माला के बिखरे मोती (भाग ८५)
माला के बिखरे मोती (भाग ८५)
फ़ोन पर अब भी सभी महिलाओं की माया से बातचीत जारी है। भावना अपनी बात को आगे बढ़ा रही है।
भावना: जब वे ही मेरी कद्र नहीं करते हैं तो मैं घर में किसी और से क्या नाराज़गी रखूं! आपका फ़ोन आने से पहले मेरे दिमाग़ में एक प्लान आया था। जिससे आपके अजय भैया को सबक़ सिखाया जा सकता है।
अब भावना माया को अपना प्लान बता रही है। बाक़ी महिलाएं भी भावना का प्लान बहुत ध्यान से सुन रही हैं और भावना की हाँ में हाँ मिला रही हैं।
ईशा: माया दीदी नमस्ते। मैं ईशा बोल रही हूं। मैं घर की सबसे छोटी बहू होने के नाते आपके सामने भावना भाभीजी से उनका जन्मदिन भूल जाने के लिए माफ़ी माँगती हूं।
माया: ईशा भाभीजी नमस्ते। आप सबने अपनी ग़लती मान ली है। मुझे अच्छा लगा है। अब आप सब भावना भाभीजी के बताए प्लान के मुताबिक़ ही आज अपना काम करेंगी। अच्छा, अब मैं फ़ोन रखती हूं। आज आप लोग एन्जॉय करिए। फिर मुझे भी बताइएगा कि सब कैसा रहा...हाहाहा!
भावना (मुस्कुराते हुए): ठीक है दीदी...नमस्ते।
इस बातचीत के बाद भावना फ़ोन काट रही है। भावना के फ़ोन काट देने के बाद माला सहित सभी महिलाएं भावना को उसके जन्मदिन की बधाई दे रही हैं। जहाँ माला, आरती, छाया और काया ने भावना के गले लगकर माफ़ी माँगते हुए भावना को बधाई दी है, वहीं चाँदनी, देविका और ईशा ने पहले भावना के पैर छूकर माफ़ी माँगी है और फिर भावना के गले लगकर उसको जन्मदिन की बधाई दी है।
छाया: भावना भाभीजी, अब हमें अपने प्लान पर काम शुरू कर देना होगा। हमारे पास ज़्यादा समय नहीं है। हमारे पास आज शाम तक का ही समय है।
काया: हाँ, मैं ऐसा करती हूं कि सबसे पहले सृजन और सृजिता को फ़ोन करके घर बुला लेती हूं। हालांकि, भावना भाभीजी का जन्मदिन भूल जाने के ये दोनों बच्चे भी बराबर के दोषी हैं, लेकिन इन दोनों के बिना हमारा सेलिब्रेशन अधूरा अधूरा सा लगेगा। इसलिए इन दोनों को भावना भाभीजी को माफ़ करना ही होगा।
भावना: हाँ काया दीदी। आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं। मैं बच्चों से क्या ही नाराज़गी रखूँ! जब मेरे जीवन साथी को ही मेरी कद्र नहीं है!
माला: सही बात है। दोनों बच्चों के बिना सेलिब्रेशन करने में मज़ा नहीं आएगा। इन दोनों बच्चों को भी अपने प्लान में शामिल करने से भावना भी अकेलापन महसूस नहीं करेगी। रही बात इन दोनों बच्चों को इनकी ग़लती का अहसास करवाने की...तो आने दो इन दोनों बच्चों को! इनको बहुत अच्छी सी डांट उनकी यह दादी लगाएगी।
काया: ठीक है मम्मी। मैं इन दोनों को फ़ोन करके कॉलेज से बुला लेती हूं।
फिर काया ने बारी बारी से सृजन और सृजिता को फ़ोन किया है और घर आने के लिए बोल दिया है।
देविका: मम्मीजी, मैं इनको ऑफ़िस में फ़ोन करके हमारा प्लान समझा देती हूं। इनसे यह भी कह देती हूं कि अजय भैया के अलावा सभी लोग सीधे "गोल्ड स्टार" रेस्टोरेंट पहुंच जाएं। साथ ही, बनवारी काका से कहकर वहाँ ज़रूरी इंतज़ाम करवा दें।
अब घर की सभी महिलाएं तैयार हो रही हैं। तभी वहाँ शांति आ गई है। शांति ने देखा है कि मम्मीजी सहित सभी भाभियाँ और दोनों दीदियाँ कहीं बाहर जाने के लिए तैयार हो रही हैं। माला ने शांति को देखा है और उसको देखकर माला के मुंह का स्वाद बिगड़ गया है। शांति को इस समय आया देखकर माला को बहुत गुस्सा आया है। वे शांति से गुस्से से बोलीं,
"शांति, तेरा भी कोई निश्चित समय नहीं रह गया है धोने के लिए कपड़े लेने आने का। अब तो तेरा मन जब चाहे, तब अपना मुंह उठाकर आ जाती है। यह भी कोई बात हुई! किसी दिन तो सुबह सुबह ही चली आती है कपड़े लेने के लिए और कभी हमारे नाश्ते के समय आ जाती है। आज तो तूने देर से आने की हद ही कर दी है। हम सबका नाश्ता भी ख़त्म हो चुका है और तू अब आ रही है।"
शांति: माफ़ कर दीजिए मम्मीजी। मुझे थोड़ी सी देर हो गई है आने में। वैसे, आप सभी कहीं बाहर जा रही हैं क्या? या घर में कोई मेहमान आने वाला है? सभी बहुत सज धज रही हैं।
माला (गुस्से से डांटते हुए): हर बात में तेरी टोका टाकी और जासूसी ज़रूरी है क्या? यह ज़रूरी तो नहीं कि तुझे इस घर की हर बात की जानकारी देनी पड़ेगी। तू अपने काम से काम रखा कर।
शांति (मायूस होने का दिखावा करते हुए): मम्मीजी, मैं तो बस ऐसे ही पूछ बैठी थी। मुझे क्या पता था कि आप मुझसे यह छुपा रहे हैं। मैं तो इस घर को अपना मानती हूं। इसलिए पूछ लिया था।
माला: अच्छा ठीक है, ठीक है। ज़्यादा भोली बनने का नाटक बंद कर। हाँ, हम लोग किसी ज़रूरी काम से बाहर जा रहे हैं। शाम तक घर वापस आ जाएंगे। तेरे पापाजी, सभी भैयाजी और बनवारी भी हमारे साथ आएंगे। इसलिए तुझे ही इस घर का ख़्याल रखना है। बाक़ी सेवक भी घर पर ही रहेंगे। तुझे परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। ठीक है?
शांति: ठीक है मम्मीजी। वैसे आपने बताया नहीं कि आप लोग कहाँ जा रहे हैं। कोई पूछेगा, तो मैं उनको क्या बताऊं?
माला: मैंने अभी कहा है न कि हम लोग किसी ज़रूरी काम से जा रहे हैं! तू चिंता मत कर! तुझसे कोई कुछ नहीं पूछेगा।
शांति: ठीक है मम्मीजी।
थोड़ी देर के बाद सृजन और सृजिता कॉलेज से घर आ गए हैं। उन दोनों बच्चों को घर आया देखकर माला, जो पहले से ही शांति से नाराज़ थीं, उनको घूरकर देखने लगी हैं। सृजन और सृजिता समझ गए हैं कि दादीजी बहुत गुस्से में हैं।
माला: बच्चों, अब तुम दोनों बड़े हो गए हो। कब तुम अपनी ज़िम्मेदारी समझना शुरू करोगे?
सृजन: दादीजी, लगता है कि आप बहुत गुस्से में हैं! हम दोनों से कोई ग़लती हो गई है क्या?
माला: आजकल तुम्हारा ध्यान सिर्फ़ ख़ुद पर ही रहता है। इस घर की ओर और अपने माता पिता की ओर भी तुम दोनों की कोई ज़िम्मेदारी है या नहीं?
सृजिता: हाँ दादीजी, हमारी ज़िम्मेदारी इस घर की ओर भी है और अपने माता पिता की ओर भी है। लेकिन आप बताइए तो सही, हमने कौन सी ज़िम्मेदारी नहीं निभाई है?
माला: क्या तुम्हें अहसास है कि अगर तुम्हारी माँ ही इस दुनिया में न आई होती, तो तुम दोनों भी न आए होते?
सृजन: हाँ दादीजी, हमें पता है कि हमारी मम्मा ने ही हमें जन्म दिया है। अगर उनका ही इस दुनिया में जन्म न हुआ होता तो हम भी इस दुनिया में न आ पाते। (क्रमश:)
