शीर्षक: बाज़ार-ए-इश्क़
शीर्षक: बाज़ार-ए-इश्क़
शहर की चकाचौंध के बीच आर्यन एक छोटे से कैफे में रिया का इंतज़ार कर रहा था। उसके पास कहने को बहुत कुछ था, पर जेब में रिया की पसंद का वो महंगा तोहफा नहीं था। जब रिया आई, तो वो किसी और की महँगी गाड़ी से उतरी। उसके चेहरे पर आर्यन के लिए वो पुरानी चमक नहीं, बल्कि एक अजीब सी बेरुखी थी। "आर्यन, हम इस तरह नहीं चल सकते," रिया ने अपनी कॉफ़ी का घूँट भरते हुए कहा। "तुम्हारे पास वक्त है, जज्बात हैं, पर वो ऐशो-आराम नहीं जो मुझे चाहिए। सच कहूँ तो, आजकल 'एक' से दिल नहीं भरता। विक्की मुझे क्लब ले जाता है, समीर मेरे बिल भरता है, और तुम... तुम बस मेरी बातें सुनने के लिए हो।" आर्यन का कलेजा मुँह को आ गया। उसने भर्राई आवाज़ में पूछा, "रिया, क्या मैं तुम्हारे लिए बस एक 'ऑप्शन' हूँ? क्या हमारी रूह का कोई नाता नहीं?" रिया खिलखिलाकर हंसी, "रूह? आर्यन, तुम किस ज़माने की बातें कर रहे हो? आजकल प्यार रूह का नहीं, जरूरतों का सौदा है। जिस्म और पैसे की भूख के आगे वफ़ा अब एक 'आउटडेटेड' शब्द बन चुका है। मुझे अपनी लाइफ में वैरायटी चाहिए, एक बोरिंग वफ़ादार नहीं।" आर्यन ने देखा कि रिया का फोन लगातार बज रहा था—अलग-अलग नाम, अलग-अलग जरूरतें। उसे समझ आ गया कि जिसे वो अपनी कायनात समझ रहा था, वो असल में एक चलता-फिरता 'बाज़ार' थी। आर्यन ने खामोशी से अपना रास्ता बदल लिया। दो साल बाद... वही रिया एक अस्पताल के बेंच पर अकेली बैठी थी। उसका वो चेहरा, जिस पर उसे गुमान था, अब बीमारी और तनाव से फीका पड़ चुका था। विक्की किसी और के साथ था, समीर ने फोन उठाना बंद कर दिया था। जिन्हें उसने अपनी 'जरूरतों' के लिए रखा था, उन्होंने रिया को 'जरूरत खत्म' होते ही कूड़े की तरह फेंक दिया। तभी आर्यन वहाँ से गुजरा। वह अब एक ठहरा हुआ और कामयाब इंसान था। रिया ने उसका हाथ पकड़ लिया, "आर्यन, मुझे बचा लो! सब छोड़कर चले गए। मुझे अब समझ आया कि मुझे एक साथी की जरूरत थी, खिलौनों की नहीं।" आर्यन ने बड़े दर्द के साथ उसकी आँखों में देखा और कहा: "रिया, तुमने रूह को छोड़कर जिस्म और दौलत का सौदा किया था। जब तक बाज़ार में रौनक थी, तुम्हारे पास भीड़ थी। आज जब तुम्हारी रूह को मरहम चाहिए, तो वो सारे 'सौदेबाज' गायब हैं। तुमने साथ नहीं, साधन ढूंढे थे। और याद रखना रिया, साधन बदल दिए जाते हैं, पर सच्चा साथी सिर्फ एक बार मिलता है... जिसे तुमने अपनी 'स्मार्टनेस' के चक्कर में खो दिया।" आर्यन मुड़ा और भीड़ में ओझल हो गया। पीछे रह गई रिया, जो अब उस भीड़ में भी दुनिया की सबसे तन्हा औरत थी। सुखविंदर की कलम से "आजकल मोहब्बत रूह की इबादत नहीं, बल्कि जिस्मों की नुमाइश और जरूरतों का धंधा बन गई है। लोग एक दिल में चार-चार घर बना कर रहते हैं, पर याद रहे कि भीड़ में हाथ पकड़ने वाले तो बहुत मिलते हैं, पर रूह का साथ निभाने वाला कोई एक ही होता है। जिस्म की भूख मिट सकती है, पर जब रूह प्यासी रह जाती है, तो पूरी दुनिया की दौलत भी वो सुकून नहीं दे पाती। वक्त रहते वफ़ा को पहचानो, वरना अंत में सिर्फ तन्हाई का सन्नाटा बचता है।"
