Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

Abstract


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Ramashankar Roy 'शंकर केहरी'

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जंगल डेमोक्रेसी

जंगल डेमोक्रेसी

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एक समय की बात है जब शेर जंगल का राजा हुआ करता था । वक्त के साथ जंगल छीन होते गए और शेर कि अचानक मौत हो गयी ।फिर सभी जानवर ने मिलकर यह निर्णय किया कि अब हमलोग भी डेमोक्रेसी को ही अपनाएंगे।चुनाव हुआ और कुत्ता का विजयी हुआ क्योंकि लोगो ने उसकी वफादारी पर भरोसा किया। लेकिन बहुमत नहीं मिला । फिर सियार को मिलाकर सरकार बना ली गयी ।

बिल्ली का कुनबा कमजोर पड़ने लगा । अचानक एक बाघ का बच्चा बिल्ली के समूह में आ गया और बिलियों ने उसे अपनी बिरादरी का समझ कर पालन पोषण किया ।फिर अगले चुनाव मे बिल्ली का दल विजयी हुआ ।जीत का श्रेय बाघ को मिला और वह गद्दी पर बैठ गया । दोनो की संयुक्त समझ और कौशल का डंका बजने लगा ।

इस युति से कुत्ता और सियार का गठबंधन परेशान हो उठा ।अगले चुनाव में फिर से बाघ प्लस की विजय हुई । लेकिन सियार इस बीच बिल्ली को यह समझाने में कामयाब हो गया कि बाघ तुम्हरी जाती का नही है और उसका ताकतवर होना हम जैसे छोटे जानवर के अस्तित्व के लिए खतरा होगा ।अतः बिल्ली ने कुत्ता और सियार के साथ मिलकर सरकार बनाने का फैसला इस लालच में लिया कि उसे पाँच साल के लिए गद्दी मिलेगी ।

बाघ बिल्ली को अपना मौसी मानता था और उसके विकास और पहचान को अपना कर्तव्य ।लेकिन सियार की चालाकी बिल्ली को समझ नही आई क्योंकि बिल्ली जब आँखें बंद कर दूध पीती है तो उसको लगता है कोई नहीं देख रहा है ।बाघ और बिल्ली का रास्ता अलग करने के बाद सियार ने अपना रंग दिखान शुरु किया ।उसने बिल्ली को अपने गले मे घंटी बांधने की शर्त रखी क्योंकि कुत्ते की सहयोगी चूहों की यह मांग थी ।

बिल्ली की समस्या अजीबोगरीब हो गयी - घंटी पहने तो बिल्लीपना समाप्त और बाघ के पास वापस जाए तो आत्मसमान को ठेस ।अब देखना दिलचस्प होगा कि सत्ता के लिए बिल्ली पहचान खोती है या भूल सुधार कर बाघ को अपनाती है।

परिणाम चाहे जो भी हो डेमोक्रेसी में बोलने से पहले सोचने की अहमियत रेखांकित करता है ।



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