मंदिर
मंदिर
वह पहली बार रावण दहन में आया था, उसे किसी ने कहा था राम के दर्शन यहाँ भी होते हैं। अपने छोटे भाई को गोद में लिये वह भीड़ में आगे से आगे बढ़ता जा रहा था।
चलते-चलते वह किसी से टकराया, उसका भाई गोद से गिरने ही वाला था, कि दो हाथों ने उसे संभाल लिया, और एक गंभीर आवाज़ आई, "जय जिनेन्द्र..., ध्यान रखो बेटे, छोटा बच्चा साथ है।"
वह अचंभित हुआ और चुपचाप चल दिया, आगे कुछ पगड़ीधारी व्यक्ति खड़े थे, वह उनके बीच में से सिर झुका कर निकलने का प्रयास कर रहा था कि उनमें से एक ने उसके छोटे भाई के मुंह पर प्यार से चिकौटी काटी और हँसते हुए कहा, "सत श्री अकाल काके"
उसकी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गयी, वह और आगे चल पड़ा, कुछ ही दूरी पर उजली धोती और जनेऊ पहने एक व्यक्ति दिखाई दिया, वह घबरा सा गया और उसने उस व्यक्ति को दूर से ही हाथ जोड़े, उस व्यक्ति ने मुस्कुरा कर कहा, "जाओ बेटा आगे जाओ", यह सुनकर उसके चेहरे पर अविश्वास के भाव आ गये।
अब वह रावण के बहुत पास था, रावण को ध्यान से देखते हुए, वह सोच रहा था कि कस्बे के मंदिर या किसी बड़े आदमी के घर से उन्हें बाहर से ही भगा दिया जाता था। वह अपने विचारों में मग्न ही था कि मुख्य द्वार से राम की सवारी आई और भीड़ जयघोष करने लगी, "जय श्री राम”
उसने पीछे मुड़ कर देखा, उसके चेहरे पर ख़ुशी झलकी और वह भी चिल्लाया, "जय श्री राम"
और फिर धीरे से कहा, “जय रावण”
