इलेक्शन, इश्क़ और एक आवाज़
इलेक्शन, इश्क़ और एक आवाज़
सेंट थॉमस कॉलेज का कैंपस इन दिनों किसी सुलगते हुए ज्वालामुखी जैसा लग रहा था। मौका था कॉलेज के सबसे बड़े छात्रसंघ चुनाव का। मैदान में दो ऐसे चेहरे आमने-सामने थे, जिनकी दुश्मनी के किस्से पूरे शहर में मशहूर थे— आर्यन और रिया। आर्यन वो लड़का था जिसके एक इशारे पर पूरा कॉलेज थम जाता था, और रिया वो आग थी जिससे उलझने की हिम्मत किसी में नहीं थी। पूरे कैंपस को दो हिस्सों में बांट दिया गया था। आर्यन का सबसे जिगरी यार और चुनाव मैनेजर, सनी, दिन-रात पसीना बहाते हुए माइक पर दहाड़ता, "शेर आया, शेर आया... आर्यन आया!" वहीं दूसरी तरफ रिया की सबसे पक्की और तेज़-तर्रार सहेली, समीक्षा, आर्यन के पोस्टरों के ऊपर रिया के पोस्टर चिपकाते हुए नारा लगाती, "झुकेगा नहीं, रुकेगा नहीं... रिया का तूफान थमेगा नहीं!" दोनों जब भी कॉलेज के गलियारों में एक-दूसरे के सामने आते, तो नज़रों ही नज़रों में तलवारें खिंच जाती थीं। उनके बीच सिर्फ अहंकार और कुर्सी की लड़ाई थी। लेकिन, इस शोर-शराबे और कट्टर दुश्मनी से बहुत दूर, कॉलेज की लाइब्रेरी के पीछे एक बिल्कुल ही अलग और मीठी सी दुनिया बस रही थी। आर्यन की पार्टी का सबसे मज़ाकिया लड़का लकी, और रिया की पार्टी की सबसे मासूम और क्यूट लड़की सोया, दुनिया से छुपकर एक-दूसरे की आँखों में खोए हुए थे। सोया की आँखें इतनी बड़ी और भोली थीं कि कोई भी उसे देखकर पिघल जाए। लकी ने धीरे से अपनी जेब से एक डेरीमिल्क निकाली और सोया के हाथ पर रख दी। सोया ने अपनी पलकें झुकाईं और एक बेहद प्यारी सी मुस्कान के साथ चॉकलेट ले ली। अभी लकी उसके गाल खींचने ही वाला था कि तभी वहां चेकिंग करते हुए सनी और समीक्षा आ धमके। दोनों को एक साथ देखकर सनी का तो पारा ही हाई हो गया। "लकी! तू हमारी दुश्मन पार्टी की लड़की के साथ क्या गुल खिला रहा है?" समीक्षा ने भी सोया को घूरा, "सोया, तू इस आर्यन के चमचे के साथ क्या कर रही है?" बेचारी मासूम सोया बुरी तरह घबरा गई। उसने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में हल्का सा पानी लाते हुए, एकदम कांपती और भोली सी आवाज़ में कहा, "समीक्षा... मैं तो बस... बस लकी से पूछ रही थी कि कैंटीन में समोसे खत्म तो नहीं हो गए... मुझे बहुत भूख लगी थी।" उसकी इस मासूम सी चोरी को देखकर गुस्से में उबल रहे सनी और समीक्षा भी अपना सिर पीटकर रह गए। चुनाव की इस गहमागहमी के बीच अचानक कॉलेज में एक ऐसा भूचाल आया जिसने सबके होश उड़ा दिए। मैनेजमेंट ने रातों-रात स्कॉलरशिप और गरीब छात्रों की फीस दोगुनी कर दी थी। नोटिस बोर्ड के पास खड़े उन गरीब छात्रों की आँखों में आंसू थे, जिनके पास अगले महीने की फीस भरने के पैसे नहीं थे। यह देखकर आर्यन और रिया, दोनों का दिल अंदर तक हिल गया। उन्होंने चुनाव को किनारे रखकर, अपने-अपने तरीके से मैनेजमेंट से बात करने की कोशिश की। आर्यन ने प्रिंसिपल से तीखी बहस की, और रिया ने मैनेजमेंट के बाहर धरना दिया। लेकिन अलग-अलग बंटे होने के कारण, कॉलेज प्रशासन ने दोनों को सस्पेंड करने की धमकी देकर बाहर निकाल दिया। उस शाम, कॉलेज के सूने बास्केटबॉल कोर्ट में रिया अकेली बैठी थी। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे क्योंकि वो उन गरीब छात्रों के लिए कुछ नहीं कर पा रही थी। तभी वहाँ आर्यन आया। आर्यन ने हमेशा रिया को एक मगरूर और घमंडी लड़की समझा था, लेकिन आज किसी और के दर्द में उसे रोता देखकर, आर्यन के दिल में रिया के लिए पहली बार एक गहरा 'सम्मान' पैदा हुआ। उसने अपनी जेब से रुमाल निकाला और बिना कुछ कहे रिया की तरफ बढ़ा दिया। रिया ने अचरज से आर्यन की तरफ देखा। आज आर्यन की आँखों में वो इलेक्शन वाला गुरूर नहीं था, बल्कि वही दर्द और सच्चाई थी जो रिया के दिल में थी। रिया को एहसास हुआ कि आर्यन सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि बहुत ही साफ और सच्चे दिल का इंसान है। इसी एक पल में, दोनों के दिलों से नफरत की दीवारें गिर गईं और एक-दूसरे के लिए बेहद गहरा सम्मान (Respect) जन्म ले चुका था। "हम दोनों गलत थे रिया," आर्यन ने धीमी लेकिन मज़बूत आवाज़ में कहा। "हम कुर्सी के लिए आपस में लड़ते रहे, और वो लोग हमारे साथियों का भविष्य बर्बाद कर रहे हैं। मेरी ताकत तुम हो और तुम्हारी ताकत मैं। अगर हम मिल जाएं, तो कोई हमें नहीं हरा सकता।" रिया ने आर्यन की उन सच्ची आँखों में देखा और अपने आंसू पोंछते हुए अपना हाथ आर्यन के हाथ में रख दिया। अगले दिन कैंपस का नज़ारा देखकर कॉलेज प्रशासन के भी पसीने छूट गए। आर्यन और रिया एक साथ खड़े थे, कंधे से कंधा मिलाकर। उनके पीछे सनी और समीक्षा एक ही झंडा पकड़े नारे लगा रहे थे, और लकी-सोया खुशी-खुशी भीड़ का हौसला बढ़ा रहे थे। जब आर्यन और रिया की ताक़त एक हुई, तो मैनेजमेंट को उनके आगे घुटने टेकने ही पड़े। फीस का फैसला वापस ले लिया गया। जीत की उस ज़बरदस्त खुशी के बीच, जब गुलाल उड़ रहा था, आर्यन ने धीरे से रिया का हाथ पकड़ लिया। रिया ने भी बिना कुछ कहे उस हाथ को और कस के थाम लिया। इलेक्शन की वह कट्टर दुश्मनी कब एक-दूसरे के गहरे 'सम्मान' में बदली, और फिर उस सम्मान ने कब एक बेहद खूबसूरत और खामोश 'प्यार' का रूप ले लिया... यह उन दोनों के अलावा और कोई नहीं जानता था। सुखविंदर की कलम से "सच्चे प्यार की बुनियाद कभी भी सिर्फ खूबसूरती या आकर्षण पर नहीं टिकती। प्यार का पहला कदम हमेशा 'सम्मान' होता है। जब आप सामने वाले की रूह, उसकी सोच और उसके जज़्बातों की इज़्ज़त करने लगते हैं, तभी नफरत की दीवारें टूटती हैं। इलेक्शन हों या ज़िंदगी, असली जीत किसी को हराने में नहीं है, बल्कि एक-दूसरे का सम्मान करते हुए, सही मकसद के लिए एक-दूसरे का हाथ थामने में है।"

