पहली बारिश…
पहली बारिश…
पहली बारिश…
Alfred High School में पाँचवीं कक्षा के नए सत्र का पहला दिन था।
15 जून की पहली रीसस…
स्कूल के मैदान में पहली बारिश की हल्की फुहार पड़ रही थी…
पानी के नल पर दो छोटे हाथ एक साथ टकराए थे।
ऋषिल गरजा —
“पहले मैं हूँ!”
“नहीं, पहले मेरी बारी!”
राधिका ने नखरे से जवाब दिया।
और उसी दिन से शुरू हुआ झगड़ा, पूरी ज़िंदगी चलता रहा।
साठ साल बाद…
अब घर की दीवारें और कमरे बूढ़े हो चुके थे।
घड़ी भी जैसे धीरे चलने लगी थी, और ऋषिल का चश्मा बार-बार खो जाता था।
डायबिटीज़ की दवा भी वह अक्सर भूल जाता।
एक जैसी चलती ज़िंदगी में, इस महीने कुछ ज़्यादा बदल गया था।
राधिका अब बीमार पड़ चुकी थी।
डॉक्टर ने शब्द तो छोटे ही कहे थे, मगर उनका मतलब बहुत बड़ा था —
“अब ज़्यादा समय नहीं है।”
घर में पहली बार सन्नाटा, सन्नाटे जैसा नहीं… बेचैनी जैसा लग रहा था।
झगड़े कम नहीं हुए थे… बंद हो गए थे।
और राधिका की बातों को कभी गंभीरता से न लेने वाले ऋषिल को, वही ख़ामोशी अब काटने लगी थी।
उस शाम ऋषिल खुद रसोई में गया।
ज़िंदगी भर चाय का शौक़ीन रहा था, मगर चाय बनाने का काम हमेशा राधिका ने ही किया था।
वह हमेशा कम चीनी डालती…
और हँसकर कहती —
“लगता है आजकल चीनी फीकी हो गई है।”
आज ऋषिल ने काँपते हाथों से दो कप चाय पूरी चीनी डालकर बनाई।
एक कप लेकर धीरे-धीरे राधिका के बिस्तर के पास आया।
“लो… चाय पी लो… लगता है आज चीनी फीकी नहीं है।”
उसने झूठी मगर मीठी मुस्कान लाने की कोशिश की।
राधिका ने कमज़ोर हाथों से मेज़ पर रखे कप की ओर हाथ बढ़ाया।
और…
साठ साल पहले पानी के नल पर जैसे दोनों के हाथ टकराए थे,
वैसे ही आज चाय के कप पर फिर एक बार दोनों के हाथ साथ जुड़ गए।
कुछ देर दोनों चुप रहे।
फिर राधिका ने नज़र झुकाई, आँखों से आँसू ढलके और वह धीमे से बोली —
“रायजी… देखो… आज भी बारी पहले लेने की जल्दी आपको ही है…”
आज ऋषिल गरजा नहीं।
बस उसने राधिका का हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया।
खिड़की के बाहर जून की पहली बारिश शुरू हो चुकी थी।
ज़िंदगी के हर पड़ाव पर,
पहली बारिश फिर से जीने की इच्छा जगा देती है।
भीगी मिट्टी की खुशबू कहती है —
कुछ प्रेम कहानियों का अंत “अलविदा” से नहीं होता…
बल्कि ज़िंदगी के किसी शांत मोड़ पर,
एक ही कप पर टिके दो काँपते हाथों से होता है।

