खजाना
खजाना
समय अपनी तंग हाली से परेशान था। ऐसा नही था का उसे खाने के लाले पड़ रहे थे लेकिन बस खाने जितने ही वह कमा पाता था। उससे काफी मायूस रहता, अपनी किस्मत को कोस्ता रहता और हमेशा कहीं से ज्यादा पैसा आ जाए उसके लिए कोशिश करता। लेकिन कभी कुछ हाथ लगता नही था।
लेकिन एक दिन पडो़स के एक गांव से कुछ व्यापारी आये हुए थे। वह सब उसके पास लकड़ियों के लिए आये। उन्हें चाहिए उतनी लकड़िया उसके पास नही थी। तो वह सब व्यपारी उसे कहते हैं कि तुम हमारे साथ चलो, हम तुम्हें कुछ पेड़ दिखाते हैं तुम वह काट दो और तुम्हारे जितने पैसे बनते हैं वो ले लो। समय भी बड़ा खुश हुआ क्योंकि एक तो उसकी सारी लकड़िया बिक गई ऊपर से ज्यादा कमाई का मौका भी मिल गया।
समय अपनी कुल्हाड़ी उठाता है, और उनके साथ चल पड़ता है। वह सब उस जगह पर पहुंचते। वह लोग उन्हें कई पेड़ दिखाते है, वह भी बिना कुछ देखे काम पर लग जाता है। सारे व्यपारी वहीं बाजू में बैठकर आपस में बात करने लगे।
"तुम्हारा वह कर्मचारी उस गांव से आया या नही"
"गया होगा तो आएगा ना। उसने जाने से ही मना कर दिया। "
" लेकिन सच है, उस गांव में जाने से कोई भी मना कर दे। "
आखिर उस गांव का खौफ ही कुछ ऐसा है। वह राजमहल जिसे सब श्रापित मानते है, जिस कारण से वहाँ जाने से भी डरते हैं। लेकिन उस राज महल का नाम उसे देखता ही बनता है। कितने साल बित गये लेकिन आज भी वही शान से खड़ा है। उसकी वैभवता के सामने आज भी लोग घुटने टेक दे।
समय से रहा नही गया और बोल पड़ा, " किस जगह की बात आप सब लोग कर रहे हो।"
व्पयारी ने पास के गांव नाम बताया जिसे वह जानता था।
समय ने पूछा, " आप जिस राजमहल की बात कर रहे हो, उसमें इतना क्या खास है जो आप इतनी तारीफ कर रहे हो।"
व्यापारी ने कहा, " वह महल एक राजा का हुआ करता था। जो बहुत प्रजापालक और धर्मात्मा था। उसने अपने जीवन में इतने अच्छे काम किए की उसकी कीर्ति चारों ओर फैली हुई थी। उसने जीवनभर अच्छे से शासन किया और हमेशा अपने लोगों के दिल पर राज किया। साथ में बहुत सारा धन भी अर्जित किया। और कहा जाता है वो आज भी उस राजमहल में कही छुपा कर रखा गया है।
वहाँ कई लोग गये खजाना ढूंढने को लेकिन किसी के हाथ कुछ नहीं लगा। कहा जाता है कि कोई पहेली है जो हल करनी पड़ती है।
"लोगों का कहना है की वह राजमहल भूतिया है। और लोग वहाँ जाने से भी डरते हैं।"
तभी एक व्यापारी ने उस व्यापारी से पूछा "अब क्या करने वाले हो। "
व्यपारी बोला," मैं किसी को ढूंढ रहा हूँ। जो मेरा काम कर दे। चाहे मुंह मांगी कीमत ले ले। "
समय ने यह सब सुना और बोला," अगर आप चाहे तो मैं वो काम आपको कर के दूँ। "
व्यपारी बोला," अगर तुम वह काम मुझे कर के दो तो मैं वह काम के जो पैसे देने वाला था उसके दुगने पैसे तुम्हें दूँगा। "
व्यपारी ने कहा, " मैंने वहाँ के एक व्यापारी मित्र से पैसे तो ले लिये लेकिन सामान पहुंचा नही पा रहा हूँ, तो तुम्हे सामान पहुंचाना है। और मैं तुम्हें बता दूँ कि जिस महल की बात कर रहे थे उसीके डर के कारण ही वहाँ कोई जाना नही चाहता है। "
समय ने कहा," मुझे कोई डर नही लगता। क्योंकि मैं एक लकड़हारा हूँ और हमेशा जंगल और न जाने कहा कहा अकेले ही जाता हूँ। इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं है। "
" बहुत बढ़िया, पहले तुम यह काम पूरा कर लो तब तक मैं सारी तैयारी कर लेता हूँ। " ऐसा कहकर व्यपारी तैयारी करने चला गया।
समय काम के पैसे लेकर घर की ओर से उस गांव की ओर निकला। समय ने जितने पैसे कमाये उतने घरवालो को देकर सारी बात बताकर घर से निकला।
रास्ते भर समय उस राजमहल के खजाने के बारे में सोच रहा था। और मन ही मन सोच रहा था कि खजाना होता तो कोई कब का निकाल कर ले गया होता।
यह सब सोचते हुए समय जिस जगह सामान पहुंचाना था वहाँ पहुंच गया। सामान सही सलामत पहुंचाने के बाद समय से रहा नहीं गया और उन लोगों से राज महल के बारे में पूछ लिया।
उन लोगों ने राजमहल की भव्यता के तारिफ के पूल बांधना शुरू कर दिये। यह सब से समय से रहा नही गया और वहाँ का रास्ता पूछ कर वहाँ के लिए निकल पड़ा।
समय मन ही मन सोचते जा रहा था कि चलो कोई भव्य महल देखने मिलेगा और क्या पता खजाना भी मिल जाये।
समय राजमहल के पास पहुंच गया। राजमहल की जितनी तारीफ की जा रही थी ठीक वैसा ही था। समय राजमहल के अंदर प्रवेश करता हैं।
समय राजमहल को देखने में बिल्कुल खो सा गया। लेकिन उसे एक बात खल रही थी कि इतना आलीशान महल होने के बावजूद कोई इस महल में कभी आना नहीं चाहता था।
समय क इस सब बातों से अपना ध्यान हटा कर सोचने लगा, "क्यूँ ना खजाना ढूंढा जाये।"
समय खजाना ढूंढने में लग जाता है।
समय महल में इधर-उधर ढूंढने लगा। वह सारे कमरे में घूमने लगा। यहां वहां देखने लगा।
समय महल में घूमते घूमते एक जगह पर पहुंचता है। उस जगह के बारे में समय को सबसे सुन रखा था। वह वहीं जगह थी, जहाँ राजा को जब कोई जवाब नहीं मिलता तो जवाब ढूंढने के लिए राजा एकांत जगह पर जाता था।
वहाँ समय अच्छे से खोज बिन करने लगता है। तब जा के राजा जिस जगह बैठता था उस जगह पर एक जगह पर सोने के थाल पर लिखा हुआ था।
' खजाना चाहिए तो रात को आना। '
इस बारे में किसी ने उसको कुछ नहीं बताया था। समय खोज बिन जारी रखता है। फिर थक हार के वापिस वहीं जगह आता हैं जहाँ वह थाल पड़ी थी। और उसे देखकर वह उस बारे में सोचने लगता।
उसे एक रास्ता मिलता है कि अगर खजाना चाहिए तो रात का इंतजार करना पड़ेगा। और थकान मिटाने के लिए और रात होने तक वहीं सो जाता है।
रात हो जाती है। और उसके साथ ही समय की आख भी खुल जाती है। वह हर जगह अच्छे से देखने लगता है। रात गहरा ने लगती है। तभी उस कमरे में कहीं से रोशनी आती है। और वो कुछ चीजों पर पड़ती है।
वो होती है। उनका सिंहासन, मुकुट, थाल, चुल्हा, और कुछ बर्तन।
वह जान गया पहेली यहीं है।
और वो उसका हल ढूंढने में लग जाता हैं। समय पागलों की तरह महल में भागता, इधर-उधर देखता के कोई हल हो तो मिल जाये। लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। वह दौड़ भाग से थक जाता है। इतनी महेनत और पूरे दिन कुछ ज्यादा न खाने की वजह से भूख लग जाती है। समय बर्तन को देखकर सोचता है कि "काश, उन बर्तन में खाना भी होता।" इस बात से उसके मन में एक बिजली चमकी।
समय बर्तन उठाकर उस जगह छानबीन करने लगा। उसे कुछ भी नहीं मिलता। वह सोचने लगा, कोई खजाना है ही नहीं, बस उल्लू बनाया जा रहा है।
" अब यहाँ आ गया ही गया तो सुबह तक यहीं रुक कर सुबह ही निकलता हूँ। वैसे भी इतनी रात को ओर कहाँ जाऊंगा। "
समय वहाँ लेट जाता है और सोचता है अगर इस पहेली का हल होता तो क्या होता। और आजू-बाजू देखता है। वह चीजें वैसे ही उस रोशनी से चमक रही थी।
तभी उसकी नजर मुकुट के बाजु में पड़ी थाली पर पड़ती है। समय वहाँ जाता है तो देखता है कि साधारण सी थाली है उस पर एक पोटली पडी थी। वह पोटली उठता है और खोलता है। तो उसमें से एक चिट्ठी निकलती है। यह मेरे जीवन सारी जमापूंजी हैं। इस बात को बार बार पडता है। लेकिन तभी उसकी नजर थाली पर पडती है जहाँ लिखा था
" असली सुकून महेनत की रोटी में हैं। "
समय वह सारी चीजें जैसी थी वैसी ही रख देता है। और बोलता है खजाना है ही नही। और उस थाल के पास पहुंच जाता है जहाँ पहेली लिखी हुई थी। लेकिन उसे क्या सुझता है वह भी उस थाली पर अपनी पोटली रखते हुए कहता है यह रही मेरी जमापूंजी।
जैसे ही थाल पर पोटली रखता है सिंहासन सरकता है। समय वहाँ जाकर देखता है तो उसके नीचे एक बक्सा था। जिसमें खजाना था।
समय पहेली उसके दिमाग में से जा ही नहीं रही थी। फिर वो दोनों थाल की बात को बड़े गौर से पढता है और समझ जाता है। सिंहासन को अपनी जगह पर करता हैं, पोटली उठाता हैं। सुबह होने तक वहाँ सो जाता है। और सुबह होते ही अपने गांव की ओर चल पड़ता है।

