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Savita Gupta

Abstract


4.3  

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कोरोना काल

कोरोना काल

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फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी। सुबह सुबह कौन फ़ोन कर रहा है ?नवीन झल्लाते हुए;उन्नींदीं आँखों सेफ़ोन उठाया देखा -हरी जी का फ़ोन था। हरी जी ,का था उठाना ज़रूरी था ,सेवा भारती के अध्यक्ष शहर केबहुत बड़े समाजसेवी। सुप्रभात ! सर, नवीन ने कहा। सुप्रभात जी ,बन्धु सुबह सुबह मैंने तकलीफ़ दी आपको,क्या आठ बजे आप मेरे साथ चल सकते हैं ‘?कुछ काम है।जी जी बिलकुल सर जी मैंने हामी भरी..ठीक है,फिर मिलते हैं उन्होंने कहा और फ़ोन रख दिया।

नहाने से पहले श्रीमती जी के काम में हाथ बटाया लॉक डाउन के वजह से काम वाली नहीं आ रही थी तोहम सब बच्चे मिल-जुलकर घर के साफ़ सफ़ाई में योगदान देते हैं।श्रीमती  जी ने कहा देखो “जो बच्चे एकग्लास पानी खुद से लेकर नहीं पीते थे “ये कोरोना काल में कितने समझदार हो गए हैं ‘यह मूआ कोरोनाबहुत कुछ सीखा कर जाएगा ,सब को। हाँ !सो तो है मैंने भी हामी भरी ‘बच्चों के बहाने श्रीमती जी मुझे भीलपेट रही थी,मैं सब समझ रहा था।

मैं बाहर जाने से पहले मास्क ,दस्ताने पहन और पॉकेट में सैनिटाइजर की एक शीशी रख लिया।हरी जी,के साथ हम दोनों एक राशन के दुकान में बैठकर चावल ,दाल ,नमक आदि पैक करवा रहे थे। थोड़ी देर बाददुकानदार ने कहा -सर जी एक बात कहना चाहता हूँ।हाँ बोलो-सर जी ,’देख परख कर ज़रूरत मंदों को हीराशन दें। ’कल मेरे दुकान पर एक मज़दूर जैसा व्यक्ति तीन थैले लेकर आया जिसे किसी संस्था ने उसे दियाथा ;जिसमें कुछ अनाज ,नमक आदि थे मुझे पकड़ाते हुए बोला-बाबू, ‘ये ले लो इसके बदले पैसे दे दो।’मैंआवाक हो गया ,फिर उसे समझाया अरे ‘ये ख़राब होने वाली चीज़ें नहीं हैं ,महीने दो महीने खाते रहना। ’

बुदबुदाते हुए बोला -‘कच्चा तो खा नहीं सकते ‘। इस बंदी में “जलावन कहाँ से लाए “कैसे पकाए, कैसे खाएँ। ”


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