रोटियाँ बनवाते। मैं तो बस देखकर ही हैरान होती थी, खाने का मन करता पर माँ से डर लगता था।

एक दिन पड़ोस के बंगाली आंटी ने मुझे घर बुलाया और कहा: "बेबी (मेरा घर का नाम) फीश खाओगी?"

फीश? मछली? आंटी तो मुझे घर से निखलवाने का प्लान बना रही है।

"थैंक्स आंटी, पर हम वेजीटेरियन हैं।"

"बाबा हम भी वेजीटेरियन है।"

"पर फ़िश ?"

"बेटा फिश वेजीटेरियन है !"

मन तो कर रहा था टेस्ट करने को और आंटी झूठ क्यों बोलेगी? मान लूँ आंटी की बात? एक बार खाने में क्या हर्ज हो सकता है? शायद मेरी उम्र एक-आद साल काम हो जायेगी, चलेगा। पर अगर आंटी ने अम्मा को बोल दिया तो?

"आंटी, थैंक यू पर अम्मा का परमिशन नहीं है।"

"अरे, खाना तुम्हें है। अम्मा को मैं नहीं बोलूंगी, बस? लाऊँ?"

आंटी तो मेरा धरम भ्रष्ट करने पर तुली थी और शायद मैं भी। बस मेरे खाने का सफर यहीं से शुरू हो गया।

पंजाबी शादियाँ मुझे बेहद पसंद हैं। क्या खाना, क्या पीना, क्या हंगामा!

जब हमारे मोहल्ले में हमें पंजाबी शादी अटेंड करने का दावत मिला तो पूछो मत मेरा हाल क्या हुआ! शादी की तैयारी जोरों से शुरू कर दी मैंने। अम्मा-अप्पा से रो-पिटकर नया ड्रेस ले ही लिया। शादी शाम की होती है तो सुबह से खाना-पीना बंद कर दिया मैंने।

शादी के पंडाल में घुसते से मैंने इंस्पेक्शन शुरू कर दिया। मेरी नज़र सिर्फ़ एक ही जगह पर थी जहाँ खाना लग रहा था। पंडाल के एक कोने से दूसरे कोने तक स्टाल सजे हुए थे। आज की रात तो बहुत ही शुभ है मेरे लिए। मेरा उत्साह धीरे-धीरे बढ़ कर चरम सीमा तक पहुँच रहा था। कब बरात आएगी और कब शरू होगा, खाना"बेबी, कॉफी साप्टया?" अप्पा ने पूछा (कॉफी पिया?) 

"इप्पो इल्ले पा, अपप्रम।" (अभी नहीं बाद में) 

"यें माँ? इप्पो ओरु कप सापडु, अपप्रम ओरू कप।" अप्पा भी ना, पक्के मद्रासी हैं, कोफ़ी मिल जाए तो पागल हो जाते हैं। एक्सप्रेसो उनको बहुत पसंद है। कह रहे हैं एक कप अब पियो और एक बाद में भी। फ्री है ना!

आखिरकार वह घडी आ ही गई और खाने के बर्तन एक-एक कर खुलने लगे। भूख अब मुझे खाने लग रही थी और मैं सीधे खाने की तरफ भागी। पंजाबी शादी का बस एक यही प्रॉब्लम था। उधर दूल्हा घोड़ी से उतरा नहीं, इधर खाने के काउंटर पर लोग टूट पड़ते। प्लेट लेने का लाइन, डिश लेने का लाइन, बहुत मार-काट होती है भाई।खैर मैं तो स्मार्ट थी और मुझे पता थी क्या-क्या आइटम हैं।

1. छोले

2. दाल मखनी

3. मटर पनीर

4. आलू गोबी

5. साग

6. भठूरे

7. तंदूरी रोटी

8. नान

9. मिस्सी रोटी

10. रायता

11. पप्पड़

मेरा फेवरेट छोले-भठूरे हैं, पर मुझे सब कुछ टेस्ट करना था। हर आइटम का थोड़ा लिया और कोने में चली गयी। फटाफट ख़तम किया। पहला राउंड तीन-चार मिनट में ख़तम, गोल्डन मैडल मिलना चाहिए मुझे। अब इत्मीनान से छोले-भठूरे खाउंगी। सेकंड राउंड ख़तम करने में थोड़ा ज़्यादा वक्त लगा पर अब पेट भर गया। पेट तो भर गया पर नियत का क्या करूँ, ये दिल मांगे मोर हो रहा है और अभी डेजर्ट बाकी ह1. गुलाब जामुन (गरम) 

2. गाजर हलवा (गरम) 

3. जलेबी (गरम) 

4. ऐस क्रीम (ठंडा) 

5. एक्सप्रेसो कोफ़ी (गरम) 

7. कोल्ड ड्रिंक (ठंडा) 

ये आइटम अभी बचे थे और मैं दुविधा में थी। क्या छोड़ूँ? छोड़ दूँ तो बाद में पछतावा होगा, खा लूँ तो पेट ख़राब। ऐसे मौके बार-बार नहीं आते ज़िंदगी में, तो आज जी लेना ही अक्लमंदी है, है ना सचघर वापस आई तो सीधे बाथरूम गयी और पेट में भू-चाल-सी थी। भयंकर उलटी हुई, दो बार लगातार। खाना तो खाया अब डांट खाने का वक्त आ गया। अम्मा-अप्पा दोनों अपने स्टाइल से डाँट रहे थे पर मुझे सुनाई नहीं दे रहा था, सन्न-सा हुआ पड़ा था दिमाग मेरा। अम्मा ने शायद पुदीन-हारा दिया पीने को और फिर मैं सो गयी।

आप सोच रहे होंगे कि उस दिन के बाद मैं सुधर गई, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। खाने का शौक अब भी ज़िंदा है पर शरीर साथ नहीं देता। शुगर की बीमारी, ब्लड प्रेशर और हाइपर टेंशन ने मेरे हाथ-पाऊँ को बाँध दिया। पर अभी भी शादी-ब्याह में खा लेती हूँ, छूटती कहाँ है...?


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