दिन का भूत
दिन का भूत
“दिन का भूत”
मेरी मौत हो चुकी है…
हाँ, यह बात अब मुझे भी माननी पड़ी है।
पहले-पहल जब आँख खुली, तो लगा जैसे कोई गहरी नींद से उठा हूँ। लेकिन चारों ओर सन्नाटा था। हवा में मिट्टी की गंध… और सामने मेरी ही तस्वीर, एक पत्थर पर जड़ी हुई।
नीचे लिखा था—
“स्वर्गीय…”
मैं ठिठक गया।
“यह… मैं हूँ?”
पास ही एक बूढ़ा आदमी रो रहा था। उसने कब्र पर फूल रखे… और बुदबुदाया,
“तू जल्दी चला गया बेटा…”
मैं चिल्लाना चाहता था—
“मैं यहाँ हूँ! मैं जिंदा हूँ!”
लेकिन मेरी आवाज़… हवा में घुल गई।
उस दिन समझ आया—
मैं अब इंसान नहीं रहा।
अब मेरी दुनिया यह कब्रिस्तान है।
दिन में… मैं यहीं रहता हूँ।
सूरज की रोशनी मुझे जलाती नहीं, पर मुझे दिखाती है—
कितने लोग आते हैं, रोते हैं, और फिर चले जाते हैं।
हर कब्र एक कहानी है…
और मैं उन सबका गवाह।
एक कोने में एक बच्ची की कब्र है।
उसकी माँ रोज आती है… और गुड़िया रख जाती है।
मैं कई बार उस गुड़िया को उठाकर देखता हूँ…
पर छूते ही वो मेरे हाथों से फिसल जाती है।
एक बूढ़ा दंपत्ति है—
हर रविवार आता है… अपने बेटे की कब्र पर बैठकर चुपचाप बातें करता है, जैसे वो अभी भी सुन रहा हो।
और मैं सोचता हूँ—
क्या सच में वो सुनता होगा?
रात में… कुछ और भी होता है।
हवा भारी हो जाती है…
पेड़ जैसे फुसफुसाते हैं…
कभी-कभी… मुझे लगता है मैं अकेला नहीं हूँ।
एक रात, मैंने उसे देखा।
एक और भूत।
वो मेरी ही तरह था… खोया हुआ।
उसने पूछा—
“तू कब आया?”
मैं बोला—
“पता नहीं… बस एक दिन आँख खुली, और यहाँ था।”
वो मुस्कुराया—
“सबके साथ ऐसा ही होता है।”
“तुझे डर नहीं लगता?” मैंने पूछा।
वो बोला—
“डर तो तब लगता था… जब जिंदा था। अब तो बस यादें हैं।”
धीरे-धीरे… मुझे भी आदत हो गई।
अब मैं लोगों को देखता हूँ…
उनके दुःख, उनकी यादें…
और समझता हूँ—
मरना अंत नहीं है…
कभी-कभी, मैं अपने घर के पास भी जाता हूँ…
दरवाजे के बाहर खड़ा रहता हूँ।
अंदर मेरी तस्वीर टंगी है…
और मेरी माँ… अब भी मुझसे बात करती है।
मैं जवाब देना चाहता हूँ…
पर नहीं दे पाता।
आज… एक नया आदमी यहाँ आया है।
वो मेरी कब्र के पास खड़ा है।
उसकी आँखों में वही सवाल है… जो कभी मेरी आँखों में था।
मैं उसके पास गया…
और धीरे से पूछा—
“तू कब आया?”
वो घबरा गया…
“क…कौन?”
मैं मुस्कुराया।
अब समझ आया—
कहानी खत्म नहीं हुई…
मैं अब किसी और के लिए…
पहला भूत बन चुका हूँ।
अंत… या शायद शुरुआत।
