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Aaradhya Ark

Romance Classics Fantasy


4  

Aaradhya Ark

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मोरा साँवरा मन भायो रे

मोरा साँवरा मन भायो रे

15 mins 408 15 mins 408

"उफ्फ्फ एक तो वैसे ही देर हो गई अब घर जाकर छाता लेकर आऊँ उसमें दस पंद्रह मिनट और गए। आज तो ऑफिस के लिए देर हो ही जाएगी;; नूपुर बुदबुदाई। वह घर से निकली ही थी कि बूंदाबूंदी शुरू हो गई। आज उसे हर हाल में ऑफिस जल्दी पहुँचना था और इंद्रदेव को भी आज ही अपने करतब दिखाने थे।अब छाता लाने घर जाना ही पड़ेगा।हड़बड़ी में ऑटो से उतरते हुए नूपुर छाता स्वयं ही बुदबुदाते हुए घर की ओर चल पड़ी।

अभी उसने दो कदम ही बढ़ाया था कि सामने से नंदन आता हुआ दिखा।उसने एक हाथ से अपना छाता पकड़ा हुआ था और दूसरे हाथ में नूपुर का छाता लिए हुए था। उसे देखकर नूपुर को शायद आज तक इतनी ख़ुशी नहीं हुई थी जितनी आज हुई थी।"नालायक" यही पुकारती थी हमेशा नूपुर अपने छोटे भाई को। पर आज उसी नालायक को अपना छाता लाता हुआ देखकर नूपुर को बड़ी ख़ुशी हुई और उसपर बड़ा प्यार भी आया।

"दिद्दा ! तुम हड़बड़ी में अपना छाता घर पर ही भूल आई थी अब तेरी वजह से मैं आधा तो भीग ही गया हूँ, ये लो अपनी सतरंगी छतरी !"

नंदन ने नूपुर को छाता पकड़ाते हुए कहा तो नूपुर ने थोड़ा आगे झुककर उसके बाल बिगाड़ दिए तो नंदन के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

"अच्छा हुआ तु मेरी छतरी ले आया वरना मैं और देर हो जाती"

बोलते हुए नंदन के हाथ से छतरी लेकर नूपुर तेज़ कदम बढ़ाते हुए वापस ऑटो स्टैंड की ओर बढ़ चली।

मेरा कितना ख्याल रखता है। वैसे है तो नालायक पर कभी कभी बड़ा केयर करता है मेरी।सोचते हुए नूपुर को नंदन पर बड़ा प्यार आया। इतना नटखट है कौन कहेगा कि इसने अभी बारहवीं की परीक्षा पास की है।नूपुर उसे प्यार से नंदू कहकर ही बुलाती थी।वह आगे और कुछ सोचती कि तब तक मेट्रो स्टेशन आ गया। आज ऑटो ने मेट्रो स्टेशन जल्दी पहुँचा दिया था क्योंकि शेयर ऑटो में बारिश की वजह से आज कोई दूसरी सवारी चढ़ी ही नहीं थी।

आज उसके ऑफिस में मीटिंग थी और जिनका जिनका प्रमोशन हुआ था, उसका नाम अनाउंस होने वाला था। इसलिए नूपुर का दिल जोर जोर से धड़क रहा था। सेल्स में यह उसका दूसरा साल था, अगर सैलरी बढ़ जाती है तो वह एक स्कूटी ले लेगी। नूपुर ने कबसे तो सोच रखा था।

आज नूपुर लेडीज़ डब्बे की ज़गह ज़नरल डब्बे में ही चढ़ गई थी।;;; "माफ कीजियेगा, आप अपना छाता ऑटो में ही छोड़ आई थी। आपके पीछे ऑटो वाला भागकर देने आया था, पर तबतक आप ऊपर चढ़ गई थी तो वह मुझे देते हुए आपकी ओर इशारे से बताकर गया कि यह छाता मैं आपको दे दूँ !";; आवाज़ नूपुर के ठीक पीछे से आई थी। आज मेट्रो में भीड़ भी काफ़ी थी सो पीछे मुड़कर आवाज़ वाले शख्स को देखने के लिए नूपुर को अच्छी खासी मशक्क़त करनी पड़ी थी। उसने मुड़कर देखातो एक सुदर्शन युवक उसकी ओर उसकी सतरंगी छतरी बढ़ाते हुए कह रहा था।

"ओह थैंक्यू !"बोलकर नूपुर छाता लेकर मुड़ने ही वाली थीकि पीछे से आती आवाज़ सुनकर आश्चर्य से मुड़कर देखने लगी।

"तुम तुम नूपुर हो ना ? डिजिटल विंगवाली !";;; अ.. अ....हाँ तुम रोहन हो, है ना ?";; बोलते हुए अचानक नूपुर को याद आया यह तो बड़ा सीधा सादा हुआ करता था और आज इतना टीप टॉप.... ? यह रोहन ही है या कोई और.... ?नूपुर ने पूछा तो रोहन ने हाँ में सर हिलाया। अगला स्टेशन साकेत था, नूपुर को यहीं उतरना था। उसने रोहन को फटाफट अपना फोन नंबर दिया और उसका मोबाइल नंबर भी लेते हुए बोली, "अभी जल्दी में हूँ रोहन ! शाम को फ्री होकर कॉल करुँगी !" और रोहन के देखते देखते नूपुर उतर गई।

नूपुर को रास्ते में फिर एकबार रोहन का ख्याल ख्याल आया कि, "बड़ा हैंडसम लग रहा था ये चेपू रोहन तो। ज़ब मेरे साथ डिजिटल मार्केटिंग का कोर्स किया करता था तब कैसा घोंचू सा हुआ करता था। कुछ भी समझ नहीं आता तो मुझसे पूछने को ही चेप होता था। तभी तो मैं इसके पीठ पीछे चेपू रोहन बोलती थी" सोचकर नूपुर के चेहरे पर एक स्मित सी मुस्कुराहट खेल गई फिर अपना सर झटककर ऑफिस के अंदर चली गई।

आज उसका अच्छा दिन था। आज उसका प्रमोशन भी हुआ, सैलरी भी बढ़ी और ब्रांच भी चेंज हुआ। रोहिणी ब्रांच में हुआ था नुपुर का ट्रांसफर और उसका घर भी तो रोहिणी में ही था।" वाओ ! अब ऑटो और मेट्रो का झंझट ही नहीं और अब सैलरी बढ़ने से वह अपने लिए स्कूटी भी खरीद सकेगी।

आज शाम को नुपुर ने अपनी सैलरी से मिठाई नंदन के लिए स्पोर्ट्स शू और माँ के लिए घर पहनने के लिए दो हल्के गाउन ले लिए। वह बहुत खुश थी अपने प्रमोशन से। मानसून के दिनों में उसे आज प्रमोशन के तौर पर बड़ी प्यारी सौगात मिली थी और अब बढ़े हुए वेतन से नूपुर अगले कुछ महिनों में अपने लिए और अपने घर के लिए कुछ ज़रूरी सामान ले सकती थी। पूरे रास्ते नूपुर लगभग अगले एक साल तक की योजना बना चुकी थी।

सबसे पहले तो स्कूटी लेगी। फिर नंदन के लिए नया लैपटॉप उसके बाद वैक्यूम क्लीनर। नूपुर के पास तो जैसे पूरी लिस्ट तैयार थी।

तीन साल पहले ज़ब नूपुर के पापा की मृत्यु हुई थी तब नूपुर,नंदन और उनकी माँ गायत्रीजी ने सोचा भी नहीं था कि नूपुर इतनी जल्दी घर संभाल लेगी।ज़ब घर जाकर नूपुर ने अपना प्रमोशन कन्फर्म बताते हुए मिठाई का डब्बा माँ को पकड़ाया तो गायत्रीजी खुशी से सज़ल नेत्रों से भगवान को मिठाई चढ़ाने गई।तब तक नंदन भी बाहर से आ गया था। गायत्रीजी ने मिठाई का एक टुकड़ा नंदन और एक टुकड़ा नूपुर के मुँह में डालते हुए कहा,

"बहुत अच्छा हुआ बेटा जो तुम्हारी सैलरी बढ़ गई। इसी महीने से ऊपर के किराएदार घर खाली कर गए तबसे थोड़ा पैसे की कमी हो जाती। वैसे जल्दी ही "टू लेट" का इश्तेहार दे दो ताकि अगले महीने से किराये की रकम भी बराबर आने लगे !"

नूपुर ने माँ की बात सुनकर कहा,;;; 'ज़रूर ढूंढेगे हम एक नया किराएदार;; ;;; हमारी प्यारी माँ तुम रहो ना यूँ बेज़ार ';; 

नूपुर की इस नौटंकी वाले अंदाज़ और मज़ेदार बात पर सब हँस पड़े। थोड़ी देर में नूपुर अपने कमरे में फ्रेश होने चली गई और नंदन माँ से ज़िद करके एक केक लाने बाजार की ओर चल दिया।

कपड़े बदलकर नूपुर हॉल में आई ही थी कि उसके मोबाइल पर एक फोन आया,

"हैलो,आप कौन बोल रहे हैं ?"नूपुर ने पूछा तो उधर से आवाज़ आई

"अच्छा मैडम ! इतनी जल्दी भूल गई ? मैं रोहन बोल रहा हूँ, जिससे आज आप सुबह मेट्रो मे मिली थीं और बंदे का फोन नंबर भी लिया था !"

"ओह रोहन ! सॉरी, मैं सुबह ज़ल्दबाज़ी में नंबर सेव करना ही भूल गई। वो आज सुबह मैं कुछ जल्दी में थी ना !"

नूपुर ने कहा।

दरअसल नूपुर नहीं पहचान पाई थी कि कौन बोल रहा है। फिर अचानक उसे याद आया अरे आज ही तो मेट्रो में मिला था।

नूपुर ने रोहन को उत्साहित होकर कहा,

"आज बहुत दिनों के बाद तुम्हें देख कर मुझे बहुत खुशी हुई तुम यहां कैसे तुम तो लखनऊ में रहते हो !"

" अभी भी मैं लखनऊ में रहता हूं लेकिन मेरी नौकरी यहां पर लगी है मुझे तिलकनगर के सुदूर ब्रांच में ट्रांसफर मिला है। वैसे दिल्ली में सब कुछ तो ठीक है।अभी अपने दोस्त के घर में रह रहा हूं मुझे यहां आए हुए अभी सात दिन हुए हैं तुम तो यहां हमेशा से रहती हो।क्या तुम मुझे कोई अच्छा घर बता सकती हो। कोई किराए का अच्छा सा घर बताना कम से कम दो कमरे का ताकि कभी-कभी मेरी माँ भी आकर मेरे साथ रह सके !"

रोहन जैसे एक साँस में इतना कुछ कह गया।

"अच्छा बाबा ! पहले ये तो बताओ, तुम कैसे हो !"

नुपुर ने हँसते हुए कहा तो रोहन बोला,

" मैं बिल्कुल ठीक हूँ। आज सुबह तुमसे मिलकर बहुत ख़ुशी हुई।तुम तो पहले से भी बहुत खूबसूरत हो गई हो !"

रोहन बोला तो नूपुर थोड़ा शरमा गई।

इसके आगे कि वो दोनों कुछ और बात करते। रोहन बोला,

"तुम्हारे आसपास बहुत शोर क्यों हो रहा है जैसे कि बहुत सारे लोग कुछ हंगामा कर रहे हैं !"

"अरे बहुत सारे लोग नहीं है मेरा यह जो है ना नटखट नालायक भाई नंदन यह है, और उसका एक दोस्त है और मम्मी है !"

"लेकिन शोर किस बात पर हो रहा है ?"

रोहन ने पूछा।

"अरे मैं तुझे बताना ही भूल गई आज हमारे ऑफिस में प्रमोशन अनाउंस हो रहा था और मुझे सेल्स से उठाकर एकदम एरिया मैनेजर का पोस्ट मिल गया है और मेरी सैलरी बढ़ गई है और प्रमोशन भी हुआ। उसीकी मिनी पार्टी चल रही है घर में और क्या !"

नूपुर ने कहा।

"अच्छा यह तो बहुत खुशी की बात है फिर तो पार्टी होनी चाहिए !"

रोहन ने बहुत खुश होते हुए कहा आज काफी दिनों बाद नूपुर को रोहन की आवाज सुनकर लग रहा था कि वह रोहन तो हुआ करता था जिसमें कॉन्फिडेंस नहीं था आज कितने आत्मविश्वास से बात कर रहा है।

इतने में बड़ा सा केक लेकर नंदन आ गया और उसे बुलाने लगा,

"दिद्दा !जल्दी आओ, जल्दी आओ केक काटते हैं,तुम्हारे प्रमोशन का केक काटते हैं !"

तो ना चाहते हुए नूपुर को रोहन के साथ अपनी बातचीत स्थगित करनी पड़ी। नूपुर ने रोहन से कहा,


"ऐसा है कि मैं तुमसे बाद में बात करती हूँ। ये जो मेरा छोटा भाई, मेरा दुश्मन नंदन है ना वो मुझे किसी से चैन से बात करने नहीं देगा। क्या बताऊँ,इसकी वजह से आज तक सिंगल रह गई।किसी से बात ही नहीं करने देता !"

नूपुर ने मज़ाक़ के लहज़े में कहा तो रोहन भी उसी अंदाज़ में बोला,;;; क्या ? तुम सिंगल हो ? वाह मुझे तो यह जानकर बहुत खुशी हुई।मैं भी सिंगल ही हूँ !";; रहने दो रोहन !मज़ाक़ को यहीं रहने दो।अब तुम भी नौटंकी मत करो मैं तुमसे कल बात करूंगी !"

बोलकर नूपुर फोन काटने ही वाली थी कि रोहन बोल उठा,

"अरे ! रुको नूपुर सुनो तो मैं तुमसे एक बात बोलना तो भूल ही गया

कांग्रेचुलेशन मैडम जी !अब तो आपका प्रमोशन हो गया है हमें मिठाई कब खिला रही हो।हमें भी तो पार्टी चाहिए पार्टी !"

तब तक माँ नूपुर को बुलाने आ गई तो नूपुर ने झटपट कहा,

"शनिवार को"

और फोन काट दिया।

"दिद्दा ! जल्दी आओ, तुम केक काट रही हो कि हम बिना काटे खा जाएं !"

नंदन ने आवाज़ दी तो नूपुर दौड़कर आई।

फिर केक काटकर माँ और नंदन को खिलाया।उस दिन काफ़ी अरसे बाद घर में खुशियाँ आई थी और नूपुर खुद को बहुत ज़िम्मेदार महसूस कर रही थी एकदम पापा की तरह।सोने से पहले नूपुर अपने प्रमोशन को सोचकर भगवान को बार -बार धन्यवाद देती रही। पापा के जाने के बाद माँ बहुत कम ही समय पर इतना खुश होती थी। आज माँ को इतना खुश देखकर नूपुर के मन में बहुत सुकून था।अपने मन में कल के अच्छे दिनों को सोचते सोचते उसे कब नींद आ गई उसे पता ही नहीं चला।अगले कुछ दिन काफी जिम्मेदारी और व्यस्तता भरे थे।प्रमोशन से पहले भी वह बहुत मेहनत कर रही थी। शनिवार को उसकी छुट्टी थी सो उसने सोचा था, माँ और नंदन को लेकर फ़िल्म देखने चलेगी। ऑफिस से आकर चाय का कप लेकर बैठी ही थी कि रोहन का फोन आया,"हैल्लो... मैम ! कल आप इस बंदे को अपने दर्शन दे रही हैँ ना ?""ओह... मैं तो भूल ही गई थी !"अनायास ही नूपुर के मुँह से निकल गया तो रोहन उसे अगले दिन मिलने बोलने कहने लगा। नूपुर उसे कुछ जवाब देती उसके पहले ही माँ सामने आ गई और चेहरे पर कौतुहल का भाव लिए उसकी तरफ देखने लगी तो हड़बड़ाहट में नूपुर बोल उठी,

"माँ !आपको वो रोहन याद है,जो तीन साल पहले डिजिटल ट्रेनिंग के दौरान मेरे साथ था,उसकीपोस्टिंग यहीं एस.बी.आई.तिलकनगर ब्रांच में हो गई है। उसे किराए का घर चाहिए इसलिए मुझे फोन कर रहा था !"माँ को बड़ी मुश्किल से रोहन याद आया। अचानक गायत्रीजी बोल उठीं,

"नूपुर बेटा !उसे कल लंच पर बुला लो, इसी बहाने वह घर भी देख लेगा !""ठीक है माँ !मैं उसे अभी फोन करती हूँ !"नूपुर उत्साहित होकर बोली।"हैलो ! रोहन, कल मेरे घर पर आ जाओ। वो तुम अपने लिए घर ढूंढने को कह रहे थे ना। बस समझ लो तुम्हारी तलाश पूरी हो गई। कल दोपहर एक बजे के आसपास मेरे घर आ जाना। एड्रेस व्हाट्सप्प कर देती हूँ !"नूपुर ने रोहन को फोन पर कहा तो रोहन फिर से उसे छेड़ने लगा,"ओहो..... मैं तुम्हें इतना पसंद हूँ कि हमेशा अपनी नज़र के सामने रखना चाहती हो। तुम्हारी मम्मी ने कल लंच पर बुलाया है तो कहीं कल मुझसे शादी की बात तो नहीं करनेवाली है ?""ओफ्फोह ! रोहन, हर बात को मज़ाक़ में मत उड़ाओ !"नूपुर ने नकली गुस्सा दिखाते हुए कहा।जबकि उसके दिल में भी रोहन के लिए प्रेम का छोटा सा पौधा पनप चुका था। अबके बारिश नूपुर के मन को रोहन के रंग में रंग गई थी।अगले दिन ठीक एक बजकर पाँच मिनट होते ही रोहन घर आया। आते ही नूपुर ने उसे छेड़ते हुए कहा,"वाह !तुम तो समय के एकदम पाबंद निकले !"बदले में रोहन ने नूपुर की आँखों में देखते हुए लगभग फुसफुसाकर कहा,";; तुमसे मिलने की, तुम्हें एक नज़र देखने की बेक़रारी जो थी !"; 

सुनकर नूपुर की तो शर्म से बोलती ही बंद हो गई।

खाना खाने के बाद नूपुर ज़ब रोहन को उपरवाले कमरे दिखाने ले गई तभी हल्की बारिश शुरू हो गई। घर देखने से ज़्यादा तो रोहन नूपुर को निहार रहा था।अचानक एकांत पाकर रोहन नूपुर की ओर मुड़ा और उसकी आँखों में आँखें डालकर बोला,"मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ नूपुर !शायद तुम्हें सुनने में कुछ अजीब लगे पर ज़ब डिजिटल ट्रेनिंग के दौरान तुम मेरी हिचकिचाहट और अंग्रेजी ठीक से ना बोल पाने पर अन्य लोगों की तरह मेरा मज़ाक़ ना उड़ाकर मेरी मदद करती थी। तभी से मेरे मन में तुम्हारे लिए बहुत सम्मान है। तुम मानो या ना मानो, पर तुम्हारी ही प्रेरणा से मैं बैंक की प्रतियोगी परीक्षा पास करके बैंक मैंनेज़र की नौकरी के लिए प्रयास किया और मेरी सफलता का श्रेय भी तुम्हीं को जाता है !"नूपुर रोहन की बात सुनकर अचंभित थी। पर उसके विवेक ने सर उठाया तो नूपुर ने पुछा,";; पर मैं कैसे मान लूँ कि तुम मुझसे प्यार करते हो। तब तो कुछ कहा नहीं।अभी अगर सोमवार को हमारी मुलाक़ात मेट्रो में नहीं हुई होती तब... ?"; नूपुर की बातें एकदम तार्किक थी।उसका जवाब रोहन ने बहुत ही सधे हुए शब्दों में दिया,"तुम्हारी बातें और तुम्हारी ज़िज्ञासा बिल्कुल सही है नूपुर ! तब मुझमें इतना आत्मविश्वास नहीं था। मैं अपने आपको तुम्हारे काबिल नहीं समझता था। मैं तो तभी तुम्हें अपने दिल की बात बता देता, बस डरता था कि कहीं तुम इनकार ना कर दो !"रोहन के इतना कहते ही नूपुर शरारत से बोली,

"तो तुम्हें अब कैसे लगा कि मैं मान जाऊँगी, इनकार नहीं करुँगी !""वो तो तुम्हारी आँखों में अपने लिए प्यार पढ़ लिया था मैंने। मैंने यहाँ की पोस्टिंग भी तो सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी खातिर ली है और संजोग देखो ना यहाँ आकर ज्वाइन करने के दूसरे ही दिन भगवान ने मुझे तुमसे मिलवा दिया और वो भी इस सतरंगी छतरी के बहाने !"

बोलते हुए रोहन ने नुपुर का हाथ पकड़ लिया।और नूपुर.... ?वह तो मन्त्रमुग्ध सी होकर अपने साँवरे सलोने की बात सुन रही थी।बारिश की कुछ बुँदे उसके बालों को भिगोते हुए गालों तक आ गई थी। एक नटखट लट उसके गालों से शरारत करने ही वाली थी कि नूपुर ने उसे हाथ से हटाना चाहा.....";; रहने दो ना, तुम्हारे गोरे गुलाबी गालों पर इस काली घुँघराली लट को। कम से कम इन्हें तो तुम्हारे गाल चूमने की इज़ाज़त है। हम तो दूर से देखकर ही खुश हो लेंगे !"; रोहन ने बड़े ही प्यार से नूपुर को एकटक निहारते हुए कहा तो नूपुर उन प्यार भरी मस्त निगाहों का सामना ना कर सकी और शरमाकर निगाहेँ झुका ली।आज बादल भी बरस बरसकर उनके प्यार पर जैसे अपनी स्वीकृति की मुहर लगा रहे थे। नूपुर और रोहन अभी और ऐसे ही एक दूसरे में खोए रहते कि माँ उनके लिए कॉफी लेकर ऊपर आईं। अपनी चंचल, बातूनी बेटी को यूँ चुपचाप लाज से रत्नार हुए भीगते हुए स्तब्ध खड़ी देखा तो कुछ कुछ समझ गईं कि रोहन और नूपुर सामान्य बातचीत तो नहीं ही कर रहे थे। पर गायत्रीजी प्रकट में बोलीं,

"अरे !तुमदोनों यूँ बारिश में क्यों भीग रहे हो। बीमार पड़ जाओगे !"माँ की बात सुनकर नूपुर हड़बड़ा गई और उसके मुँह से निकल गया,"माँ !रोहन कह रहा है कि वह मुझे बहुत प्यार करता है और मुझसे शादी करना चाहता है !"बोलकर नूपुर एकदम तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरते हुए अपने कमरे की ओर भागी।इधर रोहन गायत्रीजी के हाथों से ट्रे लेते हुए ऊपर के कमरे में ले गया। दोनों वहाँ रखे दीवान पर बैठ गए। इसके पहले कि गायत्रीजी कुछ पूछतीं रोहन खुद बोल पड़ा,"आँटी, नूपुर सही कह रही है, मैं उसे बहुत प्यार करता हूँ और उससे शादी करना चाहता हूँ !"

";; वो तो ठीक है बेटा, पर क्या नूपुर भी तुमसे प्यार करती है ? और तुम्हारे घरवाले ?; गायत्रीजी ने यूँ ही टोह लेने के लिए पूछा तो रोहन ने कुछ ना कहते हुए सिर्फ हाँ में सर हिलाया। और फिर बोला,"मेरे घरवालों में सिर्फ माँ और एक छोटा भाई है। मेरे पिताजी ज़ब मैं सत्रह साल का था तभी गुजर गए थे। माँ को मैं नूपुर के बारे में बता चुका हूँ,उन्हें कोई एतराज़ नहीं है !"सुनकर गायत्रीजी आश्वास्त हुईं। अब दोनों नूपुर के कमरे की ओर बढ़ चले। सीढ़ियाँ उतरते हुए रोहन ने गायत्रीजी को बताया कि घर देखना तो एक बहाना है। वह अपने मामाजी के खाली फ्लैट में ऑलरेडी शिफ्ट कर चुका है, जो अभी अपनी कंपनी की तरफ से तीन साल के लिए सपरिवार लंदन गए हैं।दोनों ज़ब नूपुर के कमरे में पहुँचे तो वह चुपचाप आईने के सामने खड़ी खुद को निहार रही थी। उसे देखकर गायत्रीजी को ख्याल आया,

;; ज़ब किसी लड़की को जीवन में कोई मनचाहा मीत मिल जाता है तब उसे खुद पर बड़ा प्यार आता है और अक्सर वो अपने प्रिय की नज़र से खुद को देखने लगती है !; "आज नूपुर भी खुद को जिस प्यार से निहार रही थी और रोहन को देखकर जिस ढंग से उसने अपनी नज़रें शर्म से झुका ली उससे और आगे कुछ पूछने की आवश्यकता ही कहाँ थी।;; उसकी ख़ामोशी में अपने प्रेम की मौन सहमति थी।; गायत्रीजी ने दोनों को बुलाकर आशीर्वाद दिया और उन्हें कुछ देर एक दूसरे के साथ अकेला छोड़कर बाहर निकल आईं।

आज गायत्रीजी की आँखों में ख़ुशी के आँसू थे। सज़ल नेत्रों से अपने पति की तस्वीर के सामने खड़ी होकर जैसे अपनी ख़ुशी उनसे साझा कर रहीं थीं। उन्हें याद आया ज़ब नूपुर का जन्म हुआ था और वह अपने प्रथम संतान को पुत्री के रूप में पाकर किंचित उदास हुई थीं तो उन्हें अपने स्वर्गीय पति प्रदीपजी ने कहा था.....

";; तुम्हें इसकी चिंता करने की ज़रूरत नहीं। देखना हमारी बेटी के लिए रिश्ता खुद सामने से आएगा। कोई राजकुमार इसे ब्याह ले जायेगा !"; तभी नंदन माँ के पास आया और उनकी आँखों में आँसू देखकर कारण पूछने लगा तो गायत्रीजी ने उसे नूपुर और रोहन के रिश्ते की बात बताई। सुनकर रोहन दौड़कर अपनी नूपुर दीदी के कमरे की ओर जाने लगा तो गायत्रीजी ने उसे रोक लिया। कदाचित वह नूपुर और रोहन को कुछ पल एकांत के देना चाहती थीं।उधर अपने कमरे में नूपुर रोहन के प्रेम में अभिभूत होकर कह रही थी,";; अबके बारिश में तुमने तो मेरे मन को भी अपने प्रेम से भिगो डाला मेरे साँवरे !"; रोहन ने नूपुर को गले लगाते हुए उसके ललाट पर अपने प्रेम का पहला स्पर्श किया।;; आज बारिश की बूंदो ने दो प्रेमियों को प्रेम के मज़बूत बंधन में बाँध दिया था।; नूपुर को रोहन के बाहुपाश का ये घेरा सहर्ष स्वीकार था जिसमें वह अपने आपको एकदम सुरक्षित महसूस कर रही थी तो रोहन को भी अथक परिश्रम के बाद अपना प्यार...अपने सपनों का साकार रूप सामने मिला था। दोनों के लिए यह जीवन का यह पल एकदम किल्लौल करता हुआ सा था।


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