रंग और नूर की बारात.
रंग और नूर की बारात.
🌈 रंग और नूर की बारात —
एक छोटे से गाँव में शिखा नाम की एक अंधी लड़की रहती थी।
वह अपनी आँखों से दुनिया नहीं देख पाती थी,
लेकिन उसका मन रंगों को महसूस कर लेता था।
उसके लिए हर रंग की अपनी एक धुन,
अपनी एक खुशबू,
अपनी एक कहानी थी।उसका बड़ा भाई सूरज बहुत हँसमुख और दयालु था।
हर सुबह वह उसके पास बैठकर दुनिया का हाल सुनाता।
वह कहता,
“शिखा, आज आसमान नीला है, जैसे बाँसुरी की मधुर तान।
सूरज पीला है, जैसे बच्चों की खिलखिलाहट।
और खेतों की हरियाली ऐसी है, जैसे धरती मुस्कुरा रही हो।”शिखा मुस्कुराकर कहती,
“भैया, मुझे रंग दिखाई नहीं देते,
लेकिन उनकी आवाज़ सुनाई देती है।
लाल रंग ढोल की थाप जैसा है,
नीला शांत नदी के गीत जैसा,
पीला खुशियों की हँसी जैसा,
और हरा पेड़ों की साँसों जैसा।”कुछ ही दिनों में होली का त्योहार आने वाला था।
पूरा गाँव तैयारियों में जुट गया।
घर-घर में गुजिया की खुशबू,
चौपाल पर ढोलक की थाप,
और बच्चों की पिचकारियों की शरारतें —
सब मिलकर एक रंगीन संगीत रच रहे थे।होली की सुबह गाँव में ‘रंगों और नूर की बारात’ निकली।
चारों ओर गुलाल उड़ रहा था।
लाल रंग उत्साह बनकर नाच रहा था।
नीला प्रेम और शांति का संदेश दे रहा था।
पीला खुशियों की किरणें बाँट रहा था।
हरा प्रकृति की ताज़गी बिखेर रहा था।
और सूरज उस पूरी बारात का सूरज बनकर
सबके चेहरों पर मुस्कान फैला रहा था।वह शिखा का हाथ पकड़कर बोला,
“आज होली है।
आज रंग सिर्फ दिखते नहीं, महसूस भी किए जाते हैं।”शिखा ने अपनी हथेलियाँ हवा में फैलाईं।
उसे गुलाल की नरम छुअन,
ढोल की गूँज,
बच्चों की हँसी,
और फूलों की खुशबू महसूस होने लगी।वह मुस्कुराकर बोली,
“अब मैं देख सकती हूँ…
क्योंकि रोशनी आँखों में नहीं, मन में होती है।
जब मन में नूर होता है,
तब हर रंग अपनी कहानी सुनाने लगता है।”गाँव के लोग ठिठक गए।
सूरज कुछ और चमक उठा।
सबने समझ लिया कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं,
बल्कि प्रेम, अपनापन और दिलों को जोड़ने का उत्सव है।
होली की उस दोपहर रंग हवा में तैरते रहे,
ढोलक की थापें मिट्टी में गूँजती रहीं,
और सूरज की खामोशी धीरे‑धीरे
गाँव की धड़कन का हिस्सा बन गई।शिखा उसके पास बैठी रही,
उसकी हथेलियाँ सूरज की हथेलियों में,
जैसे वह उसकी खोई हुई आवाज़ को
अपने स्पर्श से वापस बुलाना चाहती हो।
पर सूरज की आँखों में जो नूर था,
वह पहले से भी ज्यादा चमक रहा था —
जैसे वह बोल नहीं पा रहा,
पर कह सब कुछ रहा हो।गाँव वाले धीरे‑धीरे समझने लगे
कि आवाज़ सिर्फ शब्दों में नहीं होती,
कभी‑कभी वह आँखों में होती है,
कभी हाथों की पकड़ में,
कभी मुस्कान की हल्की‑सी कंपन में।शिखा ने सूरज की खामोशी को
कभी बोझ नहीं बनने दिया।
वह हर सुबह पहले की तरह उससे पूछती,
“भैया, आज आसमान कैसा है?”
और सूरज मुस्कुराकर
अपनी उँगलियों से हवा में
नीले रंग की एक अदृश्य रेखा खींच देता।
शिखा उसे महसूस कर लेती,
जैसे वह रंग उसके मन में उतर गया हो।धीरे‑धीरे गाँव ने भी सीख लिया
कि सूरज की खामोशी कोई कमी नहीं,
बल्कि एक नया रंग है —
एक ऐसा रंग जो सुनाई देता है,
पर बोला नहीं जाता।और शिखा…
वह अब सिर्फ रंगों को महसूस नहीं करती थी,
वह उन्हें जीती थी,
उन्हें बाँटती थी,
उन्हें सूरज की ओर से दुनिया तक पहुँचाती थी।गाँव में एक नई कहावत जन्मी —
धीमी, मुलायम, सच जैसी:“जिसके मन में नूर हो,
वह खामोशी में भी बोलता है,
और रंगों में भी सुनाई देता है।”और इस तरह
रंगों और नूर की वह बारात
कभी खत्म नहीं हुई —
वह हर दिन, हर साँस,
शिखा और सूरज के बीच
एक अनकही धुन की तरह बहती रही l
उपसंहार,
बहता हुआ, धुँधला, रंगों की तरह पिघलता हुआ —
जैसे कहानी आख़िरी साँस में कविता बन जाए।
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🌙 Poetic Epilogue — नूर की अंतिम लहर
रंग थमे नहीं,
बस हवा में धीमे हो गए।
ढोलक रुकी नहीं,
बस दिल की धड़कन में उतर गई।
सूरज बोला नहीं,
पर उसकी खामोशी
शिखा के मन में
एक नया रंग बनकर चमक उठी।
आवाज़ खो गई थी,
पर नूर नहीं —
नूर कभी नहीं जाता।
और शिखा ने सीखा
कि दुनिया देखने के लिए
आँखें नहीं,
एक उजला मन चाहिए।
अब जब भी हवा में
गुलाल उड़ता है,
लोग कहते हैं—
“यह सूरज की खामोशी है,
जो रंग बनकर बोल रही है।”
और शिखा मुस्कुराती है,
क्योंकि उसे पता है—
कुछ आवाज़ें
शब्दों से नहीं,
दिल से सुनी जाती हैं।
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“और इस तरह, रंगों और नूर की वह बारात कभी समाप्त नहीं हुई। वह हर दिन, हर साँस और हर मुस्कान में बहती रही — शिखा और नौर के बीच एक ऐसी अनकही धुन बनकर, जिसे आँखें नहीं, केवल दिल सुन सकता है।”
