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Arun Tripathi

Tragedy Crime

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Arun Tripathi

Tragedy Crime

कोटे का गेहूँ

कोटे का गेहूँ

6 mins
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उन दिनों प्रचंड गरमी पड़ रही थी। वैशाख का महीना। लू के थपेड़े बाहर भी निकलने नहीं दे रहे थे। फसल के नाम पर सिवान में गन्ना ही दिख रहा था और उन दिनों गन्ने की सूखती फसल को बचाने के लिये ..किसान जी जान लगाये थे ... हर तरफ डीजल इंजनों की गूँज और अवैध बिजली के मोटरों की सूं ..सूं की आवाज सुनाई पड़ रही थी। मैं अपना गन्ने का खेत देख रहा था। ... फसल पानी माँग रही थी। सिंचाई के लिये मुझे एक लेबर चाहिये था सो उसी की तलाश में मैं गाँव में घूमने लगा।

आज से दस साल पहले तक गाँव में मजदूरों की कमी नहीं थी लेकिन समय बदला और गांवों से पलायन शुरू हुआ ...खेती अलाभकारी सिद्ध हो रही थी। न जीने देती थी.. न मरने देती थी।

मेरे गाँव में अब बूढ़े...स्त्रियाँ और छोटे बच्चे ही दिखते थे या वे लोग जो किसी कारण बाहर नहीं निकल सकते थे और इन्हीं बचे खुचे लोगों के बल

पर अभिजात्य वर्ग की खेती निर्भर थी ...इन लोगों को अपनी तरफ खींचने के लिये ..इस वर्ग के लोग साम , दाम , दंड , भेद। ..हर प्रकार की नीति अपनाते

थे।

मैं एक असम्भव से दिखते काम के लिये. ..गाँव में मजदूर की तलाश में घूम रहा था. ..तभी मुझे राम अवतार दिखा और मैंने मुसकुरा कर उसका हाल चाल पूछा तो वो सशंकित होकर मुझे देखने लगा। उसकी माँ भी पास ही खड़ी थी।

मैंने कहा.. ..का हाल है अवतारे

ठीक है बाबू. ..वो बोला।

तभी उसकी माँ उससे बोली. ..जउन बना है...खाय काहे नाही लेत ?

वो बोला....का खाय लेई ?

मैंने पूछा ...का बात है अवतारे ! खाना काहे नहीं खाते ?

का बताई बाबू.. ..गेहूँ है नाही ..बिना रोटी के खाय

नहीं जात...ई रोज रोज मछली खात खात हमार जी ऊब गया.. ...वो बोला।

कोटा से गेहूँ नहीं मिला ?...मैंने पूछा ?

नहीं बाबू...वो बोला।

काहे ?....मैंने पूछा।

सब परधान अउर कोटेदार जानें...काहे नहीं मिला ?

वो वितृष्णा भरे स्वर से बोला।

अच्छा ..चलो। हम तुम्हें गेहूँ देत हैं....मैं बोला।

मैं उसे साथ लेकर घर पहुँचा और अंदाजन उसे तीस किलो गेहूँ दिया। उस समय तीस किलो गेहूँ का बाजार मूल्य लगभग पाँच सौ रुपये था। उसे गेहूँ देकर मैं बोला...अवतारे ! एक छोटा सा काम है।

वो प्रश्नसूचक आँखों से मुझे देखने लगा तो मैंने कहा...हमार गन्ना सिंचवाय दो।

वो सहर्ष तैयार हुआ और अगले दिन खेत सींचा गया...

उस समय मजदूरी दो सौ रुपये प्रतिदिन थी और मैंने उसे पाँच सौ का गेहूँ दिया था....तीन सौ अभी भी बाकी ही थे लेकिन ये तीन सौ मुझे कभी वापस नहीं मिले। न मैंने उससे माँगा और न उसने दिया और न ही फिर मजदूरी के लिये वो मिला। एक बार मिला भी तो पूरी मजदूरी नकद ली।


अभी तीन महीने पहले की बात है...रात के बारह बज रहे थे। बिजली की कटौती चल रही थी। रात में अक्सर बिजली नहीं रहती थी। न ही उसके आने जाने का कोई शेड्यूल ही था। मैं बरामदे में मच्छरदानी लगाये लेटा था ...हवा चल नहीं रही थी ...पूरा शरीर पसीने से चिपचिपा रहा था और मैं बेचैनी से करवट बदल रहा था।

उसी समय बगल की किराने की दुकान पर कोई गाड़ी रुकी। कुछ देर बाद मुझे लगा कि गाड़ी से कुछ उतारा जा रहा है और कुछ खुसुर फुसुर की आवाज आ रही है।

मैं चारपाई से उठा और पेशाब करने के इरादे से सड़क के किनारे खड़ा हो गया ...

मैं पीछे घूमा और बिजली आ गई। सामने वाले पड़ोसी के घर के पूर्वी किनारे पर लगी हैलोजन चमक उठी और जो भी बल्ब ऑन थे। वे एक साथ जल उठे और माहौल तेज रौशनी से नहा गया। उस रोशनी में मैंने देखा। गाँव का कोटेदार ..किराना व्यापारी से नोटों की गड्डी ले रहा था। मैं थोड़ा अँधेरे में था सो उन्हें तो मैं साफ साफ देख सकता था..... किन्तु वे मुझे नहीं देख सकते थे .....

मैंने साफ देखा....दो मजदूर पिकअप से बोरे उतार रहे थे और बोरों पर स्पष्ट लिखा था ...भारतीय खाद्य निगम। स्पष्टतः वो कोटे का अनाज था। वो इस तरह बिक रहा था और मुझे अनायास ही.......राम अवतार की याद आ गई।

मैंने अपना स्मार्टफोन निकाला और आधे घंटे तक वीडियोग्राफी करता रहा। सरकारी बोरा, गाड़ी, मजदूर, कोटेदार, नोटों की गड्डी, खरीदने वाला बनिया और कुछ खुसुर फुसुर भी बखूबी रिकार्ड हुई।

रात के तीन बज रहे थे और मैं अपनी बनाई फिल्म देख रहा था....सुबह होने से पहले मैंने ये वीडियो मुख्यमंत्री....कृषि मंत्री और पंचायती राज विभाग के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर पोस्ट कर दिया और फसबुक पर डाल दिया।

चौबीस घंटे के अंदर हाहाकार मच गया। मेरा फोन घनघनाया और मेरी छठी इन्द्रिय खतरे का संकेत देने लगी। मैं भूमिगत हो गया और मेरा फोन हमेशा के लिये स्विच ऑफ हो गया ....

पता लगा....पंद्रह दिन बाद जिले की टीम आयी और कोटा निरस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन हाय रे हिन्दुस्तान की विधि व्यवस्था ! इतने अकाट्य और स्वप्रमाणित साक्ष्यों के बावजूद मामले की जाँच हुई और मामला टॉय टॉय फिस्स हो गया।

और मैं काठ का उल्लू ...बिना मतलब लोगों की नजरों का केंद्रबिंदु बन गया।

मैं दो महीने से दिल्ली में पड़ा मामला शांत होने की प्रतीक्षा कर रहा था।

मेरे इतना डरने की वजह ये थी कि तीन साल पहले इसी तरह मेरे ही जैसे एक सज्जन ने मुझसे दो कदम आगे बढ़ कर यही हिमाकत की थी और डी एम से लेकर मुख्यमंत्री तक से मिल आये थे। कोटेदार और प्रधान का तो कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन कुछ दिन बाद एक रोड एक्सीडेंट में वे व्हिसिल ब्लोवर सज्जन मारे गए। सब को पता था कि ये एक्सीडेंट संयोग नहीं था लेकिन कौन अपनी जुबान खोलता ?

खैर.. ..मामला ठंडा हुआ....मैं घर लौटा और........ जानबूझकर अगले ही दिन कोटेदार के घर पहुँचा।

उन्होंने पूरी कूटनीति का परिचय देते हुए मेरा स्वागत किया। मैं हर मामले से अनभिज्ञ बना उनका हालचाल लेता रहा।

और उन्होंने पूछा ...कैसे आये पंडित...आज हमरे दुआरे पर ?

मैंने कहा...काका ! हम आपसे यही कहने आये थे कि क्या आप अपने अर्जुन की शादी करना चाहते हैं

हम उनके लिये रिश्ता लेकर आये हैं। ..

उन्होंने कहा...हाँ...काहे नहीं...शादी लायक हो गए हैं अर्जुन.. ..बियाह तो करना ही है।

मैंने कहा....काका...दो महीने पहले हम अपने फूफा जी के पास दिल्ली चले गये थे....बुआ की तबीयत बहुत खराब थी। घर से निकल कर हम स्टेशन पर पहुँचे तो पता लगा। हमारा मोबाइल कहीं गिर गया। सारा नंबरे गायब हो गया। फिर दूसरा मोबाइल खरीदे। एक सप्ताह पहले हमारे नाहरगंज वाले दूर के रिश्तेदार.. ..जो हमारे फूफा जी के रिश्तेदार हैं....दिल्ली में हमसे मिले और अपनी लड़की की शादी की बात कहे.....

काका..हमको तुरंत अर्जुन याद आ गये। आप का नंबर हमारे पास था नहीं। नहीं तो हम आप से सीधे बात करवा देते। अब बताओ आप ?

वे बोले...पंडित आप सब जनतै हो। ये बताओ लड़की का करती है ?

मैं बोला....मास्टराइन है काका ! उहो सरकारी स्कूल की ..!!

वे बोले ...वाह ! तब तो हम फ्री में शादी कर लेंगे।

बाराती वाराती का स्वागत ठीक से कर दें.. .बस।

मैं बोला....काका...अपना नंबर दे दो। हम बात करके आप को बताते हैं।

और फिर उन्होंने एक बार और चाय मंगाई। इस बार चाय के साथ ...नमकीन, समोसा, मिठाई और फल भी था।

मैं निश्चिंत था..चलो....जान बची तो लाखों पाये। अब चाहे कोटेदार कोटे का गेहूँ बेचे या चावल। परधान सारा बजट चाहे खुद ही हजम कर जाये ..अब हम न कभी वीडियो बनायेंगे और न ही कोई शिकायत करेंगे।



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