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KP Singh

Romance


3.4  

KP Singh

Romance


मुलाक़ात

मुलाक़ात

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दो दिन हो गए खुद को बहुत खुश महसूस कर रहा हूँ,अंदर से एक अजीब सी ख़ुशी छलक रही हे जैसे कुछ मिल गया हो पर लाईफ़ तो वो ही रूटीन टाईप ही चल रही है ,ऐसा कुछ हुआ भी नही।

ये ख़ुशी का माहौल दो दिन पहले हुई तुम से मुलाक़ात का असर है , मुलाक़ात भले ही सपने में हुई पर छाप गहरी छोड़ गई।अब लगभग मन से सारी तुझ से जुड़ी संवेदनाएँ ओर भावनाएँ बस ख़त्म होने की कगार पर ही थी की यूँ तेरा वापस मिलना मेरे लिए शायद ही ठीक था पर सपने में हुई तुझ से मुलाक़ात ने मुझे उमंग,उत्साह ओर ख़ुशी से सरोबार कर दिया।

सुबह सुबह आए इस सपने में तुम हमारे एक कॉमन फ़्रेंड के साथ थी,जगह पता नही कौन सी थी पर हम दोनो सड़क के किनारे बिछी कुर्सियों पर बैठे थे ओर तुम सामने चहलक़दमी करती हुई हम से बाते कर रही थी,तुम्हारा हँसना,बोलना सब सुन पा रहा था पर सपने से जगने के बाद कुछ याद ही नही,सफ़ेद सलवार सूट ओर हल्के पिंक क़लर के जैकेट पहने तुम लाल रंग की अपनी सर्दी वाली टोपी को बार बार ठीक करती कई बार ज़ोर ज़ोर से हँस रही थी तो कई बार हल्का हल्का मुश्कुरा रही थी,तभी मेरे पास की कुर्सी पर बैठे उस कॉमन दोस्त ने कुर्सी से उठते हुए कहा “आता हूँ दस मिनट में” ओर चला गया,कुर्सी के ख़ाली होते ही पास ही खड़ी तुमको अपने पास कुर्सी पर बैठने को बोला ओर तुम आ मेरे पास बैठ गई,एक दूसरे के हाथ पकड़े पता नही कुछ बाते किए जा रहे थे तभी तुने कहा फ़ोटो लेते हैं दोनो का,तेरे मोबाईल में ही किसी ने अपना फ़ोटो खिचा ओर दूसरा खिचे इस से पहले रोकते हुए बोला अपने बाल ठीक कर लू ओर अपने मोबाइल का केमेरा ऑन कर खुद के बाल ठीक रही कर रहा था तभी तुमने मोबाईल को मेरे हाथ से छीनते हुए कहा “इधर आ मैं सही करती हूँ”, ओर तुम अपनी छोटी छोटी अंगुलिया जो मेरी हमेशा फ़ेवरेट थी, से मेरे बाल संवारने ने लग गई ओर कुछ ही समय में दूसरा फ़ोटो भी हो गया थोड़ी ही देर में कॉमन दोस्त भी आ गया तू मेरे पास से उठ गयी सामने ख़ाली पड़ी सड़क पर टहल रही थी ओर मुझे बैठे बैठे अचानक नींद की एक झपकी आई आँखे खुली तो तुम्हें वहाँ नही पाया,अचानक लगा तुम चली गई,ख़ाली पड़ी सड़क पर देखा तुम नही मिली,तुम्हारा मोबाईल चार्जर ओर ट्रोली बेग ना पाकर,तुम्हारे जाने का डर ओर बढ़ रहा था तभी पास की कुर्सी पर पड़े काग़ज़ को पलट देखा तो पूरे ख़ाली पेज पर बीच में केपीटल लेटर में सुंदर सलीके दार के पी लिखा था ओर पेज के ठेठ नीचे रूटीन तेरी लिखावट में तेरा नाम लिखा था।

काग़ज़ को देख मेरे आँसु छलके जा रहे थे ओर बेकग्राउंड में ट्रेन की सिटी बज रही थी तभी मोबाईल के अलार्म से नींद खुल गई तब से अब तक सपना ही ख़ुशी दिए जा रहा हूँ ओर सोचे जा रहा हूँ काश सपने से वो काग़ज़ ला पाता .....


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