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Sukhwinder Singh Rai

Inspirational

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Sukhwinder Singh Rai

Inspirational

​पाँच किलो की डिग्री

​पाँच किलो की डिग्री

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आर्यन का कमरा किसी इंसान का बेडरूम कम और डिग्रियों का म्यूजियम ज़्यादा लगता था। बी.टेक, एम.बी.ए., पीएच.डी., और ना जाने कौन-कौन से डिप्लोमा। दीवार पर पेंट की जगह फ्रेम किए हुए सर्टिफिकेट टंगे थे। आर्यन का सीना इन डिग्रियों को देखकर गर्व से फूल जाता था, लेकिन उसके पिता का सीना चिंता से सिकुड़ता जा रहा था। एक कड़वा सच यह था कि घर की दीवारें तो डिग्रियों से भरी थीं, लेकिन पिछले तीन साल से आर्यन की जेब बिल्कुल खाली थी। ​हर इंटरव्यू में आर्यन अपनी पाँच किलो की फाइल लेकर जाता और टेबल पर ऐसे पटकता जैसे कोई राजा अपना मुकुट रख रहा हो। लेकिन हर बार उसे एक ही जवाब मिलता— "आप ओवर-क्वालिफाइड हैं," या फिर "सॉरी, यहाँ वैकेंसी फुल हो गई है।" ​आर्यन ने शायद ही कोई शहर छोड़ा हो जहाँ उसने नौकरी के फॉर्म न भरे हों। कभी इस शहर में पेपर देने के धक्के खाता, कभी उस शहर में इंटरव्यू की लाइनों में घंटों खड़ा रहता। लाखों रुपये फॉर्म भरने और सफर करने में खर्च हो गए, लेकिन नौकरी का कहीं नामोनिशान नहीं था। धीरे-धीरे उसका डिग्रियों का घमंड अंदर ही अंदर हताशा में बदल रहा था। ​एक दिन आर्यन को शहर की सबसे तेज़ी से उभरती कंपनी 'माइंड-क्राफ्ट इनोवेशन' से इंटरव्यू का बुलावा आया। आर्यन ने अपना बचा-खुचा हौसला बटोरा, सूट पहना और डिग्रियों का वह भारी बोझ उठाकर कंपनी पहुँच गया। ​उसे सीधा बॉस के केबिन में भेजा गया। आर्यन ने सोचा था कि अंदर कोई उम्रदराज़, चश्मा लगाए हुए तजुर्बेकार बॉस बैठा होगा। ​लेकिन दरवाज़ा खोलते ही वह हैरान रह गया। बॉस की कुर्सी पर एक बहुत ही यंग और आत्मविश्वास से भरी लड़की बैठी थी— रिया। उसने नीले रंग की जींस और एक सादी सफेद शर्ट पहनी हुई थी। ​आर्यन ने अंदर कदम रखा और अपनी भारी-भरकम फाइल टेबल पर रख दी। "गुड मॉर्निंग! मैं आर्यन हूँ। ये रही मेरी फाइल। इसमें मेरी बी.टेक, एम.बी.ए., और पीएच.डी. की डिग्रियां हैं। मैंने अपनी क्लास में हमेशा 95% से ज़्यादा स्कोर किया है।" ​रिया ने फाइल की तरफ देखा तक नहीं। उसने आर्यन को देखा और हल्की सी मुस्कान के साथ बोली, "बैठिए आर्यन। आपकी डिग्रियां बहुत भारी लग रही हैं, कहीं इस टेबल का कांच ना टूट जाए।" ​आर्यन को यह बात चुभ गई। उसने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, "मैम, ये डिग्रियां मेरी सालों की कड़ी मेहनत हैं। मैंने दिन-रात एक करके ये नंबर कमाए हैं। मुझे मैनेजमेंट की हर थ्योरी रटी हुई है।" ​रिया ने अपनी कुर्सी पीछे की और बड़े ही शांत लहज़े में कहा, "किताबों की दुनिया से बाहर निकलिए आर्यन। चलिए, एक प्रैक्टिकल सवाल का जवाब दीजिए। मान लीजिए, हमारी कंपनी का एक प्रोडक्ट मार्केट में बुरी तरह फ्लॉप हो गया है। कस्टमर गालियां दे रहे हैं और शेयर मार्केट में हमारे भाव गिर रहे हैं। आप इसे कैसे संभालेंगे?" ​आर्यन ने तुरंत किताबी ज्ञान झाड़ना शुरू किया, "मैम, फिलिप कोटलर की थ्योरी के हिसाब से, मैं सबसे पहले एक क्राइसिस मैनेजमेंट टीम बनाऊंगा। फिर हम डेटा कलेक्ट करेंगे, एक SWOT एनालिसिस करेंगे..." ​"स्टॉप!" रिया ने बीच में टोकते हुए कहा। "जब तक तुम अपनी टीम बनाकर डेटा कलेक्ट करोगे, तब तक कंपनी दिवालिया हो चुकी होगी।" ​आर्यन ने चौंक कर पूछा, "तो फिर सही जवाब क्या है?" ​रिया ने आगे झुककर आर्यन की आँखों में देखते हुए कहा, "सबसे पहले मैं सोशल मीडिया पर जाकर कस्टमर्स से सीधी माफी मांगूंगी। गलती मानूंगी और उनका पैसा रिफंड करूंगी। थ्योरी डेटा मांगती है, और असल दुनिया भरोसा।" ​आर्यन थोड़ा झेंप गया, पर उसने कहा, "मैम, आपका जवाब ठीक है, पर मेरे पास जो डिग्रियां हैं, वो ये साबित करती हैं कि मेरा दिमाग..." ​"डिग्रियां?" रिया ने मुस्कुराते हुए कहा। फिर उसने अपने पीछे की खाली दीवार की तरफ इशारा किया। "तुम्हें मेरी दीवार पर कोई सर्टिफिकेट दिख रहा है?" ​आर्यन ने देखा, पूरी दीवार एकदम खाली थी। "नहीं," उसने धीरे से कहा। ​"क्योंकि मेरे पास कोई डिग्री नहीं है आर्यन," रिया ने बेबाकी से कहा। "मैं कॉलेज ड्रॉपआउट हूँ। जब तुम अच्छे नंबरों के लिए रट्टे मार रहे थे, तब मैं 19 साल की उम्र में सड़कों पर धक्के खाकर अपना पहला प्रोडक्ट बेच रही थी। तुमने स्कूल के क्लासरूम में टॉप किया है, और मैंने ज़िंदगी के क्लासरूम में।" ​रिया ने आगे कहा, "आर्यन, मुझे पता है तुमने बहुत धक्के खाए हैं। नौकरियों के लिए शहरों-शहरों भटके हो। ये तुम्हारी गलती नहीं है, ये हमारे सिस्टम की गलती है जो सिर्फ नंबरों को पूजता है। लेकिन सच्चाई ये है कि डिग्रियां रद्दी के भाव बिकती हैं आर्यन, अगर तुम्हारे अंदर उस कागज़ को हकीकत में बदलने की 'अक्ल' और हुनर ना हो।" ​आर्यन सन्न रह गया। उसकी आँखों के सामने वो सारे संघर्ष घूम गए जब उसने डिग्रियों के बावजूद खुद को मजबूर और खाली हाथ पाया था। आज उसका सारा गुरूर एक झटके में टूट गया था। उसे पहली बार समझ आया कि ज़िंदगी की असली परीक्षा वो नहीं थी जो उसने पेपर पर दी थी। ​रिया ने एक सादे कागज़ पर कुछ लिखा और आर्यन की तरफ बढ़ा दिया। "यह तुम्हारी पहली असाइनमेंट है। मैं तुम्हें नौकरी दे रही हूँ, लेकिन तुम्हारी डिग्रियों की वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि मुझे वो लोग पसंद हैं जिन्हें ठोकर खाकर अक्ल आ जाती है। कल से ये पाँच किलो की फाइल घर छोड़कर आना। यहाँ दिमाग का पसीना बहाना पड़ता है।" ​आर्यन ने चुपचाप वह कागज़ लिया। आज उसने डिग्रियों का झूठा गुरूर वहीं टेबल पर छोड़ दिया था और एक नई शुरुआत के साथ बाहर निकला था। ​संदेश: आजकल तो लोगों को पता नहीं क्या हो गया है! बस नंबर और परसेंटेज के पीछे अंधों की तरह भाग रहे हैं, भले ही उन्हें असली दुनिया की 'अक्ल' आने की नौबत ही ना आए। लाखों रुपए खर्च करके लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियां ले लेते हैं, लेकिन फिर भी नौकरियों के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। कभी इस शहर में पेपर दो, कभी उस शहर में धक्के खाओ। और आखिर में, नौकरी न मिलने पर पढ़े-लिखे युवाओं को भी मजबूरी में मज़दूरी या छोटे काम करने पड़ते हैं। यह समाज और सिस्टम को सोचने की ज़रूरत है कि हम सिर्फ कागज़ की डिग्रियां बांट रहे हैं, या ज़िंदगी जीने और काम करने का असली हुनर? ​लेखक: सुखविंदर की कलम से...


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