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Sonia Goyal

Abstract Tragedy Fantasy


4.5  

Sonia Goyal

Abstract Tragedy Fantasy


मां

मां

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अवनि दिल्ली में अपनी मां सुनीता जी के साथ रहती थी। जब वो सात साल की थी तो उसके पिता का देहांत हो गया था और तबसे उसकी मां ही उसका सब कुछ थी। सुनीता जी अवनि को एक मां और पिता दोनों का प्यार देती थी।

अपने पति के देहांत के बाद अवनि के उज्जवल भविष्य के लिए उन्होंने एक निजी कंपनी में नौकरी करना शुरू कर दिया था, यहां से उन्हें अच्छी तनख्वाह मिल जाती थी, जिससे दोनों मां-बेटी का गुज़ारा अच्छे से होता था।

अवनि के मम्मी-पापा हमेशा से ही अवनि को एक काबिल वकील बनाना चाहते थे। उनका सपना था कि अवनि की गिनती शहर के नामी वकीलों में हो, इसके लिए सुनीता जी बहुत मेहनत करती थी। उन्होंने अवनि की बारहवीं की पढ़ाई के बाद एलएलबी करवाई और इसके लिए उसे अच्छे इंस्टीट्यूट से कोचिंग भी दिलवाई।

अवनि ये बात अच्छे से जानती थी कि सुनीता जी कितनी मुश्किलों के साथ उसे पढ़ा रही है, इसलिए अवनि भी अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान देती थी। अवनि ने अपनी एलएलबी 90% अंकों के साथ पास की। उसने अपने काॅलेज में टाॅप किया था, जिस कारण सुनीता जी बहुत खुश थी।

इसके बाद अवनि की प्रैक्टिस शुरू हो गई और वो एक नामी वकील से कोर्ट-कचहरी के दांव-पेंच सीखने लगी और इसी के साथ उसने एलएलएम की पढ़ाई शुरू कर दी। सब कुछ बहुत अच्छे से जा रहा था कि एक दिन अचानक ऑफिस में बैठे सुनीता जी के पेट में बहुत तेज़ दर्द हुआ और वो दर्द से बुरी तरह छटपटाने लगी।

ऑफिस वालों ने सुनीता जी को अस्पताल पहुंचा दिया, यहां सुनीता जी के फैमिली डॉक्टर अविनाश जी ने उनकी जांच-पड़ताल की। सारे टेस्ट की रिपोर्ट आने के बाद उनके चेहरे पर गंभीर रेखाएं खींच गई। अवनि अपनी प्रेक्टिस के लिए गई हुई थी, तो उसे इस बारे में कुछ भी पता नहीं था।

सुनीता जी अविनाश जी को अच्छे से जानती थी, इसलिए उन्होंने अविनाश जी से अपने पेट में दर्द का कारण बेझिझक ही पूछ लिया। अविनाश जी उन्हें कुछ बताना तो नहीं चाहते थे, पर वो अच्छे से जानते थे कि सुनीता जी के साथ अब कोई भी नहीं है, सभी रिश्तेदारों ने बहुत पहले ही उनसे मुंह मोड़ लिया था।

इसलिए अविनाश जी उन्हें पूरी बात बता देते हैं, "देखिए सुनीता जी, मैं आपको ये बात बताना तो नहीं चाहता था, पर मुझे पता है कि आपका ध्यान रखने वाला अवनि के अलावा और कोई नहीं है और इसलिए आपको सब पता होना चाहिए, ताकि आप अच्छे से अपना ध्यान रख सकें।"

सुनीता जी घबराकर, "ऐसी क्या बात है डॉक्टर....."

अविनाश जी, "आपको पेट का कैंसर है।"

सुनीता जी ये बात सुनकर एक पल के लिए तो टूट सी जाती है, पर फिर हिम्मत करके डाॅक्टर से पूछती है, "डाॅक्टर मेरे ठीक होने की कितनी उम्मीद है......"

अविनाश जी गंभीर होते हुए, "मैं आपको कोई झूठी उम्मीद नहीं दूंगा। सच ये है कि आपका कैंसर इतना फैल चुका है कि कभी भी कुछ भी हो सकता है।"

ये बात सुनकर सुनीता जी के सामने अवनि का चेहरा घूमने लगता है और वो सोचने लगती है कि मेरे जाने के बाद, मेरी बच्ची का क्या होगा और वो भगवान से प्रार्थना करती है कि हे भगवान! मुझे इतनी उम्र दे दीजिए कि मैं अपनी बच्ची को उस मुकाम पर पहुंचा सकूं, जिसपर मैं उसे पहुंचाना चाहती हूं, उसके बाद चाहे मेरी सांसें छीन लेना।

सुनीता जी अविनाश जी से विनती करती है कि अवनि को इस बारे में कुछ भी पता नहीं चलना चाहिए। पहले तो अविनाश जी मना कर देते हैं, पर उनके बार-बार कहने पर मान जाते हैं, पर फिर भी वो डाॅक्टर का फ़र्ज़ निभाते हुए अवनि को फ़ोन करके बता देते हैं कि सुनीता जी अस्पताल में दाखिल है।

जैसे ही अवनि को ये बात पता चलती है, वो सब कुछ छोड़कर अस्पताल पहुंच जाती है और अपनी मां के कमरे में जाकर उन्हें बेड पर लेटे देखकर रोने लगती है। सुनीता जी उसे वहां देखकर हैरान हो जाती है, पर फिर भी वो अवनि को चुप करवाती है और कहती है, "बेटा मैं बिल्कुल ठीक हूं और तुम्हें कैसे पता चला कि मैं यहां हूं......"

अवनि रोते हुए, "मां आपने तो मुझे एक पल में ही पराया कर दिया और बताना जरूरी नहीं समझा। वो तो अच्छा हुआ कि अविनाश अंकल ने मुझे फ़ोन करके सब कुछ बता दिया।"

अवनि की बात सुनकर एक पल के लिए सुनीता जी को लगा कि उसे सब कुछ पता चल गया है। उन्होंने डरते-डरते उससे पूछा, "क्या बताया है, तुम्हारे अंकल ने तुम्हें......"

इससे पहले कि अवनि कोई जवाब देती, अविनाश जी खुद ही वहां आ गए और कहने लगे, "मैंने बताया है कि तुम्हारी मां की अब उम्र हो गई है तो इनका बाहर का खाना बंद करके, साधारण खाना खिलाया करो, ताकि इनके पेट की बीमारी ठीक हो सके।"

इतना कहकर अविनाश जी और अवनि हंसने लगते हैं। सुनीता जी भी राहत की सांस लेती है कि अवनि को कुछ पता नहीं चला और वो भी मुस्कुरा देती है। कुछ समय बाद सुनीता जी को घर भेज दिया जाता है। अविनाश जी सुनीता जी को अपना खास ख्याल रखने और समय से दवाइयां लेने का कहते हैं और साथ ही समय-समय पर जांच करवाने की सख्त हिदायत देते हैं।

सुनीता जी का इलाज तो शुरू हो जाता है और कुछ समय तक उन्हें राहत भी रहती है, पर कुछ समय बाद उनका दर्द फिर से शुरू हो जाता है। सुनीता जी इस बात की भनक अवनि को नहीं लगने देती और चुपचाप अपना इलाज़ करवाती रहती है।

ऐसे ही समय बीतता जाता है और वो दिन भी आ जाता है, जब अवनि को नामचीन वकीलों में शामिल होने और सम्मान प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है। दोनों मां-बेटी बहुत खुश होती हैं, क्यूंकि अगले दिन अवनि को सम्मानित किया जाना था। खाना खाने के बाद दोनों मां-बेटी अपने-अपने कमरे में चली गई और कुछ समय बाद ही सुनीता जी के पेट में असहनीय दर्द उठने लगा।

उन्होंने तुरंत अविनाश जी को फ़ोन किया तो उन्होंने सुनीता जी को तुरंत अस्पताल में दाखिल होने की सलाह दी, पर सुनीता जी ने ये कहकर मना कर दिया कि कल मेरी बेटी की जिंदगी का बहुत खास दिन है और अगर उसे मेरी इस बीमारी का पता चला तो वो सब कुछ छोड़कर मेरी सेवा में लग जाएगी और मैं अपने इस दर्द के कारण अपनी बेटी की खुशियां नहीं छीन सकती।

अविनाश जी ने उन्हें बहुत समझाया कि अगर उन्होंने अभी खुद को अस्पताल में दाखिल न करवाया तो उनकी जान भी जा सकती है, पर फिर भी सुनीता जी नहीं मानी। अविनाश जी को एक मां के प्यार और ज़िद के आगे झुकना पड़ा और वो रात को अवनि से छुपकर उनके घर आकर सुनीता जी को दर्द से राहत का इंजेक्शन लगा गए।

सुनीता जी ने जैसे-तैसे करके रात गुजारी और सुबह होते ही अवनि के सामने जाने से पहले ही अपने चेहरे के भाव इस तरह बदल लिए, जैसे कुछ हुआ ही ना हो। अवनि फंक्शन में जाने के लिए तैयार हो रही थी और सुनीता जी को भी जल्दी से तैयार होने के लिए कह रही थी।

सुनीता जी को पता था कि अगर वो अवनि के साथ न गई तो अवनि को शक हो जाएगा और वो इस फंक्शन में नहीं जाएगी, इसलिए उन्होंने अपने कमरे में जाकर चुपके से दर्द की दो गोलियां एकसाथ निगल ली और अपने दर्द को छुपाते हुए तैयार होकर अवनि के साथ चली गई।

गुजरते वक्त के साथ सुनीता जी के लिए अपने दर्द को बर्दाश्त करना असहनीय होता जा रहा था, पर अपनी बेटी की खुशी के लिए उन्होंने अपने चेहरे से मुस्कान जाने न दी। कुछ ही पल में वो समय भी आ गया, जिस कारण सुनीता जी ने इतना दर्द सहा था। अवनि को सम्मानित करने के लिए स्टेज पर बुलाया गया।

अवनि अपनी मां के गले लगते हुए स्टेज पर गई और जैसे ही उसे पुरस्कार मिला और उसने मुस्कुरा कर अपनी मां की तरफ़ देखा, तभी सुनीता जी की आंखों के आगे अंधेरा छा गया और वो ज़मीन पर गिर गई। अपनी मां की ऐसी हालत देखकर अवनि सब कुछ वहीं फेंक कर दौड़ती हुई, अपनी मां के पास आई और जल्दी से लोगों को एंबुलेंस बुलाने के लिए कहने लगी।

कुछ देर में एंबुलेंस आ गई और सुनीता जी को अस्पताल ले जाया गया, यहां अविनाश जी ने जल्दी से उनके टेस्ट करवाएं। अवनि का तो रो-रोकर बुरा हाल था, उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर ये सब हो क्या रहा है। तभी अविनाश जी उसके पास आए और उसे एक पत्र पकड़ाते हुए बोले कि ये पत्र तुम्हारी मां ने मुझे तुम्हें देने के लिए दिया था, इसमें तुम्हारे सारे सवालों के जवाब हैं।

पत्र देकर अविनाश जी वहां से चले गए और अवनि वहीं बैठकर वो पत्र पढ़ने लगी, जिसमें लिखा था.......

मेरी प्यारी बेटी अवनि,

तुम ये पत्र पढ़ रही हो, मतलब मेरा इस दुनिया से जाने का समय हो गया है। जानती हूं कि ये लाइन पढ़कर तुम्हें बहुत गुस्सा आया होगा कि मैं ये क्या बोल रही हूं, पर बेटा यहीं सच्चाई है। याद है तुम्हें, जब मेरे पेट में दर्द उठा था और मुझे अस्पताल में भर्ती कराया गया था, तब मुझे पता चला कि मेरे पेट में कैंसर है.....जो इतना फैल चुका है कि अब इसका इलाज संभव नहीं है। एक पल के लिए तो ये बात जानकर मैं बुरी तरह टूट गई थी कि मेरे जाने के बाद तुम्हारा क्या होगा......पर बेटा सच्चाई तो यही है ना कि जो इस दुनिया में आया है, उसे एक न एक दिन जाना ही पड़ेगा। तुम्हारे पापा भी तो हमें छोड़कर गए थे ना और वो कब तक वहां अकेले रहेंगे, उन्हें भी तो किसी की जरूरत है ना तो उन्होंने मुझे भी अपने पास बुला लिया। बेटा मैंने और तेरे पापा ने हमेशा से बस एक ही सपना देखा था कि तुझे नामचीन वकील बना सकें। तेरे पापा तो इस सपने को पूरा होते हुए नहीं देख पाए, पर मुझे खुशी है कि मैंने उनका ये सपना पूरा होते हुए अपनी आंखों से देखा है। अब अगर मौत भी आ जाए, तो भी कोई ग़म नहीं, बस एक वादा कर कि तू बिल्कुल भी उदास नहीं होगी और अपने कर्तव्य को पूरी निष्ठा से पूरा करेगी।

तुम्हारी मां।

पत्र पढ़कर अवनि की आंखों से आंसू आ जाते हैं और वो भागती हुई अविनाश जी के कैबिन में जाती है और उनसे सच्चाई पूछती है तो अविनाश जी अवनि को सब कुछ बता देते हैं कि कैसे कल रात से सुनीता जी दर्द में तड़प रही थी, पर फिर भी उन्होंने अस्पताल आने से मना कर दिया।

सब कुछ जानने के बाद अवनि को अपनी मां पर गर्व के साथ-साथ खुद पर शर्म भी आई कि उसकी मां इतने समय से दर्द में थी, पर वो उनके दर्द का अहसास तक न कर पाई। उसकी मां उसके सामने तिल-तिल कर मर रही थी और वो ये सब देख भी न पाई।

अवनि अभी ये सब सोच ही रही थी कि एक नर्स भागते हुए अविनाश जी के केबिन में आई और कहने लगी, "सर....सर वो पेशेंट.... जल्दी चलिए सर।"

अविनाश जी और अवनि भागते हुए सुनीता जी के कमरे की तरफ गए। अवनि को बाहर ही रूकने का कहकर अविनाश जी और नर्स अंदर गए। बाहर अवनि बैठकर अपनी मां की सलामती के लिए दुआ करने लगी। कुछ समय बाद अविनाश जी बाहर आए तो अवनि ने उनसे सुनीता जी के बारे में पूछा।

अविनाश जी, "एम् साॅरी, पर हम उन्हें बचा नहीं पाए।"

ये सुनकर अवनि धड़ाम से नीचे बैठ गई और जोर-जोर से रोने लगी। अविनाश जी ने उसे संभाला। वो भागती हुई अपनी मां के पास गई और उन्हें उठाने लगी, पर एक बार इस दुनिया से जाने के बाद, लौटकर आना संभव नहीं।

अवनि के चीत्कार की आवाज़ सुनकर अस्पताल में मौजूद हर इंसान का दिल पसीज रहा था। अवनि का दुख समझते हुए भी कोई कुछ नहीं कर पा रहा था और हर कोई यही बोल रहा था कि हे भगवान! कभी भी एक बच्चे को उसकी मां से जुदा मत करना।

समाप्त.......



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