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Nisha Singh

Romance


4.7  

Nisha Singh

Romance


ख़त

ख़त

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एक ज़माना था जब शब्दों के भी चेहरे हुआ करते थे। जो बातें ज़ुबां तक आते-आते रह जाती थी वो उन पन्नों में कही जाया करती थीं जिन्हें हम कहते हैं। सुना था कि बहुत कीमती हुआ करते थे ये ख़त। पर सिर्फ़ सुना भर ही था एहसास आज जाकर हुआ इनकी कीमत का। यूं तो बीते ज़माने की सी बातें लगती हैं किसी को ख़त लिखना पर आज मैं भी अपने हाथों में एक खत लिए बैठा हूं। गुलाबी रंग के पन्ने पर नीली स्याही से लिखा ये ख़त न जाने क्या-क्या समेटे हैं अपने आपआज करीब 10 दिन बाद मिले थे हम। मुझे तो लगा था कि नाराज़ है पर ऐसा था नहीं। मैंने बुलाया तो मिलने भी आई, मुस्कुरा कर बात भी की और जब अपने सवाल का जवाब मांगा तो यह खत थमाकर चली गई। साल भर होने को आया था मेरी और सिम्मी की मुलाकात हुए। मुझे तो पहली ही नज़र में प्यार हो गया था पर उसके दिल में जगह बनाने में मुझे वक्त लगा। 2 दिन तक सोचता रहा कि कैसे कहूं कि इतनी मोहब्बत हो गई है तुमसे कि अब दूर रहा ही नहीं जाता, कैसे कहूं कि इस मोहब्बत को ताउम्र निभाना चाहता हूं, कैसे कहूं कि उसका ख्याल रखना अच्छा लगता है मुझे, कैसे कहूं कि उसके बगैर ये दुनिया बेमानी सी लगती है...2 दिन बाद एक कॉफी शॉप में मैंने उसे मिलने बुलाया। गुलाबी रंग के सूट के साथ माथे पर लगी वह छोटी सी बिंदी कसम से गजब ढा रही थी। खूबसूरत लड़कियों को देखकर दिल कितनी तेज रफ्तार से धड़कने लगता है… नहीं…

“क्या हुआ… अचानक से क्यों बुलाया? पता है ना ऑफिस में कितना काम पड़ा था…” सामने बैठते हुए उसने पूछा।

“कॉपी मंगायें?”

“श्योर...”

“सिम्मी…” कॉफी पीते पीते मैंने कहा।

“हम्म...”

“कुछ जरूरी बात करनी थी तुमसे”

“हां तो बोलो ना…”

“सिम्मी… क्या हम इस रिश्ते को आगे बढ़ाने के बारे में सोच सकते हैं?”

पूरी हिम्मत जुटा कर मैंने कहा और वह अंगूठी जो मैं आज सुबह ही खरीदी थी उसके सामने खोल कर रख दी। उसने अंगूठी की तरफ देखा फिर मेरी तरफ देखा न हाँ कहा है ना कहा बोली-

“राज मुझे सोचने के लिए कुछ वक्त चाहिए।“

इससे पहले कि मैं कुछ पूछ पाता वो चली गई।

आज जब मुझसे रहा नहीं गया तो मैंने उसे बुला ही लिया और जवाब के बदले में मिल गया यह खत। देखूं तो क्या लिखा है…


राज… 

लिखना तो ‘मेरे राज’ चाहती थी पर हिम्मत नहीं थी कि अब किसी और को अपना कह सकूं किसी और को इस दिल में जगह दे सकूं फिर एक बार सपने बुन सकूं फिर एक बार प्यार कर सकूं। हां राज... फिर एक बार।

अब नहीं है मुझ में हिम्मत कि फिर से उसी रास्ते पर चल सकूं जिस रास्ते पर सिवाय कांटों के मुझे कुछ नहीं मिला। जिस रास्ते ने मुझे दर्द के सिवाय कुछ नहीं दिया। नहीं राज, मुझसे नहीं होगा मुझे माफ कर देना।

ऐसा नहीं है कि मुझे तुम्हारा साथ अच्छा नहीं लगता, ऐसा नहीं है कि मैं तुम पर भरोसा नहीं करती पर मैं मजबूर हूं राज। उस रिश्ते की घुटन मेरे अंदर आज भी जिंदा है। मैं नहीं भूल पाती कि जिस इंसान को मैंने दिल से चाहा था उसने कैसे मुझे पल भर में पराया कर दिया कैसे मुझे बीच रास्ते छोड़ दिया कैसे मेरे प्यार को उसने ज़लील किया। मेरे अंदर ताकत नहीं है। मैं इस रिश्ते को मकाम तक नहीं पहुंचा पाऊंगी। मुझे खुद पे भरोसा ही नहीं रहा। लेकिन फिर भी तुम्हें लगता है कहीं से कोई भी उम्मीद दिखाई देती है इन सब के बावजूद भी मुझपे भरोसा करने का दिल करता है लगता है कि तुम मुझे अपना सकोगे तो मुझे बता देना पर केवल खत लिख कर।                                      अगर कभी हो सकी तो तुम्हारी                              

                                             सिम्मी

ख़त को मोड़कर मैंने जेब में रख लिया। कुछ देर को सब कुछ ठहर सा गया। सब कुछ सुन्न सा हो गया। कुछ देर बाद होश में आया तो उठ खड़ा हुआ। घर जाने की जल्दी थी किसी को खत जो लिखना था... 


 


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