Sanjay Aswal

Abstract


4.6  

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किस्मत का फेर

किस्मत का फेर

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मां के मरने के बाद रोहन को कोई रोकने टोकने वाला नहीं था पिता हमेशा समझाते पर रोहन को समझ नहीं आता वो दिन प्रति दिन बिगड़ता जा रहा था नशा करना भी उसकी आदतों में शामिल हो गया,

वो हमेशा यहां वहां घूमता रहता था,अक्सर स्कूल से भाग कर पिक्चर देखना, आवारा दोस्तो के साथ घूमना मानों उसका शौक बन गया था, रोहन के पिता बहुत कर्तव्य निष्ठ,ईमानदार व्यक्तित्व के सज्जन पुरुष थे वे दून अस्पताल में फार्मासिस्ट के पद पर कार्यरत थे और समाज में उनकी बहुत इज्जत थी वे अक्सर अपने पुत्र रोहन को समझाते कि समाज में नाम कमाने के लिए अच्छे काम करने होते हैं वो रोहन को अच्छी अच्छी बातें बताते पर रोहन उनकी बातों को अनसुना कर देता, पिता को भी अब रोहन से कोई उमीद नहीं थी वो हाथ से निकल गया था।

पिता जितना होता उसे प्यार देते पर समय कम ही दे पाते,शायद यही कारण वो भटक गया, और उसकी गलत आदतों के कारण स्कूल ने भी उसे निकाल दिया, पिता ने रोहन के लिए फास्ट फूड की दुकान भी खोली मगर रोहन का दिल काम में नहीं लगता वह दिन भर नशा करता, इसी कारण दुकान में घाटा होने के कारण दुकान भी बंद करनी पड़ी अब वह कई कई दिन घर से गायब रहने लगा, पिता भी परेशान रहते मगर उस पिता की जरा भी चिंता नहीं रहती वो खुद में ही मस्त रहता,दिन इसी तरह गुजरने लगे और फिर किस्मत का फेर हुआ, रोहन के पड़ोस में रहने वाली नेहा जिसका पति सेना में जवान था।

कारगिल के युद्ध में शहीद हो गया, नेहा को विधवा पेंशन और सरकार की तरफ से पेट्रोल पंप भी मिल गया, रोहन के पिता ने नेहा के पिता से बात कर रोहन से नेहा की शादी के लिए मना लिया ताकि नेहा का घर फिर से बस जाए और शायद शादी होने से रोहन भी सुधार जाए, नेहा से शादी के बाद रोहन की जिंदगी हिलोरे मारने लगी नेहा बहुत सुंदर सुशील और नेक दिल लड़की थी उसने रोहन को भरपूर प्यार दिया उन दोनों की जीवन की गाड़ी धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी,शादी के कुछ वर्षों के अंदर ही रोहन कि जिंदगी पटरी पर आ गई, पैसे की कोई कमी नहीं थी पर आलसी और निक्कमा पन रोहन को कहां छोड़ने वाला था उसके पुराने संगी साथी फिर उसे बुलाने लगे और फिर वही पुराना रोग रोहन को लग गया या ये कहे कि बुरी लत को कब तक रोकता उसे तो एक दिन फिर शुरू होना था उसके ऐब बढ़ने लगे, वो शराब पीने लगा नेहा को भी मारता पीटता ,पैसों की बरबादी करता, नेहा के लाख समझाने पर भी वो नहीं सुनता,इसी तरह शादी के दो साल गुजर गए और इस बीच उसके दो बच्चे भी हों गए पर रोहन को बच्चों से कोई लगाव नहीं था। जिस व्यक्ति को सुधारना नहीं उसे कौन बचा सकता है। उसका ध्यान सिर्फ शराब,दोस्तों में बीतता, घर की कोई चिंता नहीं बस पैसा और शराब ये दोनों उसके अपने थे बाकी नेहा और बच्चों से कोई लेना देना नहीं था। कहते हैं बिना मेहनत का मिला पैसा व्यक्ति का दिमाग भी फिर देता है,रोहन का भी दिमाग इस पैसे ने फिर दिया,

पेट्रोल पम्प में वो ज्यादा पैसों के लिए गड़बड़ियां करने लगा और उसी का नतीजा ये रहा कि सरकार ने उसका पेट्रोल पम्प सील कर दिया,अपनी इस नाकामी से रोहन को बड़ा सदमा लगा और हर्ट अटैक से उसकी मृत्यु हो गई, रोहन के कर्ज को चुकाने के लिए नेहा को अपना घर बेचना पड़ा, सब कुछ लूटने के बाद नेहा अपने दो बच्चों के साथ आज किराए के मकान में विधवा पेंशन के सहारे गुजर बसर कर रही है, रोहन की किस्मत का फेर ऐसा रहा ना नेहा की दूसरी शादी सफल रही ना रोहन को किस्मत में मिला पैसा फबा, बच्चों को जीते जी अनाथ कर गया, बुरी आदतों के कारण उसने खुद का बल्कि नेहा और बच्चों की जिंदगी को किस्मत के फेर में फँसा दिया।


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