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Sukhwinder Singh Rai

Romance Thriller

4  

Sukhwinder Singh Rai

Romance Thriller

पत्थर में धड़कती रूह

पत्थर में धड़कती रूह

4 mins
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 के जनाज़े के दिन आर्यन रोया नहीं था। उसके चेहरे पर एक अजीब सा सन्नाटा था, जैसे किसी ने उसके दिमाग की सारी नसें एक साथ खींच ली हों। जब रिया को सुपुर्द-ए-खाक किया जा रहा था, आर्यन की आँखें बस उस मिट्टी को घूर रही थीं। वो उस पल अपना दिमागी संतुलन पूरी तरह खो चुका था। दुनिया के लिए रिया मर चुकी थी, एक रहस्यमयी बीमारी ने उसकी जान ले ली थी, लेकिन आर्यन के उस पागल हो चुके दिमाग ने मौत को मानने से ही इनकार कर दिया था।

​घर लौटकर आर्यन का पागलपन एक भयानक तूफान बन गया। उसने घर के सारे शीशे तोड़ दिए, रिया के कपड़ों को सीने से लगाकर पागलों की तरह चीखने लगा।

​"तू नहीं जा सकती रिया! कोई मौत तुझे मुझसे नहीं छीन सकती... मैं तुझे वापस लाऊंगा, मैं खुदा से तुझे छीन लाऊंगा!" आर्यन की दहाड़ से पूरा घर कांप उठा था।

​आर्यन कोई आम इंसान नहीं था, वो दुनिया का सबसे मशहूर मूर्तिकार था। उसके हाथों में पत्थर को धड़कता हुआ इंसान बना देने का जादू था। अगले ही दिन उसने खुद को अपने बेसमेंट वाले अंधेरे स्टूडियो में कैद कर लिया। उसने सफेद संगमरमर का एक विशाल पत्थर मंगवाया। उसकी आँखें लाल थीं, बाल बिखरे हुए थे, और उंगलियों से खून रिस रहा था, पर उसकी छैनी और हथौड़ी एक सेकंड के लिए नहीं रुकी।

​वो सिर्फ एक मूर्ति नहीं तराश रहा था, वो अपने पागलपन, अपने काले जादू और अपनी रूह की पूरी ताकत उस पत्थर में फूंक रहा था। छैनी की हर चोट के साथ वो मंत्रों की तरह रिया का नाम बुदबुदाता। सात दिन और सात रात... आर्यन न सोया, न कुछ खाया। उसकी उंगलियों का खून उस सफेद पत्थर में समाता जा रहा था।

​रिया जब जिंदा थी, तो उसकी एक रूहानी खासियत थी—जब वो खुश होती थी, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी नीली चमक आ जाती थी। आर्यन को वही चमक वापस चाहिए थी।

​आठवीं रात, जब स्टूडियो में सिर्फ एक मोमबत्ती टिमटिमा रही थी, आर्यन ने मूर्ति की आँखों को आखिरी आकार दिया। वो पीछे हटा। सामने खड़ी मूर्ति इतनी असली थी कि कोई भी धोखा खा जाए। वो हूबहू रिया थी—वही होंठ, वही जुल्फें, वही चेहरा।

​तभी एक भयानक और खौफनाक घटना घटी।

​कमरे का तापमान अचानक गिर गया। आर्यन के उस वहशी और पागलपन से भरे प्यार ने ब्रह्मांड के नियम तोड़ दिए थे। उसने अपनी कला और जुनून की उस काली ताकत से रिया की आज़ाद रूह को खींच लिया था। मूर्ति की पत्थर की आँखों में अचानक वो 'नीली चमक' पैदा हुई।

​रिया की रूह अब उस संगमरमर के पिंजरे में कैद हो चुकी थी।

​मूर्ति के अंदर से एक खौफनाक, घुटती हुई और बेबस आवाज़ आर्यन के दिमाग में गूंजी, "आर्यन... ये तुमने क्या किया? मेरा दम घुट रहा है... मुझे जाने दो... ये प्यार नहीं, नर्क है!"

​रिया की रूह चीख रही थी, तड़प रही थी। वो आज़ाद होना चाहती थी।

​लेकिन आर्यन... आर्यन के चेहरे पर अब कोई दुख नहीं था। उसके चेहरे पर एक रोंगटे खड़े कर देने वाली, खौफनाक और शैतानी मुस्कान तैर गई। वो धीरे से मूर्ति के पास गया, अपने खून से सने हाथ उस पत्थर के ठंडे गालों पर रखे और फुसफुसाया:

"तुमने कहा था न रिया, कि मौत भी हमें जुदा नहीं कर सकती? देखो... मैंने मौत को भी हरा दिया। इंसानी जिस्म बूढ़ा होता है, बीमार पड़ता है, धोखा देता है... पर ये पत्थर... ये कभी नहीं बदलेगा। तुम अब हमेशा के लिए मेरी हो। अब तुम चाहकर भी मुझे छोड़कर नहीं जा सकतीं।"

​रिया की रूह उस पत्थर के अंदर से चीखती रही, रोती रही, लेकिन बाहर सिर्फ एक खामोश, सफेद और ठंडी मूर्ति खड़ी थी। आर्यन ने उस मूर्ति को अपनी बाहों में जकड़ लिया। उस रात उस तहखाने में सिर्फ एक पागल आशिक की भयानक हंसी गूंज रही थी, और उस सफेद पत्थर की मूर्ति की आँखों से खून का एक कतरा आंसू बनकर टपक रहा था।

सुखविंदर की कलम से

"इश्क जब अपनी हदें पार कर जाए, तो वह इबादत नहीं, बल्कि एक खौफनाक कैद बन जाता है। किसी को अपनी ज़िद और पागलपन के पिंजरे में बांध लेना प्यार नहीं है। मौत इंसान को आज़ाद करती है, लेकिन एक जुनूनी आशिक का वहम उस रूह को ऐसे नर्क में धकेल देता है, जहाँ न सुकून है, न मौत... सिर्फ एक अंतहीन घुटन है।"


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