मकड़जाल
मकड़जाल
रात्रि घिर चुकी थी .. कुत्तों की भौंकने की आवाज़ें बहुत दूर से सुनाई दे रहीं थीं ..।
जब सन्नाटा घिर जाता है तो बेखौफ बन कुछ साए अपनी अतृप्त इच्छाओं के लिए इंसानी बस्तियों में प्रवेश करते हैं...।
ऐसा ही कुछ यहां होने जा रहा था :
वह चाचा के लड़के के ब्याह के लिए गांव में आया हुआ था ..उसका अभी ब्याह नहीं हुआ था..।
उस रात वह छज्जे में लेटा हुआ था, उसे महसूस हुआ कोई हंस रहा है और उसे अपने पीछे आने को कह रहा है ..।
पहले तो वह बहुत घबराया, फिर सम्भला, उसे कुछ ऐसा हुआ कि वह, राह में एक ऊंचे कुंए के पास ...बंशी अपनी धुन में उसके पीछे चला जा रहा था ..।
उधर हंसने की आवाज उसे अभी भी सुनाई दे रही थी, पेड़ों के झुण्ड हवाओं से हौले हौले हिल रहे थे .. किसी की आवाज की प्रतिध्वनि सुनाई दी, उससे कहा, "---बंशी ... क्या तुम ..मुझे सुन रहे हो !!? हैं कि नहीं...!!"
बंशी ने डरते हुए कहा "--अ्अ्अआ....प्प्प्प कौन ..?"
उधर से प्रतिध्वनि आई" --इसका मतलब आपको सुनाई दे रहा है ...।"
",--मुझे जो सुनता है वो अपने बस में नहीं रहता ..आओ ..आ...ओ मेरे पीछे चले आओ ..।" वह आवाज धीरे -धीरे पास आ रही थी, और फिर उस अजनबी साए ने कुएं के अंदर प्रवेश किया ..।
बंशी कुछ देर ठिठका और देखता रह गया वह तो एक जबरदस्त साया था...। उसके लम्बे केश और नीचे पैरो की जगह सतह बिल्कुल खाली थी ..गर्दन और धड़ सटे हुए थे ..।
वह घबराकर बोला, "--तुम मुझे यह कहां चलने को कह रही हो ? और मेरे पांव खुद ब खुद तुम्हारे पीछे चल रहें हैं जो कि वे मेरे वश में नहीं है ..। मैं क्यों तुम्हारे पीछे चल रहा हूं ? मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है ..? आखिर तुम चाहती क्या हो और कौन हो ?"
वह लगातार उसे कुएं के नीचे की ओर आने के लिए प्रेरित कर रही थी ...। उसकी अजीब सी आवाजें दिल में हलचल पैदा कर रहीं थीं ..। बंशी को मालूम नहीं था कि दूसरे पल क्या होने वाला है ..?
वह बोली,"--- बंशीधर ..पहले तुम आसन लगाकर कुएं के पास बैठो, मैं जल या कुएं के पास ही अपनी कहानी सुनाने में सक्षम रहूंगी ..! सुनो मैं जीवन की आपबीती सुनाने जा रही हूं ..मैं ..त्रिपुंड में रहने वाली बेहद सुंदर एक गायिका संभावी थी ..। जाने ऐसा क्या था मुझमें जो भी देखता मेरा ही हो जाता था ..। मेरी मां कभी राज नृत्यांगना रही थी, मुझे संगीत और नृत्य विरासत में मिला था । उनसे प्रेरित होकर मैंने हर तरह की कला को सीखा, यही कारण था कि लोग मुझे जल्दी भूल नहीं पाते थे, मेरे गाए गीत कई समय तक लोग गुनगुनाते और उनके मस्तिष्क में रच -बस जाते ...। अप्सराओं और नृत्यांगनाओं में भी एक विचित्र आयोजन आयोजित किया जा रहा था, जिसे आचार्य चंद्रपाल जी की देखरेख में सम्पन्न किया जा रहा था ..। मैंने उनका कई बार नाम सुना था किन्तु उन्हें कभी देखा नहीं था ..।
उस समयकाल में मैं अबोध बालिका थी, मुझे मालूम नहीं था कि मेरा सौंदर्य ही मेरा शत्रु बनेगा । मां भी अपने संगीत को साध रहीं थीं और प्रतिदिन रियाज करती रहतीं ...उस दिन मां ने मुझे विशेष गीली मिट्टी लाने के लिए उस नृत्य शाला में भेजा, उनको उससे एक सुंदर सारंग तैयार करना था, मैं अबोध दौड़कर वहां पहुंची ... वहां लगता था मेरा कोई पहले से इंतजार कर रहा था ...। उसने मेरा शील भंग किया और मैं ...पड़ी -पड़ी अपने भाग को कोस रही थी ...। वह निर्मम क्रूर भाग चुका था...।
बहुत देर तक जब मैं नहीं पहुंची तो मां घबराहट में वहां पहुंची ..। मुझे उस हाल में देख बहुत रोई ...। वही मेरे जीवन का पहला सबक था ..।
मुझे मालूम नहीं था कि वह कौन था ? उसने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?
मेरी मां ने किसी को भी इस बात की भनक नहीं लगने दी कि,मेरे साथ क्या हुआ था ?
कुछ दिनों बाद जब मैं अपना कार्यक्रम के लिए मंच पर पहुंची तो दंग रह गई वो मेरा शील भंग करने वाला तो आयोजक कर्ता चंद्रभान ही निकला ...मेरे मन में विचार आया मैं तुरंत मर ही जाऊं वह तो अधेड़ उम्र का पुरुष हूबहू वही था, उसकी आवाज़ डील- डौल, कद काठी लगभग वही थी ..।
ईश्वर से भला क्या शिकायत कह सकती थी ? जीवन दुख की बहती सरिता में मैं डूब गई थी, बस . .. आव देखा ना ताव मैं ने इस कुएं में छलांग लगा दी ..आज कई वर्षों से यहां पर ही भटक रही हूं ..।
और हां..! मेरी आत्मा को मुक्ति तभी मिलेगी जब किसी कुंवारे लड़के से मेरा ब्याह होगा .. क्या आप करोगे मेरे संग विवाह ? पता नहीं तुमको देखकर ऐसा लग रहा कि तुम मेरे साथ विवाह को मना नहीं करोगे ..।"
इतनी कहानी सुनकर बंशीधर चौंका और बोला,"---य्ये कैसे सम्भव हो सकता है? आप तो प्रेतनी है ना..? मैं कैसे आप से विवाह कर सकता हूं ..?"
वह बोली,"---इस कुंए के सात फेरे लगाने होंगे और विवाह ...हो जाएगा बस ..।"
बंशीधर बुरी तरह डर गया बोला "--ये आप क्या कह रहीं हैं ?"
",--जी, मैं सही कह रहीं हूं ...आपको ढूंढने में मुझे पूरे दो हजार वर्ष लगे हैं ...कितनी योनियों बाद आपको मनुष्य जन्म मिला है ..आज मेरी मुराद पूरी हुई है ..।( जोर से हंसी )
"--क्या मतलब आपका ?" बंशीधर जोर से पसीने -पसीने होकर बोला..।
"--इतना भी नहीं समझे नादान ..कर्म का लेखा जोखा ...यहीं मिलेगा मनुष्य योनी में...जब तुम मुझसे ब्याह करोगे ही.. क्योंकि तुम्हारे भाग्य में यही बदा है.. तुम ही उस जन्म में चंद्रभान थे ..। तुम एक मकड़ जाल में फंस चुके हो ..। जिससे बचकर तुम नहीं निकल सकते ..।" कहते हुए प्रेत साया उसके समीप आया ..।
बंशीधर बोला,"--तुमसे विवाह करने से अच्छा कुएं में ही छलांग लगा लूं .. .जाल में फंस ही गया हूं तो ऐसे ही सही ..!" कहकर वह उस अंधेरे कुएं में कूद पड़ा ...।
जैसे मकड़जाल में जब मकड़ी फंसते हुए रह जाती है, वैसे ही पूर्व जन्म का चंद्रभान बंशीधर बन फंस कर रह गया था ..जो अब कभी नहीं निकल सका था ..।

