भावना कुकरेती

Abstract


4.0  

भावना कुकरेती

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मदद

मदद

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1-

शाम हो रही थी। "बचिया, जल्दी इधर आओ" नीता की सासु माँ ने बालकनी से दबी-दबी आवाज में अंदर सूखे कपड़े सहेजती नीता को बुलाया। नीता ने बालकनी में आकर झांका।


"जी, मम्मी जी क्या हुआ? "

"ढोंगी मिश्राईन की  खिड़की देखो",

नीता उस ओर झांकने लगी।

"अरी मूर्खा... झाँकती काहे हो, आंखें नीची कर कनखियों से देखो...नाम की पढ़ी लिखी हो तुम भी..हुंह!"


नीता की सासु माँ बालकनी में पौधों को पानी देने का अभिनय करते हुए मिश्राईन की कोठी की ओर देख रहीं थीं। नीता ने शब्द-शब्द उनका अनुसरण किया।

"ओह माँ!"

"चुप चुप, बस देखती रहो।"

"ये बहुत गलत हो रहा है मम्मी जी।"

"कहे न चुप रहो !"


नीता का मन दुखता जा रहा था।अगर अभी वह घर मे अकेली होती तो पुलिस को फोन कर चुकी होती।उसने हिम्मत करके सासु माँ से धीमे से कहा।


"मम्मी जी पोलिस को फोन करते हैं, नहीं तो कुछ अनर्थ हो जाएगा।"

"पगला गयी हो क्या, पोलिस के झंझट ज्यादा पसंद आते हैं क्या तुमको? ऐसे लोगों की दुश्मनी मोल लोगी? परिवार है तुम्हारा, चलो जाओ अंदर।"


सासु माँ की झिड़की सुन वह अंदर चली आयी। मगर उसकी आँखों के आगे वो क्रूर दृश्य चल रहा था।मैन में घुमड़ रहा था, 'क्या करूं, कैसे करूँ की मदद हो पाए और सास जी भी नाराज न हों' ।


2-

"ओम भूर्भुवः स्व:...." दरवाजे की कालबेल से पूरी कोठी गूंज गयी। मिश्रा जी ने अपने cctv कैमरे में देखा कि घर के बाहर एक साध्वी खड़ी थी। मिश्रा जी ने पास खड़ी मिश्राईन को आंखों से इशारा किया।


"कौन है?" मिश्राईन ने अंदर से ही आवाज लगाई। "हरि ओम तत्सत...आदेश हुआ है तुम्हारे घर का "साध्वी ने ऊंची आवाज में बोला।


पांच मिनट बाद मिश्रा जी भी मिश्राईन के साथ मेन गेट पर आ गए। गेट खोल कर उन्होंने साध्वी को पोर्च में बड़े सत्कार के साथ बिठाया। मिश्राईन दान में अन्न धन देने के लिए वापस अंदर चली गयी। मिश्र जी करबद्ध साध्वी के आगे खड़े थे।


"तुम्हारे घर का आदेश हुआ है बेटा।"

"कैसा आदेश माता जी?"

"तुम्हारे घर मे एक व्यक्ति के पीठ पर काला दाग है? "

"हमारे यहां?"

"हां, मंदिर में उसका आदेश हुआ है।"

" माता जी...ऐसा दाग तो किसी के शरीर पर नहीं है"

" है...गुरु जी त्रिकालदर्शी हैं ।वे गलत नहीं हो सकते।"


अत्यधिक पूजा पाठ करने वाली मिश्राईन दान के लिए सवा सवा किलो अन्न और 1001 रुपया परात में सजा कर ले आयी।उसने मिश्रा जी के कान में कुछ कहा।मिश्रा जी के चेहरे का भूगोल विकृत सा हुआ फिर खुद को संयमित करते हुए बोले।


"जी ..ये बता रहीं हैं कि एक के है।"

"उस व्यक्ति को तुरंत मेरे साथ भेजो, अनुष्ठान होना है, 1 घंटे बाद मंदिर से लेते आना।"

"अभी स्नानघर में है , हम बाद में लेते आएंगे।"

" गुरु जी ने साथ ही ले आने की आज्ञा दी है बेटा।"


साध्वी ने बहुत संयत स्वर में कहा, मिश्राईन को मिश्रा जी ने कान में कहा " तुम साथ चली जाओ, गुड़िया को में संभाल लूंगा। "


साध्वी ,मिश्राईन और अंजना दोनो मंदिर की ओर जा रहे थे। अंजना बार-बार पीछे मुड़ कर कोठी की ओर देख रही थी। मिश्रा जी अपनी पोती मायरा को गोद मे लिए खड़े थे। मायरा बुरी तरह रोये जा रही थी।


3-

अगली सुबह कॉलोनी में हल्ला हो गया। मिश्रा जी के गेट पर लोगों की भीड़ थी।कल अंजना और मिश्राईन मंदिर से लौट रही थी कि अंजना का बीच रास्ते किसी ने किडनैप कर लिया और उसी रात सोती मायरा को घर से कोई उठा कर ले गया।दुर्भाग्य से cctv में किडनैपर को पहचाना नहीं जा सका।

सपाट चेहरा लिए मिश्राईन,आस पड़ोस की औरतों से घिरीं थीं।

"पोलिस में कम्प्लेन तो कर चुकी होंगी न आंटी जी"

"बताइये बदमाशों के हौसले तो देखिए , रिटायर्ड IG के घर ही...पूरी प्लानिंग रही होगी बदमाशों की ।

"हां, सही कह रहीं हैं, एक ही दिन ...पहिले बहू और फिर पोती..कुछ चोरी भी नहीं हुआ।" नीता की सास जी कह रहीं थीं।

मिश्राईन ने मिश्रा जी को पाठक जी के साथ पोलिस चौकी से लौटते देखा तो उठ खड़ी हुईं। सभी औरतें अपने अपने घर लौट गयीं।


4-


रात के 8 बज रहे थे ठंड बढ़ रही थी, कॉलोनी में सन्नाटा पसरा था । सासु मां आज भी बालकनी में ही थी , नीरा उनके लिए शाल ले कर आई ।सामने मिश्रा जी की बड़ी सी कोठी से आवाजें आ रहीं थीं। उनके बैठक की खिड़की खुली हुई थी।

"देखो ज़रा, कमबख्त कैसे बेइज्जत कर रहा है।"

सासु माँ, नीता से फुसफुसाई। कनखियों से दोनो सास बहू उधर ही देख रहे थे।


पाठक जी अपने आंखों में आंसू लिए हाथ जोड़े कह रहे थे।

"मेरी बेटी ऐसी नहीं है मिश्रा जी..."

"देखिये पाठक जी वो तो आप बेहतर जानते होंगे।पर अब अंजू से हमारा कोई नाता नहीं। "

"ऐसा न कहिये वो आपकी बहू है, पोती .."

"कौन जानता है किसका खून हो गुड़िया..हमारा बेटा तो टूर में ही ..."मिश्रा जी खड़े होते हुए बोले।

"मिश्रा जी.." पाठक जी का मन आहत हो उठा।

" मुहँ न खुलवाईये  विनय ने पहले दिन ही सब बता दिया था हमे पाठक जी ।अंजू ने ख़ुद उसे जतिन और उसकी दोस्ती के बारे में बताया था।"

" अब होगी वो उसी के साथ" मिश्राईन भी बोलीं।

" बताने को तो अंजू ने भी बताया था कि कैसे शादी के अगले दिन से ही आप सब उसके साथ जानवरों की तरह पेश आते थे, इन तीन बरसों में हमेशा नील देखें हैं हमने उसके शरीर पर।" पाठक जी भी खड़े हो गए थे ।उनके चेहरे पर क्रोध और घृणा के भाव स्पष्ट थे।

" बकवास मत करिये..दफा होइये यहां से..अब कोई रिश्ता नही हमारा आप लोगों से ।"


5-


नीरा का फोन बजा। नीरा किचन में आटा गूंथने जा रही थी ।सासु माँ ने उसे किचेन में फोन ला कर दिया। उसने फोन स्पीकर मोड में कर दिया।

"हेलो"

" हेलो"

"जी कौन?"

"एक मिनट, लीजिये इनसे बात कीजिये"कुछ पल को दुसरीं तरफ खामोशी थी।

" हाय नीरा ..?!"

"तुम? तुम्हें कहा था न यहां कभी फोन नहीं.. "नीरा ने झट से स्पीकर मोड ऑफ कर फोन कान में लगा लिया।इस फोन के वजह से उसके चेहरे पर पसीना छलक आया था।


6-

सासु माँ ने खाना खाते हुए नीता और अपने बेटे सचिन की ओर देखते हुए कहा

"गुरु जी कह रहे थे कि उनको दक्षिण का प्रभार दे दिया है ,अब वे अपने अनुयायियों के साथ त्र्यम्बक में ही रहेंगे, सोच रही हूँ उनके जाने से पहले एक भंडारा करवा दूं। अलाइ-बलाई दूर होगी।"

"ओके , जैसा आपको ठीक लगे।" सचिन ने जवाब दिया ।सासु मां ने फिर से सचिन की ओर देख कर कहा,

" मिश्रा ने कोई कम्प्लेन नहीं कि अपनी बहू पोती के लिए ?! "

"नही माँ, सुना है कि अब अपने बेटे के लिए दूसरीं लड़की देख रहे।"

"कौन देगा उस आवारा को अपनी लड़की"

"क्या मतलब ?"नीता और सचिन दोनो हैरान हो कर सासु माँ को देखने लगे।

"हम सबकी खबर रखते हैं..।" कहते हुए सासु माँ ने नीता की ओर गौर से देखा। नीता कुछ असहज हुई।


7-

"भैया जी ...जानते हैं ये मिश्रा लोग का परिवार बहुत ही बेरहम है।" एक रविवार की दोपहर ड्राइंग रूम में अखबार पढ़ते सचिन से काम वाली नीचे जमीन पर बैठते हुए बोली।

"तुम झटपट काम करो अपना...और जाओ।" वहीं पास बैठी सास जी ने काम वाली को झिड़क दिया।

"क्या अम्मा... सब जानते है मिश्रा और ओकर परिवार कैसा है, कर्म फूटे थे अंजू दीदी के जो उस घर ब्याही, अच्छा ही हुआ दूसरे मर्द के साथ भाग गयीं।"

" भाग गई!"

" हाँ भैया, हम देखे थे उस दिन। "

"तुम ने देखा था? कब ?कहाँ?"

सचिन ने अखबार को किनारे करते हुए कहा। नीता की सास जी ने नीता को आवाज दी।

"बचिया, सब काम करा ली हो न ?",

"जी मम्मी जी"

नीता ने ड्राइंग रूम में सचिन,सास जी और अपनी चाय ले कर आते हुए कहा। काम वाली बोले जा रही थी।

"भैया जी ,ओ ही दिन सांझ में ...अंजू दीदी न.." काम वाली अब लगभग फुसफुसाते हुए बोलने लगी थी।" ....एक औरत और एक आदमी के साथ बहुत बड़ी कार में दिखी थीं, बहुत रो रहीं थी ।"

"अच्छा?!!"

" हां भैया ...औरत तो ...नीता दीदी की तरह का सूट पहनी थीं।" उसने नीता की ओर इशारा करते हुए कहा।


नीता ,सास जी के बगल में बैठ कर अपने कप से चाय का घूंट ले रही थी।कामवाली की बात सुनते ही उसका गला लग गया।वह जोर से खांसने लगी।सचिन ने तुरंत उठ कर उसे संभाला और पीठ सहलाने लगा।

" तुम ही तो नहीं थीं कहीं, नीता के सारे सूट तो...तुम्ही ले जाती हो।" 

सास जी ने भँवें उठाते हुए जोर से कहा और सीधा तन कर बैठ गईं।

"राम! राम! हम काहे होंगे अम्मा!? हम काहे भगाएंगे किसी को?! एक थान से तो कई लोग सूट बनाते हैं न अम्मा..!" काम वाली घबरा कर तुरंत अपना पर्स टेबल से उठा कर बाहर चली गयी।


7-


"नीता? उस दिन अंजू का ही फोन था न !?" रात के 11 बज रहे थे।पैर दबाती हुई नीता से सास जी ने नींद में जाते हुए पूछा। सवाल सुनते ही नीता को काटो तो खून नहीं।

"...",

"ठीक है न वो..?"

सास जी ने करवट बदलते हुए कहा।

".."

"पाठक जी को पता है न वो कहाँ है?

"...ज..जी ,बस अपनी कुशल दे रही थी..अ..अब फोन नहीं करेगी"

"हम्म...बहुत रिस्क वाला काम की हो , जाओ अब सो जाओ।"

नीता ने रूम की बत्ती बन्द की और धड़कते दिल के साथ अपने कमरे में जाने लगी।

"बचियाss ..."

सास जी ने फिर उसे आवाज दी। नीता के पैर वहीं जम गए।

"...आगे कभी ऐसा... जानती हो न पोलिस का काम है लोगों को बचाना...जिसका काम उसी को साजे और करे तो..."

"जी, मम्मी जी" नीता तेज़ी से चल कर अपने कमरे में आ गई।

देखा, सचिन बिस्तर पर लेटे किताब पढ़ रहे थे। उसका घबराया हुआ चेहरा देख कर परेशान होकर बोले "क्या हुआ डियर?" ।नीता तुरंत बिस्तर में आकर सचिन में छुप गयी और डरते -सुबकते, अपनी कॉलेज की सहेली अंजू की सारी बात बता दी। 

नीता और अंजना एक ही कॉलेज में पढ़ा करती थीं। वहां दोनो के कॉमन फ्रेंड जतिन से उसे प्यार था।जातिन होनहार और बहुत केयरिंग स्वभाव का था लेकिन जाति से बनिया था और अंजना ,ब्राह्मिन।अंजना के पिता जी उनके रिश्ते के लिए राजी नही थे। पिताजी का मान रखने के लिए दोनो ने अपने रास्ते अलग कर लिए थे। उसके बाद अंजना का परिवार कोलकाता चला गया था।

    जब मिश्रा जी के घर नए बहू की मुंह दिखाई के लिए नीता और उसकी सासू माँ गयी थीं तब वहां अंजना को उनकी बहू के रूप में देख वह चौंक गयी थी। तभी अंजना ने उससे वादा लिया था कि वह किसी को नहीं बताएगी की वे दोनों सहेलियां हैं और  इस तरह वे आम पड़ोसन बन कर ही रहीं। लेकिन अंजना के ऊपर होते अत्याचार को वह सह नहीं पाती थी।उसने अंजना को आवाज उठाने को भी कहा पर अंजना अक्सर उसे मना कर देती थी।

  लेकिन जिस दिन उसने अंजना के ससुर को उसे बुरी तरह मारते देखा उससे रहा न गया।जतिन का नम्बर उसके पास था। उसने जतिन को सब बताया। जतिन की जॉब विदेश मे लग गयी थी। वो जाने वाला था ।लेकिन अंजना की दुर्गति सुन कर उसने अंजना की मदद के लिए नीता की मदद मांगी । 

 जतिन और नीता ने मंदिर की साध्वी जी के साथ मिलकर पूरा स्वांग रचा। उस दिन मंदिर से लौटते वक्त वे जतिन और नीता ही थे जो कार में थे। जतिन ने अंजना के पास  कार पास लाकर दरवाजा खोला और अंजना को अंदर खींच लिया। लेकिन शायद वे भी उससे मुक्ति चाह रहीं थीं। उन्होंने कोई शोर नहीं मचाया।

 रात में अंजना ही अपनी बेटी को ले कर चली आयी थी। मिश्रा जी पोलिस के तामझाम से दूर रहना चाहते थे।उन्होंने चौकी में सारी बात, बाद में सेट कर ली थी। कुछ दिन बाद पाठक जी को भी सब पता चल गया था। उन्होंने ही अंजना और मायरा को जतिन के पास विदेश भेज दिया था।

सचिन, नीता की अंजू की मदद का सारा वाकया सुनते रहे। बहुत देर तक वे नीता को दुनियादारी समझाते रहे। नीता सुबक पड़ी उसने कहा कि उसका इरादा नेक था। सचिन उसे फिर प्यार से शांत कराते हुए सहलाते रहे।



8-


सुबह सास जी के मंदिर में घंटी बजने पर नीता के नींद टूटी । आज बहुत देर तक नीता, सचिन के लिपट कर सोती रह गयी थी।

"बचिया....आज सोती ही रहोगी क्या?"

"आयी...आयी मम्मी जी"

"काम वाली को फोन करो, अभी तक काहे नहीं आयी।"

"जी मम्मी जी"

नीता ने फोन किया तो पता चला कि काम वाली को दहशत हो गयी है कि कहीं मिश्रा जी भी उसे ही अंजू की मदद करने वाली न समझे,पोलिस को न पकड़ा दें। इसलिए वह अब अपनी बहन के शहर जा रही, वहीं कोठियों में काम करेगी। लेकिन उसकी नीता दी परेशान न हो इसके लिए उसने एक नई काम वाली को मदद के लिए भेजा है, वो पहुंचती ही होगी।

नीता की सास जी ने काम वाली की बात सुनी तो मुस्कराने लगीं।

" ठीक ही हुआ, बहुत बोलती थी।"











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