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KP Singh

Tragedy Classics Inspirational


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KP Singh

Tragedy Classics Inspirational


माँ

माँ

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आज अचानक अपने अंदर कुछ गोल गोल सा महसूस हुआ, उस पर हाथ लगाते ही अंदर से आवाज़ भी आई हाँ ये तुम ही तो हो, मै पहली बार तुम्हें महसूस कर खुद को बहुत खुश महसूस कर रही थी, गाने गा रही थी, बिना बात के हंसे जा रही थी ओर बोलना तो मानो रुक ही नही रहा। अब तक शायद ही कभी में इतना खुश हुई हूँ, दो दिन बाद ही तुम्हें महसूस ही नही कर पाने पर गहरी चिंता ओर बुरे ख़यालों में डूब गई पर ये सिलसिला यूँही चल रहा था।

अब धीरे धीरे समय के साथ तुम्हारा आकार लेना भी महसूस कर पा रही हूँ हाँ अब मुझे हाथ लगा पता चल रहा था, ये सिर, ये पैर ओर तुम्हारे नन्हे पैरो की लात मुझे इस सबसे पिड़ादायक समय में सुकून देने वाली होती। इस दौर में शरीर हज़ार पीड़ाओं को झेल रहा पर मुझे तकलीफ़ नही बस तुझे अपनी बाँहों में समेटने भर का इंतज़ार था फिर वो दिन भी आया अचानक से दर्द उठा हॉस्पिटल के गए, दर्द सहन से बाहर था पर साथ ही साथ तेरी चिंता भी मन में चल रही थी, दर्द का रह रह कर होना मेरी बेहोशी तोड़ रहा था, दुनिया जहान के दर्द के बाद जब खून से सने अपने खून को देख सारा दर्द मिट सा गया, आँखे मारे ख़ुशी से भर सी गई, मुझे पता था आज ये आँखो से छलका पानी दर्द से नही ख़ुशी से आया हे पर नर्स पता नही क्यू पैरो से पकड़े तुझ नन्ही जान को पीछे मार रही थी पहले पहल तो ग़ुस्सा आया पर आज पहली बार तेरे रोने पर खुश हुई थी, अब कुछ 15-20 मिनट बाद जब तुम्हें मेरे पास ला सुलाया गया ओर जब मेने तुझे अपने सिने से चिपकाया लगा इस से ज़्यादा ना तो भगवान मुझे कुछ दे सकता ओर ना मै कुछ माँग सकती। तेरा रोना, तेरा हँसना, हाथों से खेलना, पैरो को बिस्तर पर मारना , तुझे नहलाना, तुझे धोना बस मेरा सब कुछ यही था, मैं इसी दुनिया में खुश थी, मेरे सारे सपने बस अब तुझ में सिमट से गए अब तू ही मेरा सपना ओर तू ही हक़ीक़त था। तेरे घुटनो के बल वो तेज चलना ओर तुतलाती जबान से ममा सुनना जितना सुकून दे जाता तो पैरो पर खड़े होने की चाह में धम से गिर जाना मेरी जान ही निकाल देता।

धीरे धीरे तेरा बड़ा होना सुहा रहा था पर तेरा यू अब थोड़ा थोड़ा मुझ से दूर होना तेरी फ़िक्र बढ़ा देता फिर जब तुझे पहली बार स्कूल छोड़ा तो रो तू रहा था ओर दिल मेरा दहक रहा था, उस दिन जब तक स्कूल की छुट्टी नही हुई पागलों की तरह थोड़ी थोड़ी देर में घड़ी देखे जा रही थी ओर खुद से ही बड़बड़ा रही थी तुझे भूख लगी होगी, नींद आ रही होगी, पता नही क्या क्या सोचे जा रही थी। कार की पिछली पर बैठे बैठे यादों के धागे बुन रही थी तभी तेरी आवाज़ सुन देखा एयरपोर्ट आ गया तू जाने वाला था।

जब तुने कहा “ममा अपना ध्यान रखना” मेरी आँखो से आंसू छलक पड़े तेरे पापा होते तो ज़रूर बताती उन्हें, तू मेरी कितनी चिंता करता हे, मुझे अब भी तेरे खाने, तबियत ओर रोज़ दूध ना पीने की आदत की चिंता सताए जा रही हे। तेरे जाते हुए हर कदम पर मेरे आंसू बढ़े जा रहे हे ओर चिंता खाए जा रही हे “तेरा कौन ध्यान रखेगा”.............


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