मेरी दादी के किस्से और नुस्खे
मेरी दादी के किस्से और नुस्खे
ड्रीम डायरी भाग 2
इस शीर्षक को देखकर बचपन की यादें चलचित्र की भांति चलने लगी दादी जो अपने आप में एक शानदार शख्सियत थी। हर काम में परफेक्ट हां वह 5 कक्षा तक पढ़ी थी ।
बप्पा(बाबाजी ) जूनियर स्कूल में प्रधानाध्यापक थे ।मेरे पिता जी मेरी दादी जी की इकलौती संतान थे टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज में प्राध्यापक । मैं गर्मियों की छुट्टियों में अपनी मां के साथ गांव आती ,कभी- कभी हम दोनों बहने अकेले ही आ जाते दशहरा या दीपावली की छुट्टियों में ,मुझे और मेरी बहन को देख वह फूली न समाती ।
हमें पहले ही मूंग की दाल के लड्डू ,आंवले का मुरब्बा, आटा बेसन मिले खुरमा और भुने चने का सत्तू सब पहले से बना कर रखती आज मैं जब खुद दादी बनी हूं तो सोचती हूं कि ना मिक्सी दाल पीसने को थी सिल पर पीसती थी । घर पर चक्की में दाल दलती , दाल भिगोकर धुलती, घर के बने भैंस के घी से इतनी मेहनत से चूल्हे में लड्डू बनाती और आज हमें इतने साधन होते हुए भी बनाने में थकान लगती है झट रेडीमेड की सोचते है।
वैसे मेरी पूरी कोशिश होती है कि मैं अपनी पोती को भी उसी तरह कर सकूं
मेरी दादी एकदम स्लिम थी ना कोई योगा ना जिम प्रातः 4:00 बजे उठना घर की चक्की में 5 किलो आटा पीसना ,गाय भैंस को पानी खाना देना, ,उन का बाड़ा साफ करना। हर बात को लॉजिक से समझाती ।मां के घर आ जाने से उन्हें खाना बनाने से राहत हो जाती और उनका समय अधिक से अधिक हमारे साथ बीतता उनका प्राकृतिक जुड़ाव सोच कर मन आज भी चकित रह जाता है।
काली मिट्टी से बाल धोना, गर्मियों में घमौरियां होने पर पीली मुल्तानी मिट्टी पोतना, नीम की पत्तियों फलो को पकाकर मल्हम बनाना, फुंसी होने में नीम की छाल का प्रयोग करना एक बार तो दादी को देखकर मै मंत्र मुग्ध हो गई रात को अचानक मेरी बहन को कान में बहुत तेज दर्द होने लगा मां भी परेशान थी दादी पास में आई और बोली ,दुल्हन (यह उनका मां के लिए संबोधन शब्द था) परेशान ना हो अभी ठीक हुई जइ (जाएगी )फटाफट कुछ पत्ते तोड़कर और हाथ से मसलकर उसका रस कान में डाल दीं ।यह क्या जादू हुआ धीरे धीरे मेरी छोटी बहन सो गयी उस का दर्द ठीक हो गया था।
मैंने पूछा दादी किसकी पत्ती है बोली, "बिटिया इ सुदर्शन का पत्ता है" और हंसने लगी ।बताया ना हर काम में परफेक्ट।
पड़ोस में किसी की बेटी बेटे की शादी हो किसी का मुंडन सगाई हो उनके बिना पूरा ही ना होता गेहूं धुलाने से लेकर बड़ी पापड़ बनवाना हर रस्म के गाना गाना पूरी रात जागना ।सुबह आती बाबा जी को खाना बनाकर फिर भागती और विदाई होने पर उनको दुनियादारी की सीख दे कर ही आती। पता नहीं कहां की क्षमता थी??
कोई के यहां कोई दुख गमी हो जाए तो सब से पहले भोजन प्रबन्ध वही करती।
उनका प्रिय नाश्ता हाथ के पीसे गेहूं का आटा भैंस का घी और खांड (देशी कच्ची शक्कर) एक चुटकी पिसी काली मिर्च मिश्रित कर मुझे खाने को देती और स्वयं खाती मैंने कभी उन्हें बीमार होते नहीं देखा 95 साल की उम्र में नहीं रही पर कभी आंखो में चश्मा न लगा गुटका (छोटा रामचरितमानस) पढ़ लेती।
एक बार की बात मेरी मां की उम्र लगभग 48 वर्ष की रही होगी ,डॉक्टर ने चश्मा का नंबर दिया दादी ने देखा तो बोली यह भी फैशनेबल हो रही है ।दांत तो मोती जैसे, मंजन भी क्या घर के उपले की राख ,लकड़ी के कोयले को पीसकर मंजन रूप में प्रयोग कर लेना, नीम की दातुन कर लेना, चिरचिटा की दातुन करना यह ही उनके मंजन थे जब जो सुलभ हो जाए।
दोपहर में मेरे साथ चंदा पव्वा (कौड़ी का खेल )गर्मियों में खेलती सतोलिया सर्दी में, पत्थर के छोटे गुट्टे सावन में खेलते ।हर त्यौहार की तैयारी पूरी जीवंतता के साथ ही मनाते झूला झूलना सावन में गाना गाना मेहंदी आर्ट में भी चैंपियन क्या तरीका था ,मोम (बैक्स) को कटोरी मे पिघलाती और नीम की सीक से डिजाइन बनाते ऊपर से पूरे हाथ में पत्ती वाली मेहंदी सिल पर पीसकर ऊपर से लगा देती। थोड़ी देर में मोम वाली जगह रंगीन नहीं होती अद्भुत कलाकारी दिखती।
कांच की टूटी चूड़ियों से डिजाइनर सजावटी चीजें बनाती ।बबूल की फलियों और कांटों से भी नई रचना तैयार हो जाती।
खाना तो इतना स्वादिष्ट कि खाने वाला उंगलियां चाटता रह जाए। बनाने का तरीका ऐसा आधुनिक मशीनें भी मात खा जाएं भरवां करेला ,भरवा बैगन दादी की मिट्टी की मटकी ही कुकर थी रात में गुरसी (मिट्टी के बने पात्र में) आग जला कर रख देती सुबह एकदम सोंधी महक से सुसज्जित तैयार डिश होती फ्रिज के बिना 2 दिन चलती ।
पानी के मटका रखने का ढंग हो या पुराने कपड़े की कतरन से गुड़िया गुड्डे तैयार करने हो, मिट्टी के खिलौने पल भर में बन जाते ।मिट्टी की गोलियां बना, धूप में सुखाकर उनसे गिनती सिखाना ।
कोई नई बात सिखाने के लिए तुरंत एक कहानी निर्मित हो जाती , तुकबंदी खेल-खेल में सिखा देती चौपाई छंद सोरठा का ज्ञान बचपन में ही हो गया था हमे। उनका सारा ज्ञान प्रयोगात्मक कलात्मक होता सिर की मसाज ऐसे करती कि बडे -बडे मसाजर भी मात खा जाए।
आज मैं सब कुछ अपनी पोती को देने की कोशिश करती हूं वह 9 साल की है और सभी चीजों को सीख रही है ताकि मेरी दादी का ज्ञान विलुप्त ना हो कहने को बहुत कुछ है पर फिर कभी ।
वे अनुशासनात्मक थी पर दण्डात्मक (दण्ड,फटकार डाट -डपट के खिलाफ ) न थी।हर सीख खेल- खेल मे सिखा देती ।
दादी की स्मृति में सजल नेत्र
सधन्यवाद
