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प्यार दीवाना होता है...

प्यार दीवाना होता है...

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महीना फरवरी का ख़ास होता है। चारों तरफ हवाओं में भीनी-भीनी सुगंध है। पक्षी चहक रहे हैं , प्यार महक रहा है, लड़कियाँ मिंत्रा से समान खरीद रही हैं और लड़के गिफ्ट्स खरीदने निकल पड़े हैं। रोज़ डे, हग डे (जादू की झप्पी) और फिर आखिरकार 14 तारीख आ ही गयी, वैलेंटाइन डे। मुझे नहीं पता वैलेंटाइन डे पहली बार क्यों और कहाँ मनाया जाता था, समझकर भी क्या करना है? इतना पता है लड़की अपने बॉय-फ्रेंड को वैलेंटाइन बोलकर प्यार करती हैं और लड़के गर्ल-फ्रेंड को। कितना अद्भुत है ना, हमारे समय में तो वैलेंटाइन को कोई न जानता था न उसकी प्रेम कहानी किसी को पता थी।


तो क्या हम लोग प्यार नहीं किया करते थे? क्या इस तरह प्यार करने का हक़ सिर्फ़ इस जेनरेशन के बच्चों को है? बहनों, याद करो अपने बीते दिनों को और दिल पर हाथ रखकर बोलो कि तुम लोगों ने कभी लड़कों के साथ फ़्लर्ट नहीं किया या आपकी ज़िंदगी में कोई वैलेंटाइन नहीं था?


बच्चे हमेशा से अपने माँ-बाप को बुद्धू (या फिर फुद्दू भी) समझते आये हैं। आज से नहीं हज़ारों सालों से। माँ बनते ही हमें भी लगता है कि सुधर जाना चाइये और अब बचपन को दफ़ना देना चाहिए। एक तरह से हम सब हत्यारे हैं, हमारे अंदर के बच्चे को बड़ा होते ही मार देते हैं जवानी के नाम पर; फिर जवानी को क़ुर्बान कर देते हैं एडल्ट होने पर और एडल्ट को माँ बनने पर मरना होता है। बुढ़ापे में सुना है फिर उस मरे हुए बच्चे की खोज शुरू हो जाती है!


खैर, मैं आज बच्चों को ये बता दूँ कि उनके माँ-बाप इतने फुद्दू नहीं जितना वह बनते हैं। प्रॉब्लम ये है कि उनहोंने अपना बचपना और जवानी को बेरहमी से मार डाला। वर्ना अपनी जवानी में वह भी काम नहीं थे!


मैं एक अय्यंगार तमिल ब्राह्मण (जिसे अंग्रेज़ी में टेम-ब्राम भी बोलते हैं) परिवार में पैदा हुई और दिल्ली शहर में पढ़ी और बड़ी हुई। मेरा स्कूल एक तमिल समाज वाला स्कूल था। स्कूल क्या था, तंबू-कनात का ढाँचा था और हमारी शिक्षा उन्हीं टेंटों में हुआ करती थी। ये बात सन सत्तर के दशक की है, ध्यान में रहे। स्कूल के कुछ नियम थे, ख़ास तौर से लड़के-लड़कियों के मामले में। जी हाँ, स्कूल को-एड था, यानी लड़की और लड़के दोनों पढ़ते थे। नियम ये था कि कोई लड़की किसी लड़के से अकेले में बात नहीं कर सकती। बात करनी हो तो साथ सहेलिओं (सात सहेलियाँ नहीं) का होना ज़रूरी था। बातें बड़ी अदब से होती थी, "आप" की जगह "तू" या "तुम" का इस्तेमाल वर्जित था। सिर्फ़ पढ़ाई की बातें अलाउड थी, इधर-उधर या ऐसी-वैसी कोई बात नहीं कर सकते थे।


तुम ही सोचों, ऐसे माहौल में क्या प्यार पनप सकता है? पर ये भी सोचों कि ऐसे नियमों से क्या प्यार को ज़िंदा गाड़ा जा सकता है? नहीं ना, क्या अकबर सलीम-अनारकली को मार पाया अनारकली को ज़िंदा गाड़कर? बस इतना याद रखो की उस समय अकबर की संख्या बहुत ज़्यादा थी, इसलिए सलीम और अनारकली को बहुत सावधान और स्मार्ट होना पड़ता था।


एक बात बच्चों और युवकों से पूछती हूँ। क्या प्यार दिखाने के लिए सड़कों पर चुम्मा-छाटी करना ज़रूरी है? आज-कल मैं देखती हूँ की हर जगह तुम लोग चिप के रहते हो एक दूसरे से? क्या बताना चाहते हो दुनिया को? खैर, ये लगता है कि ये पी डी ए (पब्लिक डिस्प्ले ऑफ़ अफेक्शन) आज अनिवार्य हो गया प्यार दिखाने लिए। सत्तर में हम लोग ऐसा नहीं कर सकते थे, तो क्या हम लोग डरपोक थे और प्यार ही नहीं करते थे?


गलत, अगर तुम ये सोच रहे हो तो ग़लत सोचते हो। हमारे आगे, पीछे, ऊपर और नीचे हमेशा खतरा मंडराता था पर हम स्मार्ट थे। मैं आज तुम लोगों को मेरी प्रेम कहानी सुनाती हूँ। क्यों? चौंक गए कि आंटी कैसे लव कर सकती है? आज तक ये राज़ मैंने दिल में अनारकली की तरह गाड़ रखी थी, पर अब कोई फ़िक्र नहीं। मेरे पति देव चौंकेगे पढ़कर पर क्या कर लेंगे अब वह मेरा? डाइवोर्स देने की ना हिम्मत है ना उम्र। बच्चे क्या सोचेंगे? मुझे लगता है कि वह गर्व महसूस करेंगे, आखिर उनकी मोम फुद्दू नहीं जैसा वह सोचते थे!


मेरा वैलेंटाइन मेरी क्लास में पढ़ने वाला एक लड़का था। मैं अपने क्लास की सबसे सुंदर लड़की मानी जाती थी। मेरा रंग गोरा (मद्रासी होने के बावजूद) , नाक-नक्शे बढ़िया। उस टाइम लड़के मुझे बी एच एम् बी कहकर बुलाते थे, ये मुझे पता था। क्या, आपको पता नहीं ये क्या है? भाई, उस जमाने की टर्मिनोलॉजी है, "बड़ी होकर माल बनेगी" , मतलब खूबसूरत लड़की है। बहुत बड़ा कॉम्पलिमेंट था!


मेरा वैलेंटाइन दिखने में सलमान खान नहीं लगता था। रंग सांवला , दुबला-पतला, हम तो उसे छिपकली बुलाते थे! अब आप पूछोगे एक सुन्दर लड़की एक छिपकली से कैसे प्यार कर सकती है? भाई, प्यार दीवाना होता है, हर खुशी से बे गाना होता है। लड़का पड़ने में तेज़, खेल-कूद में अव्वल और सबका फेवरेट था। जी हाँ, छिपकली आल-राउंडर था। बेस्ट बॉय ऑफ़ द स्कूल बना था मेरा छिपकली! प्यार जात-पात, रंग-रूप, ऊंच -नीच नहीं देखता इसलिए प्यार को अँधा कहते हैं। प्यार सिर्फ़ एक एहसास है जिसे रूह से बेहसूस करना होता है (मैंने नहीं गुलज़ार ने कहा ऐसा) ।


छिपकली को मुझसे प्यार था पर वह कुछ कह नहीं पाता। बस क्लास में मेरी तरफ देखता रहता और आँखों ही आँखों में इशारे चलते। मैं क्लास में लास्ट बेंच पर बैठी थी और बेचारे को बार-बार मुड़-मुड़कर देखना पड़ता था। एक बार तो उसके गर्दन में मोच ही हो गयी, पर डटा रहा। मैं बेवकूफ़ नहीं थी पर आगे बढ़ना इन मामलों में संभव नहीं था। आफ्टर आल, ये तो लड़कों का काम है! पर मैंने उसे प्रोत्साहित करने वाले हिंट्स दे दिए। अब दोनों इंतज़ार कर रहे थे कि ये हमारे बीच का आँख-मटक्का दम तोड़ देगा या आगे ले जाएगा?


विषम परिस्तिथि इंसान के अंदर का टैलेंट उभारती है। एक दिन मेरी सहेली ने मुझे इकोनॉमिक्स की किताब दिया और बोली "अच्छी तरह पढ़ लेना, छिपकली ने दिया"। इस तरह शुरू हो गया प्रेम पत्रों का सिलसिला। इतनी किताबें मैंने अपनी ज़िंदगी में पढ़ी क्या, देखी भी नहीं होंगी!


खैर मेरा लव अफेयर स्कूल छोड़ते ही ख़त्म हो गया और बात शादी तक पहुँच ही नहीं पाया। किसी का दिल नहीं टूटा, ना ही कोई ब्रेक-उप, बस दोनों अपने-अपने अलग रास्तों पर चले गए। बाद में कभी मिलना भी नहीं हुआ। पर क्या रोमांच था, क्या रोमांस, क्या थ्रिल। खूब फ़िल्में देखे छिपकली और मैंने और एक बार ज़रूर किस किया होगा उसने। सच्चा प्यार था मेरा ये पहला प्यार और आज तक सोचकर अच्छा फीलिंग होता है।


अब बोलो, माँ-बाप क्या फुद्दू हैं? उनको समझना है तो उनके दोस्त बनो बच्चे नहीं। फिर उनके फीलिंग्स और इमोशंस को समझोगे। अब जाओ, वैलेंटाइन मनाओ पर प्यार से, दिल से। नो हार्ट-ब्रेक, नो ब्रेक-उप, ओके?



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