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Kalpesh Patel

Drama Thriller

4  

Kalpesh Patel

Drama Thriller

दस्तक.

दस्तक.

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3

🌑 दस्तक.
 रात की साँसों में एक आवाज़,रात 2:17।  
बाहर बारिश की बूंदें काँच पर सरकती हुई,  अंदर घर में गहरा, ठहरा हुआ अंधेरा।
और उसी अंधेरे को चीरती  हुई, —  दस्तक।  
धीमी…  
अजीब…  
जैसे किसी ने दरवाज़े को नहीं,  
सीमा के दिल को छुआ हो।

सीमा ने करवट बदली।  
दस्तक फिर आई—  
इस बार थोड़ी भारी, थोड़ी बेचैन।

कमरे की दीवारें फुसफुसाईं—  
“अंधेरे में कोई है…”
सीमा उठी।  
बारी से बाहर झाँका—  
सिर्फ बारिश, हवा और रात का काला सन्नाटा।

लेकिन दस्तक जारी।  
हर ठोक में एक ठहराव…  
जैसे कोई इंतज़ार कर रहा हो कि वह सुन ले।

वह पापा के कमरे में गई।  
पापा सो रहे थे,  
पर उनके चेहरे पर एक अजीब खिंचाव—  
जैसे कोई सपना उन्हें बाँध कर रखे।

सीमा ने धीरे से कहा,  
“पापा… बाहर कोई है।”

पापा ने आँखें खोलीं।  
एक पल के लिए उनकी आँखों में वही पुराना डर चमका—  
जैसे वह इस दस्तक को पहचानते हों।

दोनों नीचे आए।  
दरवाज़ा बंद।  
चेन लगी हुई।  
बाहर कोई नहीं।

लेकिन फर्श पर पानी के निशान—  
जैसे कोई अंदर आने की कोशिश कर चुका हो।

सीमा ने दीवार की तरफ देखा।  
एक शब्द लिखा था—  
किसी ने लिखा नहीं था,  
पर लिखा हुआ था।

“खोलो।”

सीमा का दिल धड़क उठा।  
पापा के हाथ काँपने लगे।

“ये फिर शुरू हो गया…”  
पापा ने धीमे से कहा।

सीमा ने पूछा,  
“फिर? मतलब क्या?”

पापा ने दीवार को देखा।  
“ये दस्तक… ये आवाज़… ये परछाई…  
मैंने इसे सालों पहले झेला है।”

सीमा चुप।  
पापा बोलते रहे—

“जब तुम बहुत छोटी थीं,  
एक रात किसी ने दस्तक दी थी।  
बाहर कोई नहीं था।  
लेकिन अंदर…  
अंदर कुछ आ गया था।”

सीमा की साँस अटक गई।

“वो सिर्फ मुझे दिखता था।  
सिर्फ मुझे सुनाई देता था।  
और वो कहता था—  
‘अंधेरे में कोई है।’”

दस्तक फिर आई।  
इस बार इतनी ज़ोर से कि पूरा घर काँप गया।

सीमा ने पापा का हाथ पकड़ लिया।  
पापा दरवाज़े की तरफ बढ़े।

“अगर हम नहीं खोलेंगे,  
तो वो खुद अंदर आ जाएगा।”

सीमा ने काँपते हुए पूछा,  
“कौन?”

पापा ने कोई जवाब नहीं दिया।  
उन्होंने चेन हटाई।  
हैंडल पकड़ा।  
दरवाज़ा धीरे‑धीरे खोला…

बाहर कोई नहीं।  
सिर्फ अंधेरा।  
गाढ़ा, साँस लेता हुआ,  
जैसे ज़िंदा हो।

और उसी अंधेरे से एक आवाज़ आई—  
“आख़िर… तुमने दस्तक का जवाब दे ही दिया।”

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अंत — दस्तक का असली मतलब
दरवाज़ा बंद हुआ।  
घर शांत।  
बाहर बारिश।

लेकिन सीमा समझ गई—  
ये दस्तक किसी अनजान का नहीं थी।  
ये दस्तक पापा के मन के अंधेरे की थी,  
जो सालों बाद फिर लौट आई थी।

कभी‑कभी दस्तक दरवाज़े पर नहीं,  
मन की गहराइयों पर पड़ती है —  
और उसे खोल देने से  
पूरी ज़िंदगी बदल जाती है।

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