हमसफ़र
हमसफ़र
हमसफ़र.
समुद्र किनारे की ठंडी हवा मंजु के चेहरे को छू रही थी।
लहरों की आवाज़ में उसे अजीब-सा सुकून भी था… और हल्का-सा डर भी।
रेत पर चलते हुए उसे महसूस हुआ—कोई उसके साथ कदम मिला रहा है।
वह अचानक रुकी… पीछे मुड़ी…
पर वहाँ सिर्फ़ खालीपन था।
फिर भी, भीतर कहीं एक धीमी आवाज़ गूँजी.
“मैं ही तुम्हारा हमसफ़र हूँ…”
महानगर में मंजु ने हमेशा भीड़ देखी थी,
पर अपनापन… कभी नहीं।
दफ़्तर की भागदौड़,
अजनबी चेहरों की अंतहीन कतार,
और रात के कमरे की गहरी खामोशी—
इन सबने मिलकर उसके भीतर एक साया बना दिया था।
आज… वही साया समुद्र किनारे उसके साथ चल रहा था।
आईने में झलकती अजनबी आँखें…
खिड़की पर खड़ा धुंधला चेहरा…
और हर जगह गूँजती आहट…
मंजु अब समझने लगी थी—
यह हमसफ़र कोई इंसान नहीं है।
यह… उसका अपना अकेलापन है।
लहरें उसके पैरों को छूकर लौट जातीं,
जैसे कह रही हों.
“अकेलापन भी एक साथी हो सकता है…”
मंजु हल्के से मुस्कुराई।
उसने स्वीकार कर लिया.महानगर का यह साया अब उसका दुश्मन नहीं रहा…
बल्कि,उसका सच्चा हमसफ़र बन गया है।
“अब उसे भीड़ में भी अकेलापन नहीं डराता था… क्योंकि उसका हमसफ़र हमेशा उसके साथ था।”
