Ranjana Mathur

Horror


1.7  

Ranjana Mathur

Horror


कहानी - "चीखता वीरान किला "

कहानी - "चीखता वीरान किला "

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मई का दूसरा सप्ताह.... 

मेरे मामा का लड़का अजय भी समर वेकेशन में उज्जैन मध्य प्रदेश से अजमेर राजस्थान हमारे पास आया हुआ था। उसे भी नयी - नयी जानकारी खोजने का बड़ा चसका था जिससे मामा परेशान थे। 

छुट्टियों की वजह से मेरे एक मित्र विनीत के साथ भानगढ़ घूमने का पहले से प्लान बन चुका था। विनीत बड़ा दिलेर दूसरे शब्दों में पंगेबाज लड़का था यही कारण रहा कि पापा मुझे उसके साथ भानगढ़ नहीं भेजना चाहते थे। 

हांलाकि पापा मम्मी वहां जाने के पक्ष में कतई न थे। वजह थी वे राजस्थान के निवासी होने के कारण वे भानगढ़ के वीरान किले के विषय में जो अभी तक सुन चुके थे वह अत्यन्त भयावह व खौफनाक था। 

कहते हैं भानगढ़ का दुर्भाग्यशाली दुर्ग स्वयं में भूतकाल की अतिभयानक कहानी समेटे हुए है। 


हमारी रगों में प्रवाहित युवा रुधिर हमें इन कहानियों के कारण बहुत रोमांचित और उत्सुक कर रहा था। 

अन्ततः हम गुरुवार को प्रातः 8. 30 बजे निकल ही पड़े अपने गन्तव्य की ओर। 


बुधवार को माँ ने अपशकुन की आशंका से रवाना नहीं होने दिया। माँ ने सुबह शाम का खाना व अगले दिन का नाश्ता साथ बांध दिया था और पापा की सख़्त चेतावनी थी कि कोई उल्टी सीधी गतिविधियों व नाइट स्टे हरगिज नहीं करना है। इन्हीं शर्तों पर हमारी यात्रा को जैसे तैसे मंज़ूरी मिली थी। रात को जयपुर में स्टे करना था। हमने कार सरपट दौड़ाई। 

अजमेर से भानगढ़ तक की दूरी 215.1 किलोमीटर की है जिसे हमने कार से लगभग साढ़े तीन घंटे में पूर्ण किया। 

आखिर आ ही पहुंचे भानगढ़।


मैं बहुत रोमांचित था बचपन का स्वप्न पूरा जो होने जा रहा था। 


भानगाढ़ एक प्राचीन नगर है। मान्यता है कि एक तांत्रिक की बुरी नियत इस नगर के विनाश का कारण बनी। इतिहास बताता है कि आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 ई. में अपने छोटे बेटे माधो सिंह के लिए भानगढ़ दुर्ग व महल का निर्माण कराया था । कालांतर में इनकी 3 पीढ़ियों ने इस नगर पर राज किया। तब तक नगर में चैन ओ सुकून था। 


दिन के साढ़े बारह बज रहे थे

"यार आंटी का रखा माल निकाल। भूख लगी है" विनीत बोला। 


अजय ने कहा - "अबे वो कल सुबह के लिए है।" तब तक तो वह झपट्टा मार चुका था मठरी पर। 

"चलो यार हम जिस मकसद से आए हैं वह तो हासिल करना ही है आज।" मैं बोला। 

हमारी कार अब किले से लगभग डेढ़ कि मई दूर थी। कार विनीत चला रहा था। सही मार्गदर्शन के लिए पास बैठे ग्रामीणों के एक समूह से पूछा -" भैया भानगढ़ किले का रास्ता.?" 

वह राजस्थान में बोला-"अठै से डेढ़ मील सै। पण थै अभी मत जावो सा। 12 बजै भूत परेत णो चक्कर रैवै सै। थोड़ो रूको।" 

यह सुनते ही अजय व विनीत तो उतावले हो उठे वहाँ पहुँचने को। 


खैर साहब। पन्द्रह मिनट में हम रेतीली ऊबड़- खाबड़ रास्ता पार कर दुर्ग के सामने थे। 

किले में प्रवेश किया तो चहुं ओर सांय - सांय सन्नाटा। दर्शक पर्यटक भी न के बराबर। एक जोड़ा बाहर निकल रहा था जिसमें महिला भयभीत हो पुरुष से टी जा रही थी। वह शायद उसे समझा रहा था। 


 कभी चकाचौंध जगमगाने वाला भानगढ़ का बाज़ार शुरू हो गया था संकरी सड़क के दोनों ओर दुकानों के आकार के खंडहर बिना छतों के ऐसे दिख रहे थे मानों किसी यंत्र से एक साथ इन्हें काटा गया हो। हम आगे बढ़े ही थे कि एकाएक सामने पड़ा एक चट्टाननुमा विशाल पत्थर तेज़ी से लुढ़कता हुआ हमारी ओर आने लगा। 

अरे अरे बचो बचो। कहकर हम एक तरफ हुए और वह लुढ़कता हुआ बाहर। 

पता लगा तेज़ हवाएँ सूँ सूँ की आवाज़ के साथ अचानक चलने लगीं। हम तीनों एक सुरक्षित कोना ले कर खड़े हो गये। 

शनैः-शनैः तूफान कम हुआ और हम बाजार पार कर महल के अंदरुनी भाग में प्रविष्ट हुए। यह क्या एकदम अंधेरा कैसे हो गया दिन के डेढ़ बजे। 

फड़फड़ा कर लगभग बीस चमगादड़ बाहर उड़े जिन्होंने उड़ने की प्रक्रिया में रोशन दान को ढक दिया था। हम अपनी बेवकूफी पर खूब हँसे। 


दिन भर सैर सपाटा खाना सब किया। असली रूप तो रात को देखना था। 

हम तीनों साढ़े ग्यारह बजे रात तक अंदर रहे। जब सारी पब्लिक बाहर आने लगी तो विनीत हम दोनों से बाहर जाने की कहने लगे। हम उसे भी बाहर लाना चाहते थे अतः वहीं रहे। 

सब लोगों के जाने के बाद..... 

विनीत कहाँ है... 

अजय तू अभी तो था मेरे पास। यार मज़ाक मत कर.... 

मैं चिल्लाया कोई है...

"हाँ मैं हूँ "

"एक खून से लथपथ शरीर में पुरुष मेरे सामने हाथ जोड़ कर कह रहा था-वो तंत्र विद्या से मार रहा है हम सबको बचा लो हमें "

और वह नीचे गिरा उसके गिरने तक पूरा किला खूनी लाशों से पट चुका था। 

मैंने भागना चाहा परन्तु पैर जाम हो चुके थे। 

"विनीत अजय" मैंने आवाज़ दी। 

" हाँ हम तेरे पास ही हैं।" 

"देख "

देखा तो दोनों लम्बे नाखूनों व बड़े दांतव वाले मुंह से खून टपकाते एक बच्चे को कच्चा चबाने की कोशिश कर रहे थे। 

मेरी रूह काँप उठी। 

यह क्या अनर्थ कर रहे हो। चलो वापस। 

नहीं नहीं। हमारे सारे अपने मर गए। हम बर्बाद हो गये। वह तांत्रिक हमें मार रहा है। 


हमें बचा लो हमें बचा लो। 

तभी देखा एक खूबसूरत औरत राजकुमारी सी आई और न जाने क्या छिड़क दिया। कुछ देर में होश आया। मैं विनीत के साथ किले के बाहर पड़ा था। अजय फिर कभी उस खूनी किले से बाहर न आ सका। 



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