Reetu Singh Rawat

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Reetu Singh Rawat

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पर्यावरण की सुरक्षा

पर्यावरण की सुरक्षा

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पर्यावरण की सुरक्षा के लिए स्कूल में पुरानी कापी - किताबों और स्लेट का महत्व समझे आज स्कूल के वो दिन याद आया जब नई कक्षा से पास हो जाते थे तो अपने से आगे वाली किसी लड़की से पूछ लेते थे कि आप पास हो गए हैं तो अपनी पुरानी किताबे मुझे दे देगे तब वो कहती हाँ पर आधे दाम में दूँगी । हम खुशी खुशी ले लेते और उस पर अच्छा सा कवर, वो भी समाचार पत्र का पुराना पेपर चढ़ाकर बड़े ही मजे से पढ़ते ,न कोई परेशानी न कोई दुख और साल भर पढ़ने के बाद हम से भी कोई फिर आधे दामों में ले जाता। हम फिर किसी से पुरानी किताबें खरीद लेते और फिर साल भर पढ़ने के बाद फिर आधे दामों में बेच देते यह सिलसिला चलता रहता । किताबें कभी पुरानी न होती और न ही लगती एक ही किताब कई सालों तक बच्चे पढ़ लेते और बच्चों से किताबें न मिलती तो किताब की दुकान से जाकर आधे दाम पर खरीद लाते और माँ बाप के पास न अधिक पैसा था। बस अपने बच्चों का स्कूल में दाखिला कराकर घर आ जाते।

अपनी जिम्मेदारी पूरी निभाते। बच्चे भी मन लगाकर खूब पढ़ते और जब पास होते तो उनके घर वाले खुश हो जाते। समय कब बीतता गया पता ही नहीं चला। जब पढ़ लिखकर स्कूल से निकल जाते तब माँ पिताजी को खुशी होती पुरानी किताबों के साथ कॉलेज भी चले जाते है और फिर कुछ नौकरी में और कुछ काम धंधे में और कुछ लड़कियों की शादी हो जाती । कुछ बच्चे आगे बढ़कर जिंदगी में माँ बाप का नाम रोशन करते।

आज यह इतना लिखने का मतलब कहानी सुनना नहीं है। इसके पीछे एक गंभीर समस्या से अवगत करना है जो पर्यावरण से भी है। पेड़ों को काटकर कागज और बहुत कुछ बनाया जाता है ।आज के मानव जीवन के लिए पेड़ों की कटाई एक समस्या के साथ खतरा भी बन रही है। हम चाहे तो एक छोटी सी शुरुआत कर सकते है वो है कि हम सभी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की किताबों को हर साल पुरानी किताबे समझकर रद्दी में फेंक या बेचे देते हैं।

हम पेड़ से बने कागज की उपयोगिता को नही समझते क्योंकि कुछ लोग के पास पढ़ने के लिए किताब ही नहीं होती है इस लिए हमारे देश के बहुत से परिवार के बच्चे स्कूल नहीं जा पाते हैं। अगर स्कूल का प्रशासन चाहे तो हमारी और सरकार की बहुत मदद कर सकता है । आप पर ही जानते हैं कमाई का आधा हिस्सा शिक्षा के बाजार पर चला जाता है घर में खाने से ज्यादा फिक्र स्कूल की फीस की होती है नही तो स्कूल से निकालने में देरी नहीं होती है।

अगर स्कूल चाहे तो किताबों को वापस लेकर नई कक्षा के बच्चों को दोबारा दे सकता है। परिवार वालों पर किताबों का खर्च न के बराबर या आधा हो जाएगा क्योंकि कोई भी बच्चा क़िताबों को फड़ता नही है बहुत प्यार से रखता है किताबें सब को प्यारी होती है और आज के युग में पढ़ाई का ख़र्च 30 दिन की तनख्वाह से भी अधिक हो रहा है माँ बाप दोनों मिलकर न कमाए तो घर और बच्चों की जिम्मेदारी निभाना मुश्किल हो जाए हर माँ बाप की इच्छा होती है कि हमारे बच्चे कुछ बन जाए और अगर सरकार थोड़ा सा इस विषय में गंभीरता से सोचे तो पर्यावरण और माँ बाप का थोड़ा सा बोझ कम हो सकता है। किताबों को स्कूलों में दोबारा से इस्तेमाल करें ।छोटे बच्चों को स्कूल में लिखने के लिए कापियों का इस्तेमाल कम और फिर से स्लेट पर लिखने का कार्य शुरू करे। छोटे बच्चे लिख -लिख कर सीखते हैं।

जिससे पेपर का प्रयोग अधिक और पर्यावरण का नुकसान ज्यादा होता है जिसके जिम्मेदार हम भी है। छोटे बच्चों को स्कूलों में स्लेट पर लिखना आसान भी तो है हमने भी तो उसी पर लिखना सीखा था । कापियों की जरूरत कम होगी यह एक अच्छी शुरुआत फिर से होगी आप कहेंगे कि आज दुनिया लेपटॉप की बात कर रही हैं और मैं स्लेट की ,पर में पर्यावरण को देखते हुए एक पुरानी पद्दति की और जा रही हूँ क्योंकि स्कूलों में इसकी शुरुआत करने में कोई दिक्कत नहीं है और माँ- बाप को भी आए दिन कापी- पेंसिल के खर्च से छूटकारा मिलेगाऔर पैसों की भी बचत होगी स्लेट पर लिखना और मिटाना भी आसान है बचपन में हम सब ने भी तो स्लेट पर लिखकर ही तो पढ़ाई की हैं क्या हम नहीं

पढें अगर चाहे तो इंसान कुछ भी कर सकता है बस सोचना हम सबको है हम भी बच्चे थे और आज पढ़ लिखकर एक अच्छी जगह खड़े हैं इसी स्लेट से शुरुआत की थी आज भारत में अनेक डॉक्टर, इंजीनियर,टीचर, बड़े- बड़े सरकारी अफसर और न जाने पढ़े लिखे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने देश में शिक्षा से, शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाई आज पर्यावरण के बढ़ते संकट आपको दिख ही रहे हैं एक छोटी सी शुरुआत सरकार फिर से कर सकती है पर्यावरण के रक्षा के लिए। पेड़ -पौधे को सींचना मुश्किल है और काट देना आसान तो पर्यावरण को सुरक्षित करने के लिए कुछ शुरुआत मिलकर करे। घर से भी कर सकते हैं।


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