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Manju Singhal

Abstract Classics Inspirational


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Manju Singhal

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मेरी पड़ोसन

मेरी पड़ोसन

3 mins 141 3 mins 141

मार्च 2021 में हमने मकान बदला। साउथ दिल्ली की ऊंची सोसाइटी कहलाती थी उसमें मकान लिया। ग्राउंड फ्लोर का खुला खुला बड़ा और हवादार मकान था। दिल्ली के लिहाज से बड़ा सा आंगन था जिसका गेट कॉलोनी की सड़क पर खुलता था और दूसरी तरफ सुंदर पार्क था। बहुत ही खुशनुमा घर था।

 अभी हम समान ही जमा रहे थे ,सुबह का समय और अच्छा मौसम, मैं कुछ देर के लिए बाहर गेट पर चली गई। तभी कानों में आवाज आई “हाय, आई एम 68”। कुछ असमंजस में इधर उधर देखा कि कौन मुझे अपनी उम्र बता रहा है? तभी देखा एक महिला हाथ हिलाती मेरी तरफ आ रही थी। थोड़ा छोटा कद, भारी बदन, साधारण नाक नक्श और छोटी छोटी आंखें, खुलता रंग, मतलब उन्हें सुंदर तो नहीं कह सकते पर वह अपनी तरफ ध्यान आकर्षित करती थी। उनके चेहरे पर खिली धूप सी हंसी थे और उस हंसी में बच्चों की तरह भोलापन था। वह हंसी उन्हें खास बनाती थी। असल में वह हमारे अगले मकान में रहती थी उसका मकान नंबर 68 था जो वह मुझे बता रही थी।

 बातचीत हुई और वह मुझे अच्छी लगी, फिर तो रोज वह उसी उजली हंसी के साथ हाय हेलो करती और मिलती। उनका समय घर में कम और सड़क पर ज्यादा बीता था। दो बच्चे थे, एक लड़की और एक लड़का, दोनों पढ़ाई कर रहे थे। घर बहुत बड़ा था पर इतना टूटा और बदरंग खंड हर नजर आता था। पूरी कॉलोनी में वह घर अजीब सा लगता था पर होगा मैंने ध्यान नहीं दिया। रोज सुबह मैं देखती उनके गेट पर टूटी साइकिल पर एक आदमी टूटी चप्पल, गंदे कपड़े और साइकिल पर बाबा छवि वाला थैला लटकाए दिखाई देता था। मुझे लगा इनका नौकर होगा पर एक दिन किसी ने बताया कि वह उनके पति थे। बड़ी हैरानी हुई। कुछ दिन बाद जब भी मिलती हंसते हंसते कुछ ना कुछ परेशानी बता जाती। मस्त मौला की तरह खूब घूमती और हंसते रहते थे और हर एक से बातचीत करती थी तब लगा नहीं असलियत कुछ और है। दिवाली आई वह गिफ्ट लेकर आई, मैं कभी उनके घर गई नहीं थी सोचा चलो दिवाली पर मिलने जाना चाहिए और मैं एक गिफ्ट लेकर अपनी बेटी के साथ उनके घर गई। उनके कमरे में पहुंचे तो समझ में नहीं आया कि कहां खड़े हो कहां बैठे हैं। इकलौता एक कमरा जो सामान से खचाखच भरा हुआ था उसमें चार लोगों निवास था। सीढ़ियों के नीचे हाथ भर की रसोई जिसमें कोई सुविधा नहीं थी। लगता है उस कमरे की कभी रंगाई पुताई भी नहीं हुई थी। उनसे मिलकर हम लोग लौट आए। बाद मैं उन्होंने दिल खोला के घर में उनकी कोई कदर नहीं है। बूढ़ी सास ने सारे कमरों में ताले लगा रखे थे और उन्हें रहने के लिए सिर्फ एक कमरा दिया था। बूढ़ी सास बहुत कठोर थी, रात दिन गालियां देती और पति पूरे मातृ भक्त। बच्चे भी उनकी नहीं सुनते थे। हर समय उन्हें घर से निकालने की धमकी दी जाती थी, हाथ में एक नया पैसा भी नहीं होता था। उनका कहना था कि वह बिना वेतन की नौकरानी है। 

सच कहूं तो उनकी बड़ी दयनीय स्थिति थी। पर मैं कायल हो गई उनकी हिम्मत की इतने बुरे हालात में भी हर समय हंसती रहती और दूसरों की मदद के लिए तैयार रहती। कभी मैंने उन्हें मुंह लटकाए नहीं देता। हर समय एनर्जी से भरी रहती। बेहद साधारण रंगों के साथ भी वह मुझे एक असाधारण महिला लगी जो दूसरों को खुश रहने की प्रेरणा देती है।


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