किश्तों में बिकी शराफत
किश्तों में बिकी शराफत
आर्यन एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का था, जिसके पिता की अचानक मौत ने उसे रिया के आलीशान बंगले में 'वेटर' और 'हेल्पर' बनने पर मजबूर कर दिया था। उसे पैसों की सख्त जरूरत थी, और रिया इसी मजबूरी का फायदा उठाती थी।
उस शाम रिया के बंगले पर एक बड़ी पार्टी थी। रिया ने चमकीली ड्रेस पहनी थी और हाथ में वाइन का गिलास लिए अपने अमीर दोस्तों के बीच ठहाके मार रही थी। आर्यन ट्रे लेकर मेहमानों को पानी पिला रहा था। अचानक रिया की नज़र उस पर पड़ी।
"ओए नौकर! इधर आ," रिया ने ऊँची आवाज़ में उसे सबके सामने बुलाया।
आर्यन पास गया, तो रिया ने जानबूझकर अपना पैर आगे बढ़ा दिया। आर्यन लड़खड़ाया और सारी ट्रे रिया के महंगे सैंडल पर गिर गई। सन्नाटा छा गया। रिया ने आव देखा न ताव, आर्यन के चेहरे पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया।
"अपनी औकात भूल गया? मेरे जूतों की कीमत तेरी खानदानी जायदाद से ज्यादा है!" रिया ने चिल्लाते हुए कहा। "देख रहे हो तुम लोग? ये मिडिल क्लास लोग सिर्फ हम जैसे अमीरों के पैरों की धूल साफ करने के लायक हैं। इसे वफ़ा और शराफत की बातें मत सिखाओ, इसे बस पैसा फेंक कर मारो, ये नाचने लगेगा।"
आर्यन की आँखों में खून उतर आया था, पर माँ की बीमारी और घर की गरीबी ने उसकी ज़ुबान सिल दी थी। उसने बिना कुछ कहे झुककर रिया के जूतों से पानी साफ़ किया। रिया ने अपनी सहेली के हाथ से पाँच सौ का नोट लेकर आर्यन के चेहरे पर दे मारा। "जा, अपनी शराफत का सौदा कर ले!"
आर्यन वो नोट वहीं छोड़कर बंगले से बाहर निकल गया। उस रात उसने आसमान की तरफ देखकर बस एक ही बात कही थी, "ऐ खुदा, आज मेरी गरीबी का मजाक उड़ा है, कल इसकी रईसी का हिसाब तू जरूर करना।"
5 साल बाद...
वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि रिया के पिता का अरबों का बिजनेस मिट्टी में मिल गया। धोखे और कर्जों ने रिया के परिवार को सड़क पर ला खड़ा किया। आज उसी आलीशान बंगले की नीलामी थी। रिया अपनी बूढ़ी माँ के साथ फटे-हाल कपड़ों में कोने में खड़ी रो रही थी।
बोली शुरू हुई—10 करोड़... 20 करोड़... 50 करोड़!
तभी एक गूँजती हुई आवाज़ आई— "100 करोड़!"
सबकी गर्दनें मुड़ गईं। एक ब्लैक मर्सिडीज से आर्यन उतरा। उसका चेहरा वही था, पर आज उसकी आँखों में बेबसी नहीं, एक शांत समंदर था। उसने नीलाम करने वाले अफसर को चेक थमाया और बंगले की चाबियाँ ले लीं।
रिया भागकर आर्यन के पास आई और उसके पैरों में गिर गई। "आर्यन! मुझे माफ कर दो। हमें इस घर से मत निकालो, मेरी माँ बीमार है, हम कहाँ जाएंगे?"
आर्यन ने धीरे से अपना पैर पीछे खींचा। उसने अपनी जेब से एक पाँच सौ का पुराना नोट निकाला और रिया के हाथ में रख दिया।
"रिया जी, याद है ये नोट? उस दिन आपने मेरी शराफत का सौदा किया था। आज मैंने आपकी रईसी का सौदा कर लिया है।" आर्यन ने गहरी सांस ली और कहा, "बंगला आपका ही रहेगा, मैं आप जैसी छोटी सोच का इंसान नहीं हूँ। लेकिन याद रखना, जिस गरीबी का आपने मजाक उड़ाया था, आज उसी गरीबी की मेहनत ने आपको सर छुपाने की छत दी है। अब इस घर में मालकिन बनकर नहीं, मेरी अहसानमंद बनकर रहिएगा।"
आर्यन मुड़ा और बिना पीछे देखे अपनी गाड़ी में बैठकर चला गया। पीछे रह गई रिया, जो आज उसी बंगले के फर्श पर बैठी अपनी उस पुरानी रईसी के जनाज़े पर मातम मना रही थी।
सुखविंदर की कलम से
"दौलत का नशा इंसान को इतना अंधा कर देता है कि उसे सामने खड़ी रूह की चीखें सुनाई नहीं देतीं। कभी किसी मजबूर की बेबसी का तमाशा मत बनाना, क्योंकि जब वक्त इंसाफ की कलम उठाता है, तो बड़े-बड़े महलों के मालिक भी एक-एक सांस के लिए तरस जाते हैं। पैसा हैसियत दिला सकता है, पर इंसानियत और सुकून नहीं
