माला के बिखरे मोती (भाग ७७)
माला के बिखरे मोती (भाग ७७)
माला: चाँदनी, तो क्या हम इसका मतलब यह लगाएं कि आरती तुमसे जल रही है?
चाँदनी: नहीं मम्मीजी। मैं उस तरह से सोचती तो मैं मान लेती कि आरती भाभीजी मुझसे जलकर ऐसा व्यवहार कर रही हैं। लेकिन आज की पीढ़ी की औरत होने के नाते मैं उनकी मनोदशा समझ पा रही हूं। शायद वे भी अपने दम पर कुछ करना चाहती हैं।
माला: अपने दम पर कुछ करने से क्या मतलब है? इतने बड़े घर की सबसे बड़ी बहू होने की ज़िम्मेदारी निभाना ही आसान नहीं था आरती के लिए। हम सब लोग इस बात की कद्र भी करते हैं। इसके अलावा छोटी सी उम्र से ही चार देवरों और तीन ननदों से रिश्ते निभाना आसान नहीं था। फिर घर में आईं चार देवरानियों से रिश्ता निभाकर चलना, यह उपलब्धि भी आरती के खाते में ही जाती है। इसके बाद भी, अपने दम पर कुछ करने की आरती की नई सनक मुझे समझ नहीं आ रही है।
ईशा: मम्मीजी, ये सब रिश्ते निभाते हुए घर की मर्यादा का पालन शायद हिंदुस्तान की हर औरत करती है। लेकिन अगर इसके बाद एक औरत अपने वजूद को तलाशने की कोशिश करती है, तो उसको सनक का नाम देना, मेरे हिसाब से तो सही नहीं है।
भावना: तुम बिल्कुल ठीक कह रही हो ईशा। ख़ैर, अब हमें यह तो पता चल ही गया है कि आरती भाभीजी कुछ करना चाहती हैं। जिससे उनकी एक अलग पहचान बने और वे पैसे भी कमा सकें।
देविका: लेकिन भावना भाभीजी, इस उम्र में आरती भाभीजी घर से बाहर जाकर नौकरी तो कर नहीं सकती हैं। वैसे भी, जब उनकी शादी हुई थी, उस समय वे बीए ही कर पाई थीं। आजकल बीए पास को नौकरी कौन देता है।
चाँदनी: देविका, इन सब पहलुओं पर सोच विचार की ज़रूरत है। एकदम से तो कोई उपाय सूझ नहीं सकता है। रात को डिनर के समय घर के सभी लोग एक साथ होंगे। तब इस बारे में बात करेंगे।
चाँदनी की इस बात पर सभी महिलाओं ने सहमति जताई है।
अब रात हो चली है। सब पुरुषों के ऑफ़िस से घर आने का समय हो गया है। लिहाज़ा, उनका इंतजार हो रहा है और रसोई में डिनर भी तैयार हो रहा है।
कुछ समय के इंतज़ार के बाद खाना भी तैयार हो गया है और सभी पुरुष सदस्य ऑफ़िस से वापस आ गए हैं। फिर ये सभी पुरुष फ़्रेश होकर डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गए हैं। घर की महिलाएं और बच्चे भी डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गए हैं। खाना सबकी प्लेटों में परोसा जा रहा है। उसके बाद सबने डिनर खाना शुरू कर दिया है।
दो तीन निवाले खाने के बाद यश वर्धन आरती की ओर देखकर बोले,
"आरती बहू, आशा करता हूं कि अब तुम्हारी तबियत अच्छी होगी। तुम अपने खाने पीने का ध्यान रखा करो और किसी बात की चिंता मत किया करो।"
आरती: जी पापाजी। अब मेरी तबियत बेहतर है। मैं पूरी कोशिश करूंगी कि अपने खाने पीने का ध्यान रखूं और किसी बात की चिंता न करूं।
जय (आरती का मज़ाक उड़ाते हुए): पापा, आजकल आरती को भी अपने नाम का झंडा बुलंद करने की सनक सवार हो गई है...हाहाहा!
यश (जय की ओर घूरकर देखते हुए): जय, यह मज़ाक का विषय नहीं है। इस विषय को और आरती बहू की मनोदशा को गंभीरता से समझने की ज़रूरत है। तुम तो बहुत समझदार हो। इसलिए तुमसे थोड़ी सी समझदारी की उम्मीद तो की जा सकती है न।
देविका (झिझकते हुए): पापाजी, अगर आप बुरा न मानें, तो मैं कुछ बोलना चाहती हूं।
यश: हाँ... हाँ बोलो देविका बहू। तुम क्या कहना चाहती हो? बेझिझक बोलो।
देविका: आज हम सब महिलाओं ने दोपहर में अपने तरीक़े से यह पता लगाने की कोशिश की थी कि आरती भाभीजी के दुख का कारण क्या है। हम सबको यह जानने में सफलता भी मिली है। आरती भाभीजी को यह महसूस होने लगा है कि इनको भी अपने दम पर कुछ काम करना चाहिए।
यश: देविका बहू, इस बारे में सुबह नाश्ते के समय हम सभी पुरुषों की कुछ बात भी हुई थी। इसलिए मुझे इसी बात का अंदाज़ा था।
जय: चलिए, अब हम सबको यह तो समझ आ गया है कि आरती को कुछ काम करना है। लेकिन, सबसे बड़ी बात यह है कि खाना बनाने के अलावा आरती को तो कुछ आता जाता ही नहीं है। यह क्या काम कर पाएगी? यह न तो कोई नौकरी ही कर सकती है और न ही कोई व्यवसाय। इस उम्र में इसको नौकरी भी कौन देगा?
ईशा: जय भैया, अभी अभी आपने क्या बोला है? ज़रा फिर से बोलिए न?
जय: मैंने बोला...इस उम्र में इसको नौकरी भी कौन देगा।
ईशा: नहीं नहीं, उससे पहले?
जय: उससे पहले मैने बोला...यह न तो कोई नौकरी ही कर सकती है और न ही कोई व्यवसाय।
ईशा: नहीं, इससे पहले क्या बोला था आपने? ज़रा सोचकर बताइए।
जय (ध्यान से सोचकर): इससे पहले मैंने बोला था...खाना बनाने के अलावा आरती को तो कुछ आता जाता ही नहीं है। यह क्या काम कर पाएगी...शायद यही बोला था मैने।
ईशा: हाँ जय भैया। आपने यही बोला था। मैं यही सुनना चाहती थी। यानि आप यह तो मानते हैं कि आरती भाभीजी को खाना बनाना बहुत अच्छी तरह से आता है?
जय: हाँ, आरती को खाना बनाना तो बहुत अच्छा आता है। हालांकि भोज काका के रहते हुए इसको खाना बनाने का ज़्यादा अवसर नहीं मिलता है। लेकिन इसने जब भी कुछ बनाया है, सबने उंगलियाँ चाट चाटकर खाया है। सबने बहुत तारीफ़ की है।
ईशा: तो क्यों नहीं आरती भाभीजी अपने इसी टैलेंट का इस्तेमाल करके अपना काम शुरू करें और नाम कमाएं?
अजय: लेकिन ईशा, अच्छा खाना बनाना भी कोई टैलेंट है क्या? अब क्या इतने अमीर घर की बहू खाना बनाकर पैसे कमाएगी? अब क्या आरती भाभीजी होटलों और रेस्टोरेंट्स में बावर्ची की नौकरी करेंगी?
ईशा: सॉरी तो से अजय भैया। लेकिन आप किस दुनिया में जी रहे हैं? अब दुनिया कितनी आगे बढ़ गई है।
धनंजय (गुस्से से): ईशा, यह तुम किस तरह से बात कर रही हो अजय भैया से?
ईशा: माफ़ कीजिएगा अजय भैया। लेकिन अच्छा खाना बनाना भी एक टैलेंट होता है। खाना बनाकर भी पैसे कमाए जा सकते हैं, वह भी पूरी इज़्ज़त के साथ। इसके अलावा नाम और शोहरत भी कमाए जा सकते हैं। इसके लिए किसी होटल या रेस्टोरेंट में बावर्ची की नौकरी करने की भी ज़रूरत नहीं है। (क्रमशः)
