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Kshama Sisodia

Abstract

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Kshama Sisodia

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प्यार का वायरस

प्यार का वायरस

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मेहमानों को विदा कर, भूमि और आकाश भी अपने हनीमून के लिए निकल गये।चाँद-सितारे, झील-समुंद्र से रूबरू होते हुए कब समय निकल गया, पता ही नही चला।

आज वेलेंटाइन डे के मौके पर इन वादियों से रूख़सत होने का दिन भी आ गया, दोनों बहुत खुश थे, कि अपने सपनों के महल में आज का दिन बिताएंगे।अच्छा हुआ जो हम लोग शिपिंग मोह खत्म कर, इधर का प्लान बना लिए थे। 

"देखो न, संक्रामित रोग के भय से कोई भी देश, उस जहाज को अपने तट पर रूकने ही नही दे रहा है, और वही का रखा भोजन खाना पड़ता।" 

"यह वायरस भी कितना भयंकर होता है न,

इतना सूक्ष्म होते हुए भी बड़े-बड़े प्राणियों को लील लेता है।शहर का शहर खत्म चट कर जाता है।अब उन मांसाहारियों को पता चलेगा, जो दूसरे जीव को जीव नही समझते हैं।"

"हाँ भूमि, कोई सा भी वायरस हो, ऐसा ही होता है।

चाहे वह प्रेम का हो, घृणा का हो या संक्रामक हो।"

'चाँदनी रात में अपने चाँद को निहारते और उसकी जुल्फों से खेलते हुए, देखो न मेरे प्यार के वायरस को, जो तुम पर अटैक करके, तुम्हारे दिल-दिमाग पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया, और आज तुम उससे घायल हो मेरी बाहों में हो, गिफ्ट के रैपर को फूल की तरह आहिस्ता-आहिस्ता खोलते हुए आकाश ने बहुत ही मधुर स्वर में कहा।,  

'सही कह रहे हो। 

उसी प्यार के संक्रमण से तुम्हारी दंभ से भरी टेढ़ी-मेढ़ी सोच वाली नाक और भोंपू जैसी रूखी आवाज़ अब एकदम सही हो गयी।जिसकी वजह से तुम भी आज इतनी मधुर स्वर में बोलना सीख गये हो, नीली आँखों वाली शरारती भूमि ने अपने बालों में बचे हुए जल की शीतल बूँदों को आकाश के ऊपर छिड़कते हुए बोली।,  

"दोनों एक-दूसरे की तरफ इस मधुर अंदाज से देख रहे थे, जैसे एक-दूसरे के बीमारी को जड़ से पकड़ लिए हों, जिसका इलाज सिर्फ़ प्रेम था।"


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