ravi s

Inspirational


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भगवान तो ऐ बन्दे ...

भगवान तो ऐ बन्दे ...

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पता नहीं क्यों? आज ज़्यादातर बच्चे लोग भगवान को मानना नहीं चाहते! मेरे ही बच्चों को देख लो! मंदिरों से दूर भागते हैं, पूजा-पाठ में बैठते नहीं और धरम के बारे में तो ज़ीरो ज्ञान है। मुझे गिलटी फील होता था कि मैं ही उन्हें ठीक से समझा नहीं पा रही हूँ, उन्हें ठीक संस्कार दे नहीं पा रही हूँ। भगवान के प्रति उनकी उदासीनता मुझे कछोटी थी। मेरे वो भी परेशान रहते थे और कहते थे की पाश्चात्य परंपरा, इंटरनेट, और सोशल मीडिया से बच्चे बिगड़ रहे हैं।


हम ग़लत थे। हमारी सोच विकृत थी और हम अपने ही बच्चों को और बदलते समय को समझ नहीं पा रहे थे। हम पूर्वजों की तरह सोचते थे कि भगवान को पाने के लिए उनका पूजा-पाठ करना और मंदिरों में जाना ज़रूरी ही नहीं, बल्कि अनिवार्य रास्ता है। सुबह उठते ही भगवान की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ने से दिन का शुभारम्भ होता है, ऐसा मैं सोचती हूँ। देने-वाला और लेने-वाला ईश्वर ही है, ऐसा मैं मानती हूँ। क्यों? मैंने कभी ना तो सोचा और ना ही किसी से पूछा। सब ऐसा ही मानते हैं, मैं क्यों सोचूँ?


एक दिन तंग आकर मैंने अपने बेटे से पूछ ही लिया।


"अरविन्द बेटे, क्या तुम नास्तिक हो गए हो? भगवान को बिलकुल ही नहीं मानते?"


"अम्मा, आप क्यों पूछ रहे हो?"


"बेटा, तुम न तो जनेऊ पहनते हो, ना ही पूजा में बैठते हो और मंदिर तो बिलकुल नहीं जाते। मुझे तो डर है कहीं तुम नास्तिक ना बन जाओ।"


"अम्मा, मुझे नहीं पता आपको डर क्यों लग रहा है। मैं तो भगवान को मानता हूँ और बिलकुल भी नास्तिक नहीं हूँ।"


"फिर तुम ऐसे क्यों बिहेव करते हो?"


"अम्मा, आप भी अप्पा की तरह बात करते हो। जनेऊ ना पहने से अगर कोई नास्तिक हो जाता है तो फिर आप क्यों नहीं पहनते?"


"चुप रहो! हमेशा ऐसी उलटी बातें करते हो।"


"अम्मा, आज जनेऊ केवल ब्राह्मण पहनते हैं। पहले क्षत्रिय और वैश भी पहनते थे। जनेऊ धारी को द्विज कहते थे क्योंकि शिक्षा से वे दूसरा जन्म लेते थे। आज सभी शिक्षा प्राप्त करते हैं। तो सभी द्विज हुए ना। रही बात भगवान की। अम्मा, तुम ही बोलती हो कि भगवान हर जगह है, सिर्फ़ मंदिरों या मूर्तियों में नहीं। मैं मानता हूँ कि कोई शक्ति है इंसानी शक्ति से परे, जो सृष्टि को संचालित करती है। ये मैं इसलिए जानता हूँ क्योंकि मुझे ये दीखता है कि धरती, सूरज, चंद्रमा, तारे, हवा, पानी, सब एक नियम के तहत चलते हैं जिसे किसी इंसान ने नहीं बनाया। मैं उस शक्ति को मानता हूँ। भगवान वही है। मंदिर और मूर्ति को तो हम ने बनाया और उनके लिए नियम भी हमने ही बनाया। ज़्यादातर लोगों को यही रास्ता आसान लगता है, मुझे इससे परेज़ नहीं। पर ये कहना कि इस रास्ते पर जो नहीं चलता वह पापी या नास्तिक है, ग़लत है।"


मैं शॉक हो गयी। ये मेरा ही बच्चा है या मेरा बाप? हमारे बच्चे ऐसा भी सोचते हैं? मुझे तो लगा कि ये फेसबुक, वाट्सएप्प और इंस्टाग्राम का युग है। इनकी दुनिया में धरम और देवता होते नहीं। पर ये लोग कैसे मानते हैं इस शक्ति को? हमने तो चलो मंदिर, मूर्तियाँ, भजन, मंत्र बना लिये और इसमें संतुष्ट हैं। भगवान को पाने के या मोक्ष पाने के यही रास्ते हैं।


"अम्मा, क्या सोच रही हो?"


"मैं सोच रही थी कि अगर तुम उस शक्ति को ही मानते हो तो उसकी पूजा कैसे करते हो? मतलब, कैसे मानते हो?"


अरविन्द हंस पड़ा। पता नहीं क्यों? क्या मैंने कोई बेवकूफी का सवाल पूछ लिया?


"अम्मा, तुम भगवान को क्यों मानती हो? मतलब, वो क्या हैं तुम्हारे लिए?"


"मेरे लिए? वह तो सब के लिए हैं?"


"पर क्या? क्या करता है तुम्हारा भगवान कि तुम उसके लिए इतना सब करती हो?"


"क्या करता है? अरे उसी के वजह से तो सब कुछ है?"


" अम्मा, मुझे तो ये लगता है कि ज़्यादातर लोग भगवान से डरते हैं। लोगों को लगता है कि उनकी शक्ति इतनी है कि वह बनता काम बिगाड़ सकता है और ज़िंदगी बर्बाद कर सकता है। इंसान तो ग़लतियाँ करता ही है, ग़लत निर्णय, ग़लत बात, गलत व्यवहार... कोई भी परफेक्ट नहीं है। हमें बचपन से ही बताया जाता है कि हमारे बुरे कर्मों की सज़ा भगवान देगा, इस जन्म में या किसी दूसरे में। आपको मालूम है ईसाई धर्म में कॉन्फेशन के ज़रिये पापों का प्रायश्चित कर सकते हैं? सिन, रिपेंट, रिपीट। हमारे धर्म में ऐसा नहीं है, हाँ गंगा में नहाओ तो पाप धुल जाते हैं। बुरा वक्त हो तो हवन कर लो, या ज्योत्षी से गृह पड़वा लो और उपाय करो। हर धर्म में लोग भगवान से डरते हैं और उपचार के लिए पूजा पाठ, हवन, भजन-कीर्तन, अभिषेक जैसे उपाय बताये जाते हैं। पर क्या ये सब नियमित रूप से करो तो प्रोब्लेम्स नहीं होंगे? होते हैं और होते ही रहेंगे | भगवन कोई जादुई छड़ी नहीं जिसे प्रसन्न करो और कोई भी प्रॉब्लम सॉल्व करा लो या पाप धुलवालो | 


मैं ज़िंदगी को सरल रूप से देखना चाहता हूँ। शक्तियाँ हमारे भले के लिए हैं, हमारा बुरा कभी नहीं चाह सकते क्योंकि अच्छे-बुरे का नियम इंसान ने बनाया, भगवान ने नहीं। मैं भगवान के डर से उनको मानना नहीं चाहता हूँ। इसलिए मुझे मंदिर या मूर्ति की ज़रुरत महसूस नहीं होती। मैं भगवान को अपने अंदर और हर शय में महसूस करना चाहता हूँ।


क्या गाना है? 'वो खेत में मिलेगा, खलिहान में मिलेगा, भगवान तो ऐ बन्दे, इंसान में मिलेगा।' अम्मा, हर इंसान में शक्ति है, बस पहचाने के तरीके अलग हैं। तुम पूजा करो और पहचानो, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं। मैं किसी अलग तरीके से उसे जानने की कोशिश कर रहा हूँ, फिर तुम्हें क्यों प्रॉब्लम होनी चाहिए? और इसमें तुम्हारा क्या कसूर ?"


देखा, बच्चे कितने सयाने हैं? और हम लोग खामखां परेशान रहते हैं। एक्चुअली, अगर इनको समझने की कोशिश करो तो शायद हम भी कुछ सीख सकते हैं इनसे। 



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