मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


3  

मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Abstract


इच्छा (कहानी)

इच्छा (कहानी)

3 mins 12.3K 3 mins 12.3K


- अरे राज, तुम उस पुलिया पर बैठे क्या कर रहे हो ?

- मैं तो यूँ ही, बैठ गया, रश्मि। तुम लोग रंग तैयार कर रहीं थीं। सोचा थोड़ी देर हवा में बैठ जाऊँ। 

- हाँ बैठ लो। आज तो तुम्हारी, वैसे भी खैर नहीं। मेरी बहनें उनकी सहेलियों के आने का इंतिजार कर रहीं हैं। फिर बताएंगी तुम्हें, जीजा जी की पहली होली ससुराल में कैसी होती है। चलो अच्छा श्री गणेश तो, मैं ही कर देती हूँ। 

और रश्मि ने अपने हाथों का रंग राज के चेहरे पर लगा दिया। फिर राज भी कहाँ चूकने वाला था। राज ने हाथ पकड़ कर रश्मि को वहीँ घर के सामने बनी पुलिया पर बैठा लिया और दोनों बातें करने लगे। 

- राज जानते हो, "गुलाल लगने के बाद तो तुम्हारा चेहरा ठीक उस लड़के की तरह लग रहा है। जो पिछले साल इसी समय, जब मैं अपनी सहेलियों के साथ होली खेल रही थी। तो यहीं बैठ कर हम लोगों को घूरे जा रहा था। होली के दो महीने पहले ही तो तुम देखने आए थे। एक बार तुम्हारा ख्याल दिल में आया। फिर सोचा इतनी दूर, दूसरे शहर से तुम यहाँ क्यों आओगे?

राज, रश्मि की बात सुनकर मंद-मंद मुस्कराने लगा। 

- इसका मतलब राज तुम ही थे ?

-अरे पगली ,मैं क्यों आऊँगा इतने दूर से ... 

अब रश्मि ने खड़े होकर फिर से राज का चेहरा रंग-गुलाल में रंगा देखा। बिल्कुल बैठने का वही अंदाज़, वही अदा। अब तो उसे पूरा विश्वास हो गया। 

- सच बताओ राज, तुम ही थे कि नहीं ?

- तुम लड़के, "हम लड़कियों को बेवकूफ समझते हैं। हैं .... न ?"

- नहीं रश्मि, अब तुम्हें, मैं सच बताता हूँ। "मैं ही था।"

 जब से तुम्हें देख कर गया। तुम मेरे मन-मष्तिस्क में बस चुकीं थीं। तुम से मिलने का बहाना ढूंढता रहता था। शादी अभी तय नहीं हुई थी। मैं घर भी नहीं आ सकता था। सोचा तुम्हारे ऑफिस के रास्ते में खड़ा हो जाऊँ। लेकिन डर था तुम्हारी नज़र मुझ पर पड़ गई तो तुम मेरे बारे में पता नहीं क्या सोचोगी? फिर होली के पहले ही मैं ने प्लान बनाया और होली की रात को ही ट्रैन में बैठकर एक दोस्त के साथ सुबह से चेहरे पर रंग लगा कर यहीं बैठ गया। ताकि तुम क्या, कोई भी मुझे पहचान न पाए। तुम अपनी सहेलियों के साथ होली खेलतीं रहीं, मैं चुप चाप देखता रहा। तुम्हें रंगों में रंगा देखकर एक अलग ही आनन्द आ रहा था। फिर हुरियारों की टोली में शामिल होकर तुम्हारे घर भी पहुँच गया। तुम हुरियारों को देख कर अन्दर चली गईं। लेकिन पिताजी ने सबको पानी पिलाने के लिए तुम्हें बुलाया तो तुम बाहर आ गईं। मेरी तो लाटरी खुल गई। मैं ने सबकी नज़रें चुरा कर थोड़ा सा गुलाल तुम्हारे चेहरे पर भी लगा दिया था।

आज यहाँ बैठ कर मैं उन्हीं पलों को याद कर रहा था। 

रश्मि ने अब तक राज को बाँहों में भर लिया। और सारी सहेलियों ने रंग से भरी एक बाल्टी राज के सर पर डाल दी।

"राज, लो। तुम्हारी इच्छा अब पूरी हो गई, न।"


Rate this content
Log in

More hindi story from मुज़फ्फर इक़बाल सिद्दीकी

Similar hindi story from Abstract