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Amit Singhal "Aseemit"

Abstract Drama

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Amit Singhal "Aseemit"

Abstract Drama

माला के बिखरे मोती (भाग ६९)

माला के बिखरे मोती (भाग ६९)

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      चाँदनी की यह बात सुनकर माला ने रोना शुरू कर दिया है। माला रोते हुए चाँदनी से बोलीं,


     "चाँदनी, तुम कौन होती हो, इस घर को दो हिस्सों में बाँटने वाली? यह घर तुम्हारे पापाजी और मैंने बनाया था। हमारा हमेशा से सपना रहा है, बल्कि मैं तो कहूंगी कि हमारा पूरा प्रयास रहा है कि यह घर एक रहे। अब तक ऐसा रहा भी है। तुम्हारी एक बेकार की ज़िद की वजह से इस घर का बँटवारा मत करो।"


चाँदनी: मम्मीजी, मैंने इस घर में कोई लक़ीर नहीं खींच दी है। यह विचारों की लड़ाई है। जिसके विचार जिससे मिलते हों, वह उस तरफ़ हो जाए।


ईशा: सही बात है चाँदनी भाभीजी। कोई किसी का दास थोड़े ही है। जिसकी समझ जिससे मिले, वह उसके साथ हो जाए।


     यह बहस अभी चल ही रही है, तभी माला के फ़ोन पर माया का फ़ोन आया है। माला फ़ोन की स्क्रीन पर "माया कॉलिंग" देखकर सबसे बोलीं,


    "देखो, माया का फ़ोन आया है। अपनी यह बहस अभी बंद करो। बहुत दिनों के बाद उसका फ़ोन आया है।"


     यह कहते हुए माला माया की कॉल उठा रही हैं। नक़ली मुस्कान के साथ माला बोलीं,


     "हेलो, माया बेटा।"


माया: मम्मी प्रणाम। आप कैसी हैं?


माला: प्रणाम माया बेटा। मैं ठीक हूं। तुम कैसी हो? बहुत दिनों के बाद याद आई अपनी मम्मी की!


माया: मैं ठीक हूं मम्मी। आपकी याद तो हमेशा मेरे मन में रहती है। पापा कैसे हैं? सभी भैया और भाभियों के क्या हाल हैं? मेरे यहाँ आने के बाद तो जैसे आप सब मुझे भूल ही गए हैं।


माला: नहीं बेटा। ऐसी बात नहीं है। प्रशांत और बच्चे कैसे हैं? हमारे समधी और समधन कैसे हैं? प्रणय बेटा कैसा है? और हाँ, हमारी प्राची बिटिया कैसी है? वह अपनी ससुराल में खुश तो है न?


माया (खुशी से चहकते हुए): अरे मम्मी, इतने सारे सवाल एक साथ...!! अच्छा, मैं आपके सभी सवालों का जवाब देती हूं। आपके दामाद और बच्चे बिल्कुल ठीक हैं। यहाँ पापाजी और मम्मीजी भी बिल्कुल ठीक हैं। प्रणय भैया भी बढ़िया हैं। प्राची दीदी भी अपनी ससुराल में बहुत खुश हैं। अब आप बताइए, सभी भाइयों और भाभियों के क्या हाल चाल हैं? सब बच्चे कैसे हैं?


माला: हाँ बेटा, तुम्हारे सभी भाई और सब बच्चे मज़े में हैं।


माया: और भाभियाँ? उनके बारे में आपने नहीं बताया? क्या हुआ मम्मी? सभी भाभियाँ ठीक तो हैं न? क्या कोई भाभी बीमार हैं?


     माया की यह बात सुनकर माला ने अपना फ़ोन स्पीकर पर कर दिया है। माला की आँखें नम हो गई हैं। फिर भी वे ख़ुद को सँभालते हुए बोलीं,


     "हाँ बेटा, तुम्हारी भाभियाँ भी ठीक हैं।"


माया: मम्मी, आप रो क्यों रही हैं? आपकी आवाज़ से साफ़ पता लग रहा है कि आप रो रही हैं। बताइए न, क्या बात है? अब मुझे घबराहट होने लगी है। किसी भाभी को कुछ हुआ है क्या? 


     इससे पहले कि माला माया की बात का कुछ जवाब देतीं, आरती ने बात को सँभालते हुए माया से कहा,


     "माया दीदी नमस्ते। मैं आरती बोल रही हूं। आप कैसी हैं?"


माया: आरती भाभीजी, नमस्ते। मैं ठीक हूं। आप कैसी हैं? मम्मी ने अचानक रोना क्यों शुरू कर दिया? क्या हुआ?


आरती: मैं ठीक हूं। मम्मीजी ठीक हैं। सब ठीक है। कुछ नहीं हुआ दीदी। मम्मीजी को शायद आपकी याद आ रही होगी। बस इसीलिए...


     तभी काया आरती की बात को काटते हुए ज़ोर से बोली,


     "माया दीदी, यहाँ भाभियों में कुछ अनबन हो गई है।"


माया: काया, तू कैसी है बहन? भाभियों में अनबन क्यों हो गई है? किस किस भाभी की अनबन हो गई है? मम्मी और तुम दोनों बहनों ने अनबन को सुलझाया क्यों नहीं?


     अब काया ने माला का फ़ोन हाथ में ले लिया है और स्पीकर से हटा दिया है। अब काया डाइनिंग टेबल से उठकर माया से अलग में जाकर धीमी आवाज़ में बात कर रही है। काया ने माया को सब बता दिया है, जो कुछ भी पिछले कुछ दिनों से घर में हो रहा है। सारी बात सुनकर माया को काफ़ी बुरा लगा है। काया ने फ़ोन को फिर से स्पीकर पर कर दिया है। उसने फ़ोन को डाइनिंग टेबल के बीचों बीच रख दिया है। डाइनिंग टेबल पर घर के सभी सदस्य पहले से ही मौजूद हैं। माया ने फ़ोन पर रोना शुरू कर दिया है और वह कुछ बोल रही है। सभी लोग माया को सुन रहे हैं।


माया (रोते हुए): घर में इतना सब घट गया है और मुझे किसी ने बताना ज़रूरी नहीं समझा! अगर चाँदनी भाभीजी और ईशा भाभीजी एकेडमी खोल रही हैं, तो इसमें कुछ बुरा तो नहीं है। लेकिन इस बात के लिए घर का दो हिस्सों में बँटवारा हो जाना, यह अच्छी बात नहीं है। पापा, आप अब तक ख़ामोश क्यों हैं? आप यह सब क्यों होने दे रहे हैं?


     बहुत देर से जो यश वर्धन ख़ामोश बैठे थे और नाश्ते की टेबल पर सब महिलाओं की बहस सुन रहे थे, वे अपनी सबसे लाडली बेटी माया की पुकार से इमोशनल हो गए हैं। यश वर्धन की आँखें नम हो गई हैं। फिर भी वे ख़ुद को सँभालते हुए माया से स्पीकर पर ही बात करने लगे हैं।


यश: माया, कैसी है मेरी बिटिया? 


माया: पापा नमस्ते। आप कैसे हैं? अब आप भी रो रहे हैं न? मैंने आपकी आवाज़ से पहचान लिया है।


यश (भर्राया हुआ गला साफ़ करते हुए): नहीं नहीं बिटिया। मैं नाश्ता कर रहा हूं। इसलिए गले से ऐसी आवाज़ निकल रही होगी शायद।


माला: चलिए छोड़िए पापा। लेकिन आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया है? काया ने मुझे सब कुछ बता दिया है। आपने यह सब होने कैसे दिया?


यश: बेटा, मैंने तो सिर्फ़ एकेडमी खोलने की अनुमति दी थी। वह भी सबसे सलाह लेने के बाद। लेकिन मैंने तब यह नहीं सोचा था कि इसका परिणाम यह आएगा।


माया: लेकिन इसका यह परिणाम तो नहीं आना चाहिए था। आपके इस फ़ैसले में भी पूरे परिवार को साथ देना चाहिए था।


यश: उम्मीद तो मुझे भी यही थी माया। लेकिन अब जो भी है, एकेडमी तो खुलेगी। मैं अपने फ़ैसले से पीछे नहीं हटूंगा। एकेडमी का उद्घाटन मैं ख़ुद अपने हाथों से करने जाऊंगा। हमारा पूरा परिवार उस समारोह में पूरे मन से शामिल होगा। फिर आगे चाहे जो भी हो। (क्रमशः)


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