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कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब..

कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब..

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बातें हैं या सच में होते हैं? उपकार फ़िल्म का ये गाना आज तक दिल को छू लेता है, है ना? क्या तुम लोगों ने कभी सोचा कि कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा... इनका हमारे लिये क्या महत्व है? सच बोलूं तो मैंने भी कभी इनको इतना सीरियसली नहीं लिया! पर सोचो तो शायद पाओगे कि ये विचार या मनोभाव हैं जो किस भी धरम-विशेष नहीं हैं, सारे मानव जाती में पाया जाता है। मैं कहती हूँ, ये विचार संपूर्ण मानवता का नींव है। हर इंसान के अंदर पाया जाता है, हर आदमी-औरत के संस्कारों का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। हमारे सारे प्रॉब्लम का जड़ है।


शोले पिक्चर में जय, वीरू का रिश्ता बसंती से कराने मौसी के पास जाता है। तुमने देखा ही होगा शोले? कितनी सादगी से अपने दोस्त के गुणों का बखान करता है मौसी को इम्प्रेस करने के लिए! हम लोग खूब हसे इस सीन में, पर क्या हम कुछ अलग करते हैं?


मेरा रिश्ता जब तय हो रहा था तो मेरे पिता और माता जी ने लड़कों की लाइन लगा दिया। दोनों ने कह दिया कि फाइनल डिसिशन मेरा होगा क्योंकि शादी मेरी है। मेरी हालत गुड्डी जैसी थी, अरे, गुड्डी, जाया भादुडी? फ़िल्म याद है ना? मेरा बस चलता तो मैं कमल हासन या रजनीकांत से शादी कर लेती (उस ज़माने के टॉप तमिल हीरो) । सीरियसली, मैं कन्फ्यूज्ड थी कि मुझे कैसा पति चाहिए। मैंने सौ दोस्तों से पूछा पर कन्फूशन और बढ़ा। सवाल ये नहीं था कि लोग कैसा वर पसंद करते हैं; सवाल ये था कि मुझे कैसा वर चाहिए?


बहुत विचार के बाद मैंने ये गुण नोट किये

1. साफ़ रंग

2. अच्छी नौकरी

3.अच्छा परिवार

4.प्यार


इससे आगे बहुत कुछ था पर समझ नहीं आया कि कौन-सा गुण प्रायोरिटी में होना चाहिए। गौर से लिस्ट देखा तो पता चला पहले के तीन गुण तो मेरे माँ-बाप के लिस्ट से हैं, सिर्फ़ एक मेरा था। उस समय कसमें, वादे, वफ़ा का ख्याल भी नहीं आया।


एक बार शादी हुई तो पति को पहचानने का अवसर मिला। सबसे पहला परिचय प्यार से हुआ। सेक्स ना तो मेरे सिलेबस में था ना उनके। मगर शादी के बाद सेक्स कंपल्सरी सब्जेक्ट होता है, सच है कि नहीं? सुहाग की रात, जिसकी हम बहुत रोमांटिक होकर कल्पना करते हैं, दरअसल एक मिथ्या है। हम दोनों थके पड़े थे और चारों तरफ रिश्तेदारों का खट-पट। मन में रोमांटिक भावना थी ही नहीं। दोनों दूध पीकर सो गए।


शिमला में हनीमून के दौरान हम एक दूसरे से खुले और सेक्स किया। मैंने सोचा क्या इसी को प्यार कहते हैं? खैर घर वापस आये तो रोज़-मर्रा शुरू हुआ। पति को क्या पसंद? क्या खायेगा? क्या नहीं? मुझे क्या करना है और क्या नहीं, वगैरा वगैरा। शादी के शुरुआती दिनों में पति और पत्नी एक दूसरे को इम्प्रेस करने की कोशिश करते हैं, ये स्वाभाविक है। इस दौरान जो भी फीलिंग्स होती हैं उसे प्यार समझना भूल होगा। तो फिर प्यार का पता कैसे चलता है? क्या पति तुम्हारे लिए साड़ी लाये, गहने लाये या कोई कीमती गिफ्ट तुम्हें दे, इससे उसका प्यार साबित होता है? या, तुम उसके लिए बढ़िया खाना पकाने, हर बात मानोगी और उनके लिए व्रत रखोगी तो वह समझे की तुम उनको बेहद चाहते हो?


वैसे मेरे पति देव प्यार के इज़हार में बहुत कमज़ोर थे। उनके फ़लसफ़े अजीब थे। कहते थे "मैं गिफ्ट देना या लेना पसंद नहीं करता। इसका मतलब ये नहीं कि मैं तुमसे प्यार नहीं करता हूँ। बेबी, एक बात समझना ज़रूरी है, वह ये कि हम एक दूसरे से बहुत एक्सपेक्टेशन रखते हैं। तुम मेरी पत्नी हो तो मैं एक्सपेक्ट करता हूँ कि तुम मेरे लिए सब कुछ करोगी और जब तुम नहीं करते हो तो गुस्सा आता है। ठीक वैसे ही तुम भी मुझसे उम्मीद करती हो कि मैं एक परंपरागत पति की तरह बिहेव करूँ। सुख-दुःख मैं ही प्यार का असली अर्थ समझ आता है। मुझे विश्वास है कि मेरे किसी भी बुरे वक्त में और कोई हो न हो, तुम ज़रूर मेरे साथ खड़ी रहोगी और मैं तुम्हारे साथ। मेरे लिए यही प्यार का सार है। लड़ाई, झगड़े, मतभेद, पसंद, नापसंद ये सब होता ही रहेगा रिश्तों में, इसको कोई अवॉयड नहीं कर सकता।"


मैंने आपको बताया था मेरी सहेली संगीता के बारे में ('वाइरस शक का' पढ़ें) । उसका पति बहुत ही शक्की है। पहले संगीता को अच्छा लगता था कि पति को उसकी बहुत फ़िक्र है, कितना प्यार करता है मुझसे। फिर हो गया चैट-कांड। एक दिन पति ने संगीता के मोबाइल खोल कर उसके चैट देखने लगा। संगीता और उसके ऑफ़िस का कलीग आपस में जोक्स और फोटोज एक्सचेंज करते थे और पति देव ने इसका ग़लत मतलब निकाल लिया। बात तलाक तक पहुँच गयी। रिश्ता अभी भी कायम है पर विशवास? संगीता कहती है कि उसके पति ने उसे अजगर की तरह पकड़ रखा है, प्यार बिलकुल नहीं करता। संगीता ने वादा किया की वह उस आदमी से बात नहीं करेगी। पर ऑफ़िस में रहकर अवॉयड कैसे कर सकती है उसको? तो इस वादे का क्या मतलब है? क्या संगीता बेवफा औरत है? प्यार कहाँ गुम हो गया?


आज के बच्चे ज़्यादा समझदार दीखते हैं, पर क्या वह समझदार हैं? रिश्तों की परिभाषा अब बदल चुकी है। रिश्ते फेसबुक और टिंडर पर बन जाते हैं और वहीँ टूट भी जाते हैं। ब्रेक-उप आज ट्रेंड कर रहा है। शादी प्यार का आख़िरी पड़ाव है, पहला पड़ाव नहीं। प्यार एक प्रयोग (एक्सपेरिमेंट) है, पहले आजमाओ (लिव-इन) , फिर शादी की सोचों। उसके बाद भी प्रॉब्लम हो तो तलाक ले लो और मूव-ओन करो। एक कमर्शियल ब्रेक लो, फिर प्रयोग शुरू करो।


नए युग की इस प्रयोग में कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब बातें हैं, बातों का क्या? मैं इस प्रयोग का समर्थक हूँ, क्योंकि बदलाव ही ज़िंदगी है। हमने भी प्रयोग किया पारंपरिक प्रेम और विवाह का और मुझे नहीं लगता हम कामयाब हुए। हमारी शादियाँ सिल्वर और गोल्डन जुबली मानती रही, पर उसमे कसमें, वादे, प्यार, वफ़ा सब बातें ही तो थीं, बातों का क्या? अब फ़िल्में दो हफ्ते से ज़्यादा नहीं चलती, पर अच्छी हो तो सौ-तीन सौ करोड़ कमा लेगी। वैसे ही रिश्ते भी अच्छे हों तो कम टाइम में भी ज़्यादा मज़ा दे जाती हैं। रणबीर और दीपिका, ऋतिक और सुसेन ब्रेक उप के बाद भी अच्छे दोस्त हैं, हैं ना?



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