Vigyan Prakash

Classics


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Vigyan Prakash

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राजे

राजे

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बचपन में गर्मी की छुट्टियों में जब गाँव जाया करता था तो अक्सर शाम को अखाड़े जाया करता था।एक तो सबको मुद्गर उठाते और कुश्ती करते देख मन ना भरता दूसरा उस वक्त अखाड़े में हर शाम बच्चों को महान लोगों को कहानियाँ सुनाई जाती थी।कहानियाँ उन वीरों, ज्ञानियों और सन्तो की जिन्होने भारत को ढाला और वो बनाया जो भारत आज है।जिन्होंने भारत को बचाए रखा झुकने न दिया।जाने ये अखाड़े का असर था, या वीरता का या कुछ और वीरों की कहानियाँ मुझे हमेशा से आकर्षित करती।समुद्रगुप्त, पुष्यमित्र, शिवाजी और महराणा के बारे में पढ़ नसें फड़कने लगती।


तब लगता अगर मौका मिले तो मैं भी ”राजे” सी वीरता दिखलाऊँ!वक्त बीता और मैं शहर आ गया। यादें पहले धुन्धली हुई और फिर खो गई। वीरता की कहानियाँ सुनाने वाला अब कोई नहीं था ना ही कोई ये बताने वाला की जो पढ़ा जा रहा हूँ सब सच से कोसों दूर है।खैर धीरे धीरे खुद से पढ़ना और जानना शुरु किया तो जो यादें कही धुल खा रही थी उन्हें अलमारी से निकलने का मौका मिला।इसी दौरान छत्रपति शिवाजी महाराज जी एक जीवनी हाथ लगी। जब पढ़ने लगा तो बचपन की कहानियाँ सब याद हो आने लगी।कैसे अखाड़े में काका और उनके दोस्त नाटक किया करते थे और सारी कहानियाँ जीवन्त हो उठती थी।

अचानक से सब याद आने पे खुद को रोका नहीं गया और अगली ही ट्रेन पकड़ गाँव निकल गया।खिड़की वाली सीट पकड़ तेजी से पार होते खेतों को निहारते मैं सारी कहानियाँ मन ही मन दोहरा रहा था।महराणा के भाले का वार याद आते ही सिहरन सी दौड़ जाती, समुद्रगुप्त का हूणों को रोकना, तो पृथ्वीराज का शौर्य!इन्हीं सब यादों में कब गाँव के नजदीकी बस स्टॉप पहुँच गया पता ही नहीं चला। भुने बादाम ले मैं बस में बैठ गया!

मेरा गाँव आस पास में सबसे बड़ा था सो अक्सर सबसे ज्यादा लोग वहीं के होते थे।दो चार लोगों से बात करते ये रास्ता भी बीत गया।कई सालों बाद गाँव आया था सो रास्ता कुछ बदला सा लग रहा था।गाँव में घुसते ही माँ काली का मंदिर है जो गाँव की रक्षा करती है, द्वार पे आज भी उनके द्वारपाल भैरव उसी अडिगता से खड़े है।माँ को प्रणाम कर मैं गाँव में आया!बाबा और दादी के गुजर जाने के बाद छोटे बाबा घर के सबसे बड़े थे। घर पहुंचते ही बाबा के पाँव लगा तो बोले, “जीता रह, अब आ रहा है? इतने सालों सुध ना आई तुझे?”

बाबा की प्यार की थपकी ने सारे सफर की थकान मिटा दी।चाचा चाची से मिल खाना पीना खा मैं शाम को चक्कर लगाने अखाड़े की तरफ निकला। वहाँ पहुँचा तो मालूम चला पहलवानी तो अभी भी होती है पर वो पहले जैसी कहानियों और नाटक वाली शामें अब नहीं होती।

बच्चे किताबों में सारा इतिहास पढ़ लेते हैं!अफसोस के साथ घर आया तो बाबा बोले, “मुँह क्यों लटकाया है?”

जब उन्हें अखाड़े वाली बात का पता चला तो बोले रात को मेरे साथ बैठना मैं कहानी सुनाऊंगा तुझे।20 साल की उमर में भी बाबा के साथ बैठ कहानी सुनना अजीब सा लग रहा था पर मैं ये मौका छोड़ना नहीं चाहता था सो रात छत पे बाबा के पास जा के बैठ गया।बाबा ने शिवाजी की कथा शुरु की।

राजे की कथा ने मुझे वापस उस दौर में पहुँचा दिया जब मैं अखाड़े में नाटक देखा करता था।मेरे आँखों के आगे प्रतापगढ़ का किला था। राजे का अजेय गढ़! समुद्र तल से लगभग 1000 मीटर उपर माँ भवानी और महाकाल के मंदिर से लगातार पूजा की ध्वनी आ रही थी।माँ जगदम्बा के मंदिर से आ रहा शिवाजी के वीरगाथा का शोर उस गाथा का बखान कर रहा था जब माँ ने स्वयं राजे को अजेय खड्ग दिया था।

आस पास राजे की अफजल खान से मुलाकात की अफवाह उड़ रही थी।पास ही सेना की तैयारी चल रही थी जहाँ से रह रह कर “बोला श्री छत्रपति शिवाजी महाराज की जय!”ये गूँज मेरी नस नस को फड़का रही थी।

हर हर महादेव और जय भवानी जय शिवाजी के नारों से गुंजायमान प्रतापगढ़ किला हिन्दू साम्राज्य की मजबूत नींव अपने आंगन में पड़ते देख इठला रहा था।अफजल का संदेश लाये ब्राह्मण कृष्णजी भास्कर से रात्रि में भेंट कर राजे ने कहा, “माँ तुलजा भवानी ने मुझे आदेश दिया है की गौ, ब्राह्मणों और मंदिरों की रक्षा करुँ। आप ब्राह्मण है तो आप मेरा साथ दें!”दूत बनकर आये कृष्णजी ने शिवाजी की शरण ले ली।

शिवाजी के चेहरे का तेज देख मैं सिहर उठा।अगले दिन सुबह दूर क्षितिज पर आदिदेव सारे भारत को भगवे में रंगने उदित हो रहे थे।

तभी राजे गढ़ से बाहर निकले। माँ जगदम्बा और भगवान शिव को प्रणाम कर शिवाजी तानाजी मालुसरे के साथ किले के नीचे पहाड़ी की ढाल वाली जमीन की ओर चले जहाँ एक शामियाने में अफजल एक अंगरक्षक के साथ था।वहाँ पहुँच राजे ने शामियाने में प्रवेश किया।अफजल ने उन्हें देख लम्बी कुटिल मुस्कुराहट से उनका स्वागत किया।

अफजल ने राजे को गले मिलने के लिये बुलाया! अफजल की दुष्टता जानते हुए भी राजे आगे बढ़े।शिवाजी के एक एक पग पे मेरी साँस अटक अटक जाती।मुस्कुराते हुए राजे अफजल के पास पहुँचे और गले मिले। अफजल ने नीचता साबित करते हुए शिवाजी को जोर से पकड़ लिया। लम्बा होने के कारण उसने राजे को घेर लिया था।

राजे का शांत और आत्मविश्वास से भरा चेहरा देख कर भी मेरे माथे पर पसीने की बूँदे आ गई!अफजल ने शिवाजी के पीठ में छिपाई हुई कटार उतारनी चाही जो ढाल के कारण रुक गई तभी राजे ने बघनखे से उसका पेट चीर दिया।

पकड़ छूटते ही राजे ने बिना देर किये बायें आस्तीन में छुपे बिछुए से खाँ के पेट पर और जोर प्रहार किया।राजे का कौशल आँखों से देख मैं दंग रह गया।अफजल के अंगरक्षक सैयद बंदा ने अंदर आ राजे के सर पे प्रहार किया तभी जीवमहला ने उसका हाथ काट दिया। इन सब के बीच अफजल के सिपाहियों ने जब उसे ले भागने की कोशिश की तो राजे के सैनिकों ने उसका सर काट लिया।रक्तरंजीत प्रतापगढ़ की भूमि शिवाजी को छत्रपति होने का आशीष दे रही थी।

सम्भाजी और अनेक हिन्दूओं की निर्मम हत्या का प्रतिशोध ले लिया गया था।राजे के नाम का जयकारा और “जय भवानी” का उद्घोष हिन्दू साम्राज्य के पुनरजागरण की कहानी सुना रहा था।बरसों बाद कहानी सुन मेरे रोंगटे खड़े हो रहे थे।

मैंने भी उद्घोष शुरु किया,“जय भवानी जय शिवाजी!”

सुबह का सूरज पूरब से भगवा फैलाते देश भर पे उदित हो रहा था!

जगदम्ब!!


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